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परवरिश:बेटे और बेटी की परवरिश में अंतर क्यों किया जाता है, इसका कारण और समाधान जानिए इस लेख में

शिल्पा शर्मा3 महीने पहले
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  • बेटा है तो बाहर के काम करेगा और लड़की को तो घर-रसोई के काम आने ही चाहिए। बेटे को दुकान से सामान ख़रीदकर लाने के लिए भेजना, खाना परोसने के लिए बेटी से कहना।
  • दस्तावेज़ों वाले काम में बेटे की मदद लेना- देखने-सुनने में भले ये बातें छोटी लगती हों लेकिन बड़े भेदभाव को जन्म देती आई हैं।

अपने हर बच्चे को, फिर चाहे वो लड़का हो या लड़की, सीखने और बढ़ने के समान अवसर देना आज के ज़माने की ज़रूरत है। यह जेंडर न्यूट्रल पैरेंटिंग कहलाता है। मिसाल के तौर पर, यदि किसी लड़की को कोई तोहफ़ा देना हो तो आज भी गुड़िया, किचन सेट आदि दिया जाता है और लड़कों को कार या आउटडोर गेम्स का सामान। हम तो उनके बचपन में ही यह तय कर देते हैं कि लड़की है तो गुलाबी कपड़े और लड़का है तो नीले। इस सोच से ऊपर उठकर हर बच्चे के सामने विकल्प रखना और उनमें से उसकी पसंद के मुताबिक़ चयन करने का अधिकार देना ही जेंडर न्यूट्रल पैरेंटिंग है।
हुनर का नहीं जेंडर से संबंध
ज़रा सोचिए हाल ही में महिला क्रिकेट से संन्यास लेने वाली भारतीय टीम की पूर्व कप्तान मिताली राज के हाथ में यदि हमने कलछी-तवा पकड़ा दिया होता और उन्हें वहीं किचन में रहने को ही बाध्य किया होता तो क्या भारतीय महिला टीम इतना अच्छा परफ़ॉर्म कर पाती? फ़र्ज़ कीजिए कि नामचीन शेफ़ संजीव कपूर के हाथ में क्रिकेट का बैट थमा दिया जाता तो क्या हमें वे लज़ीज़ व्यंजन खाने को मिलते, जिनका लुत्फ़ हम उनके वीडियोज़ देखकर उठाते हैं?
जेंडर न्यूट्रल पैरेंटिंग ज़रूरी है, क्योंकि किसी के भीतर हुनर लिंग यानी जेंडर देखकर नहीं पैदा होता और हर बच्चे का अपना हुनर होता है। ऐसे में जब हम जेंडर पर ध्यान न देते हुए, हर बच्चे को हमारे आसपास मौजूदा विकल्पों से रूबरू होने का मौक़ा देंगे तो न जाने कितनी लड़कियां कल्पना चावला की तरह अंतरिक्ष में और भावना कांत की तरह फ़ाइटर प्लेन में उड़ान भर सकेंगी और न जाने कितने लड़के सत्य पॉल और रोहित खोसला की तरह फ़ैशन डिज़ाइनर और विनीत भाटिया और अतुल कोचर की तरह नामचीन शेफ़ बन सकेंगे। तब ये नाम अपवाद की तरह नहीं लिए जाएंगे।
व्यावहारिक नुक़सान
साइकोलॉजिस्ट एवं पैरेंटिंग एक्सपर्ट डॉ. नम्रता सिंह कहती हैं कि लैंगिक आधार पर परवरिश में होने वाले भेदभाव की वजह से सामान्य तौर पर ऐसा देखा गया है कि महिलाएं वित्तीय निर्णय लेने में कमज़ोर हो जाती हैं, जैसे बड़ा घर लेना, अपने बल पर नया व्यापार शुरू करना, नई गाड़ी लेना आदि। इस वजह से महिलाएं पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं हो पाती हैं। हर बात में वह पुरुषों का साथ और सलाह चाहती हैं। ऐसे में वे ख़ुद को कमतर समझने लगती हैं। आगे बढ़कर निर्णय लेने में हिचकती हैं।
लैंगिक आधार पर भेदभाव भरी परवरिश की वजह से पुरुषों को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने, परेशानी के समय दूसरों से मदद लेने में झिझक होती है और उनमें ज़रूरत से ज़्यादा अहंकारी हो जाने जैसी दिक़्क़तें पनप जाती हैं। इस वजह से पुरुषों में ज़्यादा क्रोध और नशे की प्रवृत्ति बनने लगती हैं। आज के समाज में लैंगिक आधार पर समान परवरिश की आवश्यकता है।

दोनोें को सिखाएं एक-से काम
न्यूट्रल परवरिश के बारे में लैंगिक समानता के क्षेत्र में कार्य कर रही सामाजिक कार्यकर्ता कुमुद सिंह का कहना है, ‘एक स्वस्थ समाज के लिए जेंडर न्यूट्रल पैरेंटिंग बहुत ज़रूरी है। हमारे समाज में हम अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए बच्चों को जन्म देते हैं। सोचते हैं कि लड़का होगा तो बुढ़ापे का सहारा बनेगा और लड़की होगी तो बात उसकी शादी पर आकर रुक जाती है। इस तरह जन्म से पहले ही हम उन्हें दायरे में बांध देते हैं और यही भाव उन्हें मर्द और औरत बना देता है।
इस सोच के चलते लड़की आजीवन एक पुरुष के सहारे जीने को मजबूर हो जाती है, वहीं लड़का पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के बोझ तले दब जाता है और दोनों ही स्वाभाविक जीवन नहीं जी पाते। जबकि होना ये चाहिए कि हम बच्चे की परवरिश, बच्चे की तरह करें। खिलौनों से लेकर उनके साथ बातचीत के शब्दों पर भी ध्यान दें। लड़का-लड़की सभी खाना खाते हैं तो रसोईघर का काम दोनों को सिखाएं। यदि बच्चों को ऐसी कविताएं सिखाई जा रही हैं, जहां किसी एक लिंग के साथ कोई विशेष काम जोड़ा जा रहा है तो उसका विरोध करें। जीवन स्त्री-पुरुष दोनों के लिए आसान बनाएं।’

दोनों के विकास के लिए है ज़रूरी
यदि आपको लगता है कि पितृसत्तात्मकता ने केवल महिलाओं का बुरा किया है तो आप बिल्कुल ग़लत हैं। पितृसत्ता की वजह से जहां महिलाओं को शिक्षा, नौकरी आदि से वंचित रखा गया, वहीं पुरुषों के ऊपर जबरन कठोरता लादी गई। उन्हें अपने मनोभाव व्यक्त करने से रोका गया, रोने नहीं दिया गया।
कहा गया- मर्द को दर्द नहीं होता और इस बात को सच माने बैठे पुरुषों ने अपनी कोमल, मानव सुलभ भावनाओं को भीतर ही भीतर कुचल दिया। यदि अभिभावक जेंडर न्यूट्रल पैरेंटिंग का तरीक़ा अपनाएं तो लड़कियां पढ़ सकेंगी, आगे बढ़ सकेंगी और लड़के अपने मनोभावों को व्यक्त करने में नहीं झिझकेंगे तो विनम्र और अपने परिवार को स्नेह से सींचने वाले बन सकेंगे। यह स्थिति किसी भी समाज के लिए बेहतर होगी।

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