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  • Two Experiences In Those Difficult Times Where There Was No Hope, That Person Proved To Be The Messiah And Hard Times Come In Everyone's Life, Positive Thinking And New Hope Makes Everything Right Again, Know From These Experiences

दो अनुभव:दो अनुभव / उस मुश्किल समय में जहां कोई उम्मीद नज़र नहीं आ रही थी, वो शख़्स मसीहा साबित हुआ और मुश्किल वक़्त सभी के जीवन में आता है, सकारात्मक सोच और नई उम्मीद फिर से सब ठीक कर देती है, जानिए इन अनुभवों से

कपिला चोयल, रश्मि चौधरी2 महीने पहले
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ज़रा-सी मदद

उन दिनों मैं दौड़-दौड़ के प्रतियोगी परीक्षाएं दे रही थी। एक के बाद एक। पहले इम्तिहान की थकान दूर होने के पूर्व ही अगला इम्तिहान। कभी इस शहर में कभी उस शहर में। इत्मीनान की गुंजाइश ही ना थी। उस दिन की परीक्षा क़िस्मत से मेरे शहर में ही थी। हांफते-हांफते पहुंची। परीक्षा केंद्र में अपने क्रमांकानुसार कक्ष ढूंढकर नियत स्थल पर बैठ गई। निश्चित समय पर परिवीक्षक ने पर्चे बांटे और सभी अभ्यर्थी अपनी-अपनी कोशिश में जुट गए। परिवीक्षक ने एक-एक कर प्रतियोगियों के परिचय पत्र जांचने शुरू किए और उसी क्रम में मेरी मेज़ तक पहुंचे। मैंने समय ना गंवाने के हिसाब से उनकी तरफ़ बिना देखे ही मेरा परिचय पत्र आगे कर दिया और पर्चे के प्रश्न हल करने में तल्लीन्नता से जुटी रही। तभी परिवीक्षक ने मेरी तल्लीनता को भंग करते हुए कहा ‘परिचय पत्र में आपका फोटो नहीं है। हम आपको बिना फोटो परीक्षा में शामिल होने की अनुमति नहीं दे सकते। आपको इस परीक्षा को यहीं रोकना होगा।’ मैं अवाक। ख़ून ने रगों में जैसे बहना बंद कर दिया। मैं ठंडी पड़ गई। फिर भी हिम्मत जुटाते हुए परिचय पत्र को एक बार फिर फौरी तौर पर देखा। स्पष्टतया कहीं कोई निर्देश लिखा नज़र नहीं आया। मैंने पलट कर परिवीक्षक से कहा, ‘इसमें फ़ोटो चिपकाने से सम्बन्धी नियम कहीं भी नहीं लिखा हुआ है।’ परिवीक्षक ने मेरे हाथ से परिचय पत्र लेते हुए अपनी अंगुली से एक जगह इंगित करते हुए कहा, ‘ये यहां लिखा है।’ मेरे शब्द हलक में अटक गए। फिर भी सारी हिम्मत बटोर कर बोली, ‘लेकिन यहां लिखा तो कुछ पढ़ने में ही नहीं आ रहा है।’ दरअसल परीक्षा नियंत्रक की मुहर ठीक उस निर्देश के ऊपर छाप दी गई थी जिसमंे अभ्यर्थी को फोटो चिपकाने हेतु निर्देशित किया गया था जिससे वह सामान्य तौर पर पढ़ने में नहीं आ रहा था। उस परिवीक्षक ने चूंकि अन्य अभ्यर्थियों के परिचय पत्र भी जांचे थे जिनमें मुहर ढंग से लगी होने के कारण निर्देश पठनीय था, अतः उन्हें इस बारे में पता था। कहां तो मैं समय बचाने के चक्कर में लिखते हुए सिर भी नहीं उठाना चाह रही थी और कहां अब मेरी परीक्षा में उपस्थिति ही संकट में पड़ गई थी। परिस्थिति की भयावहता तब और बढ़ गई जब मुझे घर जाकर फोटो लाने या घर पर फ़ोन करने की मनाही हो गई। मैंने दिमाग़ पर इस संकट से उबरने के लिए बहुत ज़ोर डाला। तभी कुछ याद आया। मैंने परीक्षा केंद्र जो कि मूल में एक पॉलीटेक्निक महाविद्यालय था, में कार्यरत एक वरिष्ठ प्राध्यापक श्री बाबूलाल जी को एक बार बुलाने की अभ्यर्थना की, जिनकी सदाशयता के बारे में मैंने पूर्व में सुन रखा था। किस्मत से उपस्थित परिवीक्षक ने मेरा यह अनुरोध मान लिया। प्राध्यापक बाबूलाल जी आए, उन्हें मैंने अपनी व्यथा बताई। उन्होंने तुरंत घर से फोटो लाने की व्यवस्था करवाई। तब परिवीक्षक ने मुझे पूरे प्रश्न हल करने की अनुमति दी। कहना ना होगा असामान्य हालात में भी परीक्षा देकर मैं सफल हुई तो सिर्फ़ उन भलेमानस बाबूलाल जी की वजह से जो समय आने पर मेरे संकटमोचक बने। वाकई, भलाई का ज़माना है।

नई शुरूआत

मेरे अभिन्न मित्र वीर को किसी पारिवारिक विवाद के बाद बहुत कम उम्र में ही माता-पिता का घर छोड़ना पड़ा था। बहुत संघर्षों के बाद वे अपने पैरों पर खड़े हुए। विवाह किया, घर-गृहस्थी बसाई। ख़ूब नाम कमाया, पैसा कमाया। बड़ा बंगला बना, गाड़ियों का जखीरा भी। एक नया व्यापार भी शुरू किया। परंतु नए व्यापार में दोनों पार्टनर धोखेबाज़ निकले। वीर का कमाया हुआ लाखों रुपया डूब गया। गाड़ियां बिक गईं। उस पर कोरोना की मार अलग। मैंने महसूस किया कि जिन हालात में बड़े-बड़े लोग डगमगा जाएं, उनका सामना करते हुए वीर परेशान नहीं थे। एक दिन अचानक बाज़ार में एक दुकान के सामने वीर मुझे मिल गए। मैंने देखा वे कुछ गुनगुना रहे थे, ख़ुश भी थे। मैंने ऐसे ही पूछ लिया, ‘अरे आप इधर कैसे... और वो भी पैदल??’ ‘इस दुकान से कल कुछ सामान ले गया था। दुकानदार ने मुझे कुछ रुपए ज़्यादा लौटा दिए थे, बस वही वापस करने टहलते हुए चला आया।’ उन्होंने कहा। ‘क्या..? आप सिर्फ़ रुपए लौटने इतनी दूर आए?’ मैं आश्चर्यचकित थी। ‘और क्या’ कहकर वे मुस्कराए। ‘बहुत बड़ी बात है इतना सब खोकर आप दुखी नही हैं वीर’ मैं उनकी स्थिति को याद कर बोली। ‘दुख किस बात का ?’ वीर ने कहा। ‘इतनी ऊंचाई पर पहुंच कर आप आज अपना सब कुछ गवां बैठे हैं’ मैंने फिर कहा। ‘क़िस्मत से ज़्यादा और समय से पहले किसी को कुछ नहीं मिलता रश्मि’ वीर ने बड़े आत्मविश्वास से कहा। ‘हां, ये बात तो सही है पर अब क्या करेंगे आप’ मैं वीर के लिए चिंतित तो थी ही। ‘कुछ नहीं... फिर एक नई शुरुआत’ वीर निश्चिंत थे। ऐसे समय में भी जीवन के प्रति उनका ये सकारात्मक नज़रिया देख मैं वाकई हतप्रभ थी।

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