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अनूठी रस्में विवाह की:रिश्तों में मिठास और समृद्धि का प्रतीक मानी जाने वाली शादी की अनोखी रस्में

16 दिन पहले
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मामट नी कोठी

गुजराती शादी में दुल्हन मामट नी कोठी अपने ससुराल ले जाती है। ये कोठी रस्मों में बहुत ख़ास होती है, जो मामा के घर से आती है। इसको लाल चुनरी से सजाया जाता है। इसमें पांच प्रकार के मिष्ठान, पापड़ और बड़ियां होती हैं। जब दुल्हन की विदाई होती है, तो उसका भाई मामट नी कोठी साथ लेकर जाता है। ससुराल पहुंचने के बाद नज़दीकी रिश्तेदारों को कोठी में मौजूद चीज़ें बांट दी जाती हैं।

इसी तरह रमन दिवो जो कि धातु की प्लेट पर भगवान गणेश का एक लैम्प होता है, ये दुल्हन की मां बेटी को देती है जिसे वो ससुराल साथ लेकर जाती है। —एकता मोदी

मगद और खाजे

माहेश्वरी समाज में लड़की की विदाई के समय मां बेटी को शगुन के रूप में चांदी के प्याले में मगद और सफेद खाजे देती है। इसे देते हुए बेटी को बताती है कि इस मगद की तरह ससुराल में मीठी रहना। सफेद खाजे की तरह हमेशा कोमल रहना।

इसके अलावा कोठी में पापड़ और बड़ियां दी जाती हैं, ताकि यदि सब्ज़ी नहीं है तो सब्ज़ी की ज़िद ना करके पापड़ की सब्ज़ी या कभी बड़ियों की सब्ज़ी बनाकर ख़ुशी-ख़ुशी सबको खिला सके। — मंजु जैसलमेरिया

​​​​​​​पेड़ सींचने की रस्म

मराठियों में शादी होने के बाद अंतिम रस्म होती है ‘आम के पेड़ को सींचना’। पीहर में जहां वधू अन्नपूर्णा देवी की पूजा करती है रस्म वहीं संपन्न होती है। शादी की शुरुआत में वधू देवी अन्नपूर्णा की पूजा करती है और अंत में उनसे विदा लेने आती है। वधू वृक्ष को पति के साथ पानी से सींचती है और कामना करती है कि उसका घर आंगन आम के पेड़ की तरह विशाल, पवित्र और फलदार रहे।

दूसरी तरफ़ दूल्हा चुपके से देवी अन्नपूर्णा और लड्डू गोपाल की मूर्ति अपनी जेब में रख लेता है और प्रार्थना करता है कि अन्नपूर्णा देवी सदैव उसके घर में वास करें और उसकी संतानें भगवान कृष्ण की तरह हों। इन्हें अपने साथ घर लेकर जाता है। — जयश्री भवालकर

​​​​​​​हाथों में गाछकौटो

​​​​​​​लाल रंग की डिज़ाइन से सजा एक लकड़ी का पात्र बंगाली दुल्हन के साथ होता है। इसे शादी से लेकर ससुराल जाने तक उसे हाथों में पकड़कर रखना होता है। इसको गाछकौटो कहते हैं। इसके और भी कई नाम हैं। इस पात्र में सिंदूर के साथ-साथ चांदी का सिक्का, कौड़ियां और धान भरा होता हैै।

यह धन और मां लक्ष्मी के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है क्योंकि मां लक्ष्मी के हाथों में भी इसी प्रकार का पात्र और धान होता है।

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