वक्रोक्ति:एक रेल यात्रा और यात्रियों के बीच सीट की जंग का मज़ेदार क़िस्सा

रोहित चेडवाल2 महीने पहले
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  • यात्राएं मनोरंजक होती हैं, विशेषकर रेल यात्राएं।
  • जितने जाने-अनजाने चेहरे यहां मिलते हैं, शायद ही किसी और यात्रा साधन में किसी से टकराते हों।
  • यहां जितने चेहरे होते हैं, उतने क़िस्से होते हैं। यह क़िस्सा भी एक ऐसी ही यात्रा का है और जब तक रेल यात्राएं रहेंगी, ऐसे क़िस्से और पात्रों से मुलाक़ातें हाेती रहेंगी।

सोमवार की वही अलसाई सुबह और 6:40 की इंदौर-भोपाल इंटरसिटी। बस्ता टांगे बेशुमार लोग और उनके साथ मैं। ट्रेन हो, लोगों का जमावड़ा हो और कोई मज़ेदार क़िस्सा न हो ऐसा सम्भव नहीं। क़िस्सा ज़रूर कहूंगा किंतु इससे पहले मैं आपको अपनी सहूलियत के लिए यह समझा देना चाहता हूं कि इस ट्रेन की क्या विशेषताएं हैं। इसमें D1, D2 और D3 नामक तीन डिब्बे बैठने के लिए आरक्षित होते हैं, जिन्हें ‘कुर्सी यान' की संज्ञा दी गई है। महज़ पंद्रह रुपए का अतिरिक्त शुल्क जमा कर सीट आरक्षित करवाई जा सकती है। लेकिन जो सीट आरक्षित नहीं है उस पर सामान्य टिकट लेकर बैठा जा सकता है। मैंने भी ऑनलाइन माध्यम से सीट आरक्षित करवा ली थी। सुबह-सुबह आधी नींद में आंखें मसलता हुआ मैं अपनी सीट तक जा पहुंचा। वहां पाया कि एक लड़की पहले से उस पर विराजमान थी। शक्ल से उम्र का अंदाज़ा लगाने की कला तो मेरे पास नहीं है, लेकिन लड़की हमउम्र ही थी। आजकल लड़कियों में चल रही सूखकर कांटा होने की प्रतियोगिता से वह कोसों दूर थी और खाते-पीते घर की प्रतीत हो रही थी। तत्काल मेरे मस्तिष्क में विचारों के बदरा छा गए। पहले तो विचार आया कि चलो इसे बैठे रहने दो, लेकिन फिर दूसरे ही पल ख़्याल आया कि यदि इसकी जगह मैं होता तो शायद ही इसे मुझ पर रहम आता और हो सकता था कि वो मुझे आरक्षण की विधि भी समझा देती। और जब आजकल बड़े-बड़े मंचों से सशक्तीकरण की बात होती है, देश में बराबरी को लेकर इतनी बहस, रैलियां, आंदोलन, प्याज़, लस्सन, कांदा, चटनी आदि होता है तो क्यों न मैं भी सशक्तीकरण का हितैषी होने का परिचय दूं और इन्हें खड़े रहकर शक्ति प्रदर्शन का मौक़ा दे ही दूं। मैंने उस लड़की को अतिसंकोच से बताया कि यह सीट आरक्षित है, तो वह उठकर खड़ी हो गई और इधर-उधर देखने लगी। जैसे ही मैं अपनी सीट पर बैठा और सामने देखा तो एक अधेड़ उम्र के सज्जन मुझे एकटक देख रहे थे, देख क्या घूर रहे थे। जैसे मैंने बहुत ही घृणित कार्य कर दिया है और शायद वे मेरे बारे में सोच रहे होंगे कि इस बुद्धिहीन मानव को नरक में भी स्थान नहीं मिलेगा। मैं स्वयं को ठीक तरह से स्थापित करने की जद्दोजहद कर ही रहा था कि सामने बैठे उन्हीं सज्जन का स्वर मुखरित हुआ। ‘बालिका।’ उस लड़की ने उनकी ओर नज़रें घुमाईं। ‘आप यहां बैठ जाओ।’ इतना कहकर वे उठे। वे अपने ठीक पीछे वाली सीट तक गए, जहां तीन की सीट पर दो ही लोग बैठे थे। उन्होंने वहां ताक़ीद की कि कोई बैठा तो नहीं है और वहां जाकर विराजमान हो गए। बालिका उनकी सीट पर बैठ गई। मैंने अनुमान लगाया कि वे शायद मुझे घूरते हुए जाएंगे और उनका प्रतिशोध पूरा होगा, लेकिन उन्होंने मुझे नज़रअंदाज़ करना अधिक उचित समझा। किंतु मैं एक बात समझ नहीं पाया कि जिस ख़ाली सीट पर वे ख़ुद पहुंचे वहां ‘बालिका’ को भी तो बैठा सकते थे। लेकिन फिर मैं जान गया कि यदि ऐसा कर देते तो उनकी सहृदयता का डंका नहीं बज पाता और मुझ जैसे निर्लज्ज व्यक्ति को कैसे सबक़ सिखा पाते।

ख़ैर, अभी तो सफ़र शुरू ही हुआ था। लंबी सीट पर कुल जमा तीन लोग थे। खिड़की की तरफ़ एक महिला, बीच में एक लड़की और कोने पर तीसरा मैं बैठा था। एक घंटे बाद देवास आया जहां से डिब्बे में दनदनाते हुए एक परिवार चढ़ा। वे खोजी दृष्टि लिए हमारी सीट तक आ गए और फिर अपने टिकट को आंखें दिखाने लगे। दरअसल उन्हें उनकी सीट नहीं मिल रही थी। थोड़ी देर परेशान होने के बाद उन्हें टिकट में सीट संख्या मिल गई, लेकिन परेशानी का अंत अब भी नहीं हुआ था। नम्बर तो मिल गया लेकिन सीट नहीं मिल रही थी, सीट के ऊपर ही सीट संख्या लिखी होने के बावजूद। तभी अचानक परिवार की एक वयोवृद्ध महिला में टीसी की बुआ प्रवेश कर गईं और वे बारी-बारी से सबकी सीट संख्या पूछने लगीं। मुझसे तो उन्होंने दो बार पूछा। इस दो बार हुई उच्चस्तरीय जांच का मैंने यह अंदाज़ा लगाया कि शायद मेरी शक्ल देखकर उन्हें नहीं लग रहा था कि मैं भी सीट आरक्षित करा के सफ़र कर सकता हूं।

बहरहाल, उन्हें अपनी सीट मिल गई। हमारी लंबी सीट पर खिड़की के पास बैठी महिला उनकी जगह पर विराजमान थी। महिला उठी और ‘बुआ’ अपनी सीट पर धचक से बैठ गईं। इस अफ़रा-तफ़री में मुझे एक बात और पता चली कि जो सज्जन मुझे शुरुआत में आंखें दिखा रहे थे, उनके पास भी आरक्षित सीट नहीं थी। वे भी एक ओर खड़े हो गए। लेकिन इधर खिड़की वाली महिला हमारे सामने ही खड़ी हो गई और सबको सुनाते हुए कहने लगी, ‘थोड़ा सरक जाइए’, और ये कहते हुए पता नहीं क्यों उन्होंने मेरी ओर ही देखा। शायद उन्हें उन बुआ और लड़की से सरकने की उम्मीद नहीं थी और वो दोनों उनकी उम्मीद पर खरे भी उतरे। बीच में बैठी लड़की ने ज़रूर सुझाव दिया कि आप आगे वाले डिब्बों में निकल जाओ, उधर सीट आसानी से मिल जाएगी। इस पर महिला ने बड़ा बेतुका-सा बहाना बनाया, ‘वो मैं ज़्यादा ‘ट्रैवल’ नहीं करती न तो मुझे ज़्यादा ‘आइडिया’ नहीं।’ इस वाक्य में ट्रैवल और आइडिया पर उन्होंने ज़्यादा ज़ोर दिया। और इस बात का ज़ाेर इतना चला कि पहले तो आग्रही महिला ही मुझे देख रही थी, अब आस-पास के अन्य लोग भी आशामिश्रित भाव से मेरी ओर ताकने लगे कि मैंने इधर महिला को बैठने के लिए थोड़ी-सी जगह दी और मेरे सम्मान में तालियां बजीं।

अब चूंकि वहां बैठी अन्य महिलाओं ने तो नारी सशक्तीकरण प्रदर्शन से मना कर दिया तो अंतत: मुझे ही सरकना पड़ा। मैं खिसककर एक कोने पर बैठ गया। पड़ोस में बैठी लड़की भी आंशिक भलमनसाहत के साथ सरकी। महिला को बैठने की पर्याप्त जगह मिल गई। लेकिन मैं कुछ ही समय में यह जान गया कि उन्हें न सिर्फ़ बैठना था बल्कि पीछे आराम से टिकना भी था। अपनी ये हसरत पूरी करने के लिए वे धीरे-धीरे पीछे सरकती रहीं और मैं सीट के कोने तक धकेला जाता रहा। धीमी गति से वो महिला सीट पर टिकने के लक्ष्य की ओर अग्रसर होती रही और मुझे बर्थ पर अपने अधिकार का क्षेत्रफल प्रतिपल घटता नज़र आ रहा था। सीट का कोना मेरी प्रतीक्षा में था। मैं इतना कोने पर आ चुका था कि मुझे प्रतीत हुआ कि अब गुरुत्वाकर्षण बहुत अधिक बढ़ चुका है और यदि मैं अब भी डटा रहा तो यह मुझे चपेट में ले लेगा जिससे यात्रियों को दांत दिखाने और ज्ञान-बौछार का स्वर्णिम अवसर प्राप्त हो जाएगा। मैं ग़ुस्से में खड़ा हो गया। जैसे ही मैं खड़ा हुआ महिला ने सीट को पूरी तरह हथिया लिया। याद दिला दूं कि सीट मेरे नाम पर आरक्षित थी। मैं दरवाज़े के पास जाकर खड़ा हो गया, स्वयं को यह दिलासा देते हुए कि जिस मनुष्य में इतनी भी आत्मीयता नहीं, धर्म नहीं, आदर्श नहीं, संवेदनाएं नहीं, संसार के अन्य मनुष्यों के प्रति वसुधैव कुटुम्बकम का भाव नहीं उनके साथ सीट साझा करने से बेहतर है मैं तीन घंटे के लिए अपने साढ़े 10 नाप के पैरों को कष्ट दे दूं। हालांकि मैं यह भी जानता था कि ये सबकुछ मैं स्वयं को दिलासा देने के लिए सोच रहा था। वास्तविकता यह थी कि मैं सीट की जंग हार चुका था और मुंह लटकाए आरक्षित डिब्बे की अनारक्षित भीड़ का हिस्सा बन चुका था। अंतत: मैंने अपनी लाल डायरी में महिला का रेखाचित्र ज़रूर खींच लिया, ताकि भविष्य में इस तरह की विस्थापन की कार्रवाई से स्वयं की रक्षा कर सकूं।

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