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ताना-बाना:शरीर के साथ-साथ मन के स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी आवश्यक है, हर मानसिक रोग पागलपन नहीं होता

डॉ. घनश्याम दास कूलवाल6 महीने पहले
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  • तन है तो कभी-कभार दिक़्क़तें होंगी, मन है तो उसे भी समस्याएं होंगी ही।...यह सामान्य बात है।
  • निदान और उपचार की ज़रूरत तब पड़ती है, जब समस्या लंबे समय तक बनी रहे।
  • शारीरिक दर्द और तकलीफ़ में तो हम डॉक्टर के पास चले जाते हैं, लेकिन मन की तकलीफ़ को अनदेखा करते रहते हैं।
  • सम्पूर्ण स्वास्थ्य के लिए मन का चंगा होना भी ज़रूरी है।
  • रोग, आशंका और अनिश्चितता के विश्वव्यापी माहौल में मन की सेहत के बारे में यह बुनियादी जानकारी।

एक तंदुरुस्त शरीर के भीतर एक बीमार मन भी हो सकता है, और किसी सफल, हंसमुख व्यक्ति को भी मानसिक समस्या हो सकती है, यह विचार ही बहुतों को अविश्वसनीय लगता है। परंतु, जैसे तन का बीमार पड़ना स्वाभाविक है, वैसे ही मन के बीमार पड़ जाने में भी कुछ आश्चर्यजनक नहीं। समझने वाली बात यह है कि सम्पूर्ण स्वास्थ्य के लिए तन और मन, दोनों का सेहतमंद होना आवश्यक है। तभी आप ज़िंदगी को पूरी तरह जी पाते हैं। दूसरी बात यह कि तन और मन आपस में जुड़े हैं। जैसे, कभी गंभीर और दीर्घकालिक शारीरिक व्याधि के कारण अवसाद जैसी मानसिक समस्या हो जाती है, वैसे ही मन परेशान हो तो शरीर में तरह-तरह के दर्द उभर सकते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन मानसिक स्वास्थ्य को परिभाषित करते हुए कहता है कि यह चंगा होने की एक स्थिति है जिसमें किसी व्यक्ति को अपनी क्षमताओं का एहसास रहता है। वह जीवन के सामान्य तनावों का सामना कर सकता है, लाभकारी एवं उपयोगी रूप से काम कर सकता है और अपने समाज के प्रति योगदान करने में सक्षम होता है। यूं तो मानसिक स्वास्थ्य की कोई अाधिकारिक परिभाषा नहीं है, लेकिन अगर कोई व्यक्ति अपने सारे काम अच्छी तरह से ख़ुद कर सके, अपनी ज़िंदगी ख़ुशी और संतुष्टि से जी सके और उसमें आने वाली परेशानियों का सामना कर सके तो उसको मानसिक रूप से स्वस्थ कहा जा सकता है।

जब मन की सेहत बिगड़ती है…
मानसिक रोगों के चलते भावनाएं, विचार और व्यवहार प्रभावित हो सकते हैं। इनके लक्षणों का दायरा व्यापक है : उदासी महसूस करना, व्याकुल होना या ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में कमी, अत्यधिक भय या चिंता, अपराधबोध महसूस करना, मनोदशा में अत्यधिक परिवर्तन, थकान, ऊर्जा में कमी, नींद में समस्याएं, वास्तविकता से अलग हटना, मतिभ्रम, दैनिक समस्याओं या तनाव से निपटने में असमर्थता, समस्याओं और लोगों के बारे में समझने में समस्या, शराब या नशीली दवाओं का सेवन, खाने की आदतों में बड़ा बदलाव, कामेच्छा सम्बंधी तनाव, अत्यधिक क्रोध या हिंसक व्यवहार, आत्मघाती सोच, आदि।

कई बार मानसिक रोग के लक्षण जिस्मानी समस्याओं जैसे पेटदर्द, पीठदर्द, सिरदर्द या ऐसे दर्द के रूप में दिखाई देते हैं जिनका कारण समझ में नहीं आता। शुरुआत में जब मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ता है तो लक्षण छुपे हुए हो सकते हैं। कई बार व्यक्ति सामान्य लगता है, लेकिन वह आंतरिक तौर पर असामान्य होता है। दरअसल, शरीर के अंदर बनने वाले रसायनों में परिवर्तन के कारण भी मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है। ऊपर से तो सबकुछ अच्छा दिखाई देता है, लेकिन कुछ गड़बड़ रहती है। छुपे हुए लक्षणों में से एक है नींद कम आना। ऐसा लंबे समय तक हो और कोई उपाय राहत न दिला पा रहा हो तो मनोविशेषज्ञ से मिलना चाहिए।

इसके अलावा गुमसुम रहना, किसी से बात न करना, खाना कम कर देना, रोज़ के काम करने में दिक़्क़त होना कुछ ऐसे लक्षण हैं, जिन पर परिजनों को ग़ौर करना चाहिए। कोई भी स्थिति जो व्यक्ति के सामान्य दैनिक व्यवहार से अलग हो, मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ने का लक्षण हो सकता है।

किसी को भी हो सकता है मनोरोग

हर किसी को अपने जन्म से लेकर मृत्यु तक के जीवन में अनेक तनावपूर्ण घटनाओं या अनुभवों से अवश्य गुज़रना पड़ता है। प्रत्येक व्यक्ति पर उसके स्वभाव और सहनशीलता के अनुसार इन अनुभवों का असर अस्थायी या स्थायी रूप में होता है, और कई मामलों में यह अस्थायी या स्थायी रूप में मनोरोग का स्वरूप ले लेता है। इस तरह मानसिक समस्याएं और मनोरोग बहुत व्यापक हैं और बच्चे-बुज़ुर्ग, अमीर-ग़रीब, स्त्री-पुरुष या किसी भी धर्म-सम्प्रदाय या जगह के लोगों में पाए जाते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ने के लक्षण रोग के प्रकार, परिस्थितियों और अन्य कारकों के आधार पर भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। एक ही तरह के मानसिक लक्षण अलग-अलग मनोरोग में भी पाए जा सकते हैं और दो व्यक्तियों को एक ही प्रकार का मनोरोग होने के बावजूद उनके लक्षण अलग हो सकते हैं। मनोरोग के अंतर्निहित कारण, उससे जुड़े हुए अन्य मानसिक लक्षण, लक्षणों की तीव्रता, अवधि, उनसे जुड़ी हुई अन्य शारीरिक समस्याओं वग़ैरह को ध्यान में रखते हुए पूरी शारीरिक एवं मानसिक जांच-पड़ताल और निदान के बाद एक मनोचिकित्सक ही यह तय कर सकता है। यदि किसी को मानसिक दिक़्क़त महसूस हो रही है तो उसे मनोविशेषज्ञ या मनोचिकित्सक से खुलकर बात करनी चाहिए और कुछ भी छुपाना नहीं चाहिए।

मिसाल के लिए हम एक 25 वर्ष स्नातक युवती का मामला लेते हैं...

वह एक छोटे-से अपार्टमेंट में रहती है और चुपचाप आती-जाती है। कभी-कभार पड़ोसियों से औपचारिक अभिवादन होता है। अविवाहित है, सगाई हो चुकी है परंतु शादी नहीं। कई बार अपने कमरे में कोने में चुपचाप गुमसुम-सी बैठी रहती है। उसे आर्श्चयजनक आवाज़ें सुनाई देती हैं और भयानक दृश्य दिखते हैं। ऑफ़िस में वह दूसरे के हाथ का खाना खाने से डरती है, बातों-बातों में एक-दो शब्द बार-बार दोहराती है।

पहले संगीत और फ़िल्मी गीतों में काफ़ी दिलचस्पी लेती थी लेकिन आजकल कुछ अच्छा नहीं लगता है। निराशा या उदासी छा जाती है, रात को चीख़ने लगती है। कभी-कभी उसके मूड में उत्तेजना या उन्माद-सा आ जाता है। हालांकि बाहरी लोगों को वह आमतौर पर सामान्य लगती है और कुछ असामान्य लक्षणों को वे उसकी आदत या आत्मकेंद्रित प्रवृत्ति समझ लेते हैं। उसने अपने डॉक्टर से सरदर्द, नींद की कठिनाई और मोटापे के संबंध में सम्पर्क किया परंतु उसने अपनी अन्य समस्याओं का ज़िक्र नहीं किया। यदि वह अपने लक्षणों का स्पष्ट चित्र प्रस्तुत करती तो शायद डॉक्टर यह जान जाता कि उसके साथ क्या ग़लत हो रहा है। क्योंकि वह स्किज़ोफ्रेनिया की शिकार है।

हर मानसिक परेशानी रोग नहीं है
बहरहाल, सीमित समय के लिए होने वाली मानसिक परेशानी और बिगड़ते हुए मानसिक स्वास्थ्य में अंतर करने के लिए यह देखना चाहिए कि परेशानी की वजह क्या है और यह परेशानी कितनी देर के लिए रहती है। ज़्यादा समय तक रहने वाली परेशानी चिंताजनक हो सकती है।

माना जाता है कि मनोरोगों के विभिन्न आनुवंशिक और पारिवारिक कारण भी हो सकते हैं। माता-पिता, भाई-बहन या किसी अन्य ख़ून के रिश्ते वाले व्यक्ति को मानसिक रोग हो तो इसकी आशंका होती है। जीवन की तनावपूर्ण स्थितियां भी मन की सेहत गड़बड़ाने की वजह बन सकती हैं, जैसे- वित्तीय समस्याएं, प्रियजन की मृत्यु या तलाक़, दीर्घकालिक चिकित्सा समस्या, गंभीर चोट, मस्तिष्क की चोट, दर्दनाक अनुभव जैसे कोई हमला या युद्ध, बचपन में दुर्व्यवहार आदि। मादक पदार्थों का सेवन भी मानसिक रोगों की तरफ़ ले जाता है।

मानसिक विकार महिला या पुरुष में से किसको होने की आशंका अधिक है, ये प्रतिशत हर मानसिक रोग में अलग है। ज़्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि किसकी जीवनशैली अच्छी है, उसमें जीवन के दबावों को झेलने की क्षमता कितनी है और दबावों-तनावों का प्रबंधन वह कैसे करता/करती है।

कब पड़ती है उपचार की ज़रूरत

मनोचिकित्सक के पास सही समय पर जाने और इलाज लेने से मानसिक रोगों को ठीक किया जा सकता है। जब परिजनों को लगने लगे कि व्यक्ति के स्वभाव में बदलाव आ रहा है, वह अपने रोज़ के काम नहीं कर पा रहा है, उसकी व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं सामाजिक ज़िंदगी पर प्रभाव पड़ने लग गया है तो उसे मनोविशेषज्ञ के पास ले जाना चाहिए।

इसके अलावा मरीज़ अगर किसी और को या अपने आप को नुक़सान पहुंचाने की स्थिति में है तब उसको अविलम्ब मनोचिकित्सक को दिखाना चाहिए। कुछ समस्याओं में लंबे समय तक काउंसलिंग या दवाओं की ज़रूरत पड़ सकती है।

मानसिक रोग रोकने का निश्चित तरीक़ा तो नहीं कह सकते हैं, हालांकि यदि मानसिक बीमारी है तो तनाव को नियंत्रित करना और आत्मसम्मान को बढ़ाना मदद कर सकता है।

(लेखक चिकित्सा विज्ञान स्नातक और मनोचिकित्सा में एमडी हैं। अध्यापन और मार्गदर्शन का सुदीर्घ अनुभव। मानसिक स्वास्थ्य और मानसिक रोगों से सम्बंधित जानकारी एवं जागरूकता के लिए प्रयत्नशील हैं और दो दशकों से निःशुल्क शिविरों में नियमित सेवाएं दे रहे हैं। विभिन्न सरकारी एवं
ग़ैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा सम्मानित।)

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