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दिल का भंवर:प्रकृति के सभी रंग आशावदी होते हैं, नैराश्य उनमें बिल्कुल नहीं होता

सोनू लाम्बा9 दिन पहले
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  • प्रकृति के सभी रंग और सभी संकेत आशावादी होते हैं, उनमें नैराश्य कहीं नहीं होता...
  • रंगों के दो समारोहों के ज़रिये इसे समझें।

आइए, प्रकृति के दो जलरंग चित्रों को निहारते हैं। सुबह का वो समय जब सूरज दादा धरती पर आने के लिए तैयार हो रहे होते हैं, अमृत बेला है। उस वक़्त उजास तो प्रकृति में दिखने लगता है, लेकिन कोई रंग खुलकर सामने नहीं आता, मानो सभी चादर तान के सो रहे हों। तब जो रंग मुखर होता है धरती पर उसे मैं सुरमई उजाला कहती हूं। जैसे ही पूरब में लालिमा आकर कहती है, अरे उठो सब दादू आ रहे हैं, तुरंत सब रंग अपने प्यारे-प्यारे मुखड़े दिखलाने लगते हैं, मुस्कराते हैं। और इतनी सुबह अगर खेतों की तरफ़ निकल जाएं तो जंगली फूल तो ऐसे दिखते हैं जैसे स्नान करके उपस्थित हुए हैं सुबह के राजा का अभिवादन करने को। दूर-दूर तक फैले गेहूं के जवान होते खेत मानो हरी मखमल बिछा देते हैं। सरसों की पकी फ़सलें कुछ हरी व कुछ पीली होती फलियों से लदी बहुत विन्रम होकर झुकी रहती हैं। जैसे ही हवा का कोई झोंका आता है, उनका अभिवादन भी साथ आता है- जैसे बोल रही हों, सुप्रभात! आम के पेड़ों पर बौर ऐसे खिल रहा होता है, मानो किसी बच्चे की तरह कह रहा हो- बड़ा होकर आम बनूंगा...। और फिर, जब दिन भर जलता रहा सूरज थक के चूर हो जाता है तो दक्षिण-पश्चिमी छोर पर बने अपने घर के दरवाजे़ पर नांरगी दुशाला उतारकर शाम के आंचल में छुपने को आतुर हो उठता है। तब वह पूरी प्रकृति को चम्पई रंग की चुनरी भेट कर जाता है, जो ठीक अंधेरा होने से पहले का वक़्त है! तब सारे रंग थके-मांदे बच्चों की तरह सुस्ताने लगते हैं, जैसे दिनभर ख़ूब धमाचौकड़ी किए हों, धूल-मिट्टी में सने हों। नींद के बोझ से उनकी पलकें बोझिल हो जाती हैं। सब जैसे ही चम्पई चूनर वाली शाम के आंचल में छुपते हैं तो दूर क्षितिज पर सूरज के घर में ताला पड़ जाता है। रात पांव पसार लेती है। रात के मुसाफ़िर तारे अपनी-अपनी टॉर्च लिए बाहर निकल आते हैं, उन्हीं की देखा-देखी ज़मीं पर जुगनू जगमगाते हैं। चांद-तारों की हंसी-ठिठोली से आसमां हर रात गुलज़ार रहता है। यही जीवन के रंग हैं- जब सूरज छिप जाता है तो वो चांद-तारों को भेज देता हैं... पूरी तरह से अंधेरा कभी होता ही नहीं। प्रकृति के सभी संकेत आशावादी हैं।

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