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कहानी:ऊन की मदद से मां बच्चों के लिए सुकून बुनती है, ऐसे नसीबों वाले ऊनी कपड़े कोई ठुकराता कैसे है?

मेहा गुप्ता16 दिन पहले
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  • एक-एक फंदा, एक-एक सलाई जहां स्वेटर को आकार में बढ़त देते हैं, वहीं मां के दुलार की ऊष्मा भी उसमें भरते जाते हैं।

मेरी मां को स्वेटर बुनने का बहुत शौक़ था। सर्दी आई नहीं कि मां का स्वेटर बुनो अभियान शुरू हो जाता। दिवाली की सफ़ाई में ही मां अलमारी के सबसे निचले खंड में दबे अपने पुराने बचे-खुचे ऊन के ढेर निकाल ऊपर रख देतीं। बाद में समय मिलने पर जो ऊन ज़्यादा मात्रा में होता उसके साथ कम मात्रा वाले ऊन की बीच-बीच में पंक्ति डाल ख़ुद के लिए ब्लाउज़ या हमारे लिए बिना बांह का चितकबरा स्वेटर तैयार कर लेतीं। तब तक तो साइकल पर ऊन बेचने वाले भैया के आने का क्रम भी शुरू हो जाता। मां ढेरों रंग-बिरंगे ऊन के लच्छे ख़रीद पहले उन लम्बे लच्छों को अपने घुटनों के गिर्द लपेटतीं और फिर उंगलियों में ऊन लपेटते हुए बड़े-बड़े गोले तैयार करतीं। मां के पास हर नंबर की पतली-मोटी सलाइयों का भी विशाल संग्रह था जिन्हें वे ख़ाली हुए पाउडर के गुलाबी टिन के डिब्बे को स्टैंड की तरह प्रयुक्त कर उसमें रखतीं थीं। उन सलाइयों के पैने छोरों पर पिघले हुए लाख की चूड़ियों की घुंडी लगाकर रखती। मां के स्वेटर की लम्बाई और चौड़ाई मापने की मानक इकाई भी बालिश्त और उंगल होते। मां के नए स्वेटर के लिए फंदे डालते ही मेरी स्वेटर पूरा होने की उत्सुक प्रतीक्षा शुरू हो जाती। स्कूल से आते ही मां की देखा-देखी स्वेटर को अपने छोटे बालिश्त से मापती कि स्वेटर कितना बड़ा हुआ। शायद पांचवीं कक्षा की बात रही होगी। मैं स्कूल से आई उस समय मां पुराने ऊन से किसी पत्रिका में से डिज़ाइन का नमूना सीखने में व्यस्त थीं। ‘मां, बहनजी ने भूरा और वो भी बिना डिज़ाइन का बिल्कुल सादा स्वेटर स्कूल में पहनकर आने को बोला है।’ मेरे कहने की देर थी और दो हफ़्तों में भूरा स्वेटर तैयार था। उस स्वेटर में कोई डिज़ाइन तो नहीं था पर स्वेटर का गला आम स्वेटर से थोड़ा ऊंचा था क्योंकि सादा स्वेटर बनाना मां के हुनर की तौहीन थी। उस नए तरीक़े का स्वेटर पहनने में मैंने ना-नुकर किया तो मां ने ही मुझे समझाया कि इसे स्कीवी कहते हैं और अभी ये बहुत चलन में है। अगले दिन मैं उस स्वेटर को पहन सहमते हुए स्कूल पहुंची। प्रार्थना सभा में सभी बहनजियों का हसरत से मेरे स्वेटर की ओर तकना और फिर बाद में स्टाफ़ रूम में मुझे बुलाकर उसकी तारीफ़ करना और मेरा स्वेटर उतरवा उसके गले के फंदों के जोड़-घटाव को समझना, देखकर... क़सम से मेरा दिन गुलज़ार कर गया था। उस दिन मैं ख़ुशी के मारे पंजों के बल उचकते हुए घर आई थी और मैंने अपनी मां के हाथों को चूम लिया था। मां के हाथ का स्वेटर पहनते हुए मेरे जीवन की सोलह सर्दियां निकल गईं। सत्रहवीं सर्दी तक तो मैं कॉलेज में पढ़ने जयपुर आ गई। तब तक रेडीमेड स्वेटर बाज़ार में पैर पसारने लगे थे। कॉलेज में सभी वही पहनते। मुझे मां के हाथ के बुने कार्डिगन पहनकर जाने में संकोच होता पर मां से ये बात कहने की हिम्मत नहीं थी। मैंने पहली सर्दी तो जैसे-तैसे निकाल ली। उन दिनों सर्दी के दिनों में कैंटीन में गुड़ का हलवा और गरमा-गरम औंटा हुआ गाढ़ा दूध मिलता था जो अतिरिक्त पैसे देकर ख़रीदना पड़ता था। मां उसके लिए अलग से पैसे भेजती थीं। अगले साल मैंने उन पैसों से एक पुलोवर ख़रीद लिया और उसी से कॉलेज की बाक़ी की तीन सर्दियां निकाल दीं। शादी के बाद पहली सर्दी में मायके गई तो मां ने अपने दामाद का पसंदीदा रंग जानना चाहा, मैं मां के पूछने का मंतव्य समझ गई। ‘मां, आप अपना वक़्त मत ज़ाया किया करो। अब इनका रिवाज़ नहीं रहा, गंवारू लगते हैं।’ सुनकर मां बस हौले से मुस्करा दी थीं। मां इतनी स्वाभिमानी थीं कि उन्होंने फिर कभी हम लोगों के लिए स्वेटर नहीं बनाया। मां ने अपने शौक़ को दफ़न नहीं होने दिया। वो हर सर्दी स्वेटर बुनती रहीं और पापा के ऑफ़िस के स्टाफ या घर काम करने वाली बाइयों के परिवार को या आसपास में दिखने वाले किसी भी ज़रूरतमंद को भेंट करती रहीं। हूं तो मैं भी अपनी मां की बेटी ही ना... अपने बच्चों के लिए स्वेटर तो नहीं बुनती पर मेरी कोशिश रहती है कि मैं हर देशी-विदेशी पकवान उन्हें अपने हाथ से बनाकर खिलाऊं। कल जब मेरे बेटे ने मेरे हाथ के बने मंचूरियन को खाते हुए कहा, ‘मां, आप अपना समय मत बिगाड़ा करो। आप कितनी भी कोशिश कर लो पर बाज़ार जैसा मंचूरियन नहीं बना सकतीं।’ मुझे उस दिन अपनी मां की मुस्कराहट के पीछे छिपे दर्द का अहसास हुआ और मेरी रुलाई फूट पड़ी। मन किया दौड़कर मां के पास चली जाऊं और उनकी बाहों में सिमट जाऊं। मैंने संदूक खोला और मां के हाथ का बुना एक स्वेटर निकालकर पहन लिया। इतने सालों बाद भी मैं अपनी मां के स्पर्श को और उनकी ममता के गुनगुने अहसास को महसूस कर पा रही थी। मैंने तुरंत मां को वीडियो कॉल किया क्योंकि मुझे वह स्वेटर पहना देख, मैं मां के चेहरे की ख़ुशी देखना चाहती थी और अपनी मां को बताना चाहती थी कि बाज़ार से ख़रीदा महंगे से महंगा स्वेटर भी आपके हाथ के बुने स्वेटर जैसी गर्माहट नहीं दे सकता।

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