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लघुकथा:एक छोटी सी लघुकथा जीवन की क़ीमत को आसानी से समझा जाती है

मुकेश शर्मा13 दिन पहले
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  • मात्र चंद पंक्तियों की यह छोटी-सी कहानी —जीवन की अहमियत के बारे में जितने प्रभावी रूप से एक संदेश दे जाती है, वैसा एक पुस्तक भी नहीं कर सकती थी।

शाम के सात बजे होंगे। टहलता हुआ मैं टावर की सातवीं मंज़िल पर बने अपने फ़्लैट की बालकनी में आया। अचानक एक विचित्र घटना घट गई। अजीब-सा आवेग आया और मैं बालकनी की रेलिंग लांघ सातवीं मंजिल से नीचे ज़मीन पर आ गिरा। हालांकि मैं ऊपर ही था, लेकिन नीचे भी पड़ा था। तुरंत ही पत्नी और बेटे को यह सूचना देने के लिए दौड़ा, लेकिन वे मेरी बात सुनना तो दूर, मेरी उपस्थिति तक को महसूस करने के लिए तैयार नहीं थे। लिफ्ट ठीक होने के बावजूद बदहवास-से वे सीढ़ियों से नीचे की ओर दौड़ रहे थे। मैं भी उनके पीछे हो लिया। मेरे पड़ोसी डॉक्टर ने नब्ज़ चेक की, दूसरा-तीसरा मुआयना किया और मुझे ‘डेड’ घोषित कर दिया। रोना-धोना, अफरातफरी मच गई। दबी-दबी आवाज़ों में तरह-तरह की बातें होने लगी। अंधेरा हो चला था, इसलिए बुज़ुर्ग पड़ोसियों ने सलाह दी कि श्मशान घाट कल सुबह लेकर जाएं। मैं घबरा गया। इस देह के रहते मेरी उम्मीद अभी बाक़ी थी और इसके साथ मेरा चंद घंटों का साथ रह गया था। मैं रोने लगा। मैं चाहने लगा कि अगले दो-तीन घंटों में ही मेरा बारह वर्षीय बेटा जवान हो जाए और परिवार को संभाल ले। अगले इन्हीं घंटों में बिटिया भी बड़ी हो जाए और मैं उसके विवाह की ज़िम्मेवारी पूरी होते देख लूं। परिजनों से ज़्यादा तो मेरी सुबकियां बंधी हुई थी। मैंने अपनी सम्पत्ति का हिसाब लगाया कि यदि एक हज़ार रुपए में एक सांस के हिसाब से भी डील हो जाए तो मुझे मंज़ूर है। डील की उम्मीद में आसमान को देखा, लेकिन वहां सब आम दिनों की तरह ही सामान्य था। अब समझ में आया कि एक सांस की क़ीमत एक हज़ार रुपए लगाने पर भी ऊपर वाले की तरफ़ से कितनी नज़रे-इनायत मुझ पर हुई थी। फ्लैट, कार, बैंक बैलेंस सब यहीं धरा रह गया था। क्या करूं? ज़िंदगी और समय की अहमियत अब समझ में आ रही थी। दौड़कर ऊपर फ्लैट में अपनी अल्मारी तक गया और कुछ याद आते ही अपने आप को कोसने लगा। न मेडिक्लेम करवा रखा था और न ही जीवन बीमा। मुझे तो मरना भी नहीं आया। कैसे शक्ति बनूं अपनी रोती हुई पत्नी की? मैं उसे समझाना चाहता था कि अब वह इस पूरी परिस्थिति को किस तरह से संभाले। तभी वह मेरी ओर देखने लगी और फिर उसका स्वर सुनाई दिया- अब उठो, आठ बज गए हैं। आज संडे है तो क्या सोते ही रहोगे? चाय यहां मेज़ पर रख दी है। तुरंत मेरी आंखें खुल गईं, लेकिन अब मैं ‘जाग’ चुका था।

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