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देशराग:आर्यभट ने 23 वर्ष की उम्र में खोज निकाला था कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी4 महीने पहले
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  • महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन के जन्मदिवस 22 दिसम्बर को राष्ट्रीय गणित दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह भारतीय गणित-परम्परा का सिंहावलोकन करने का भी एक प्रसंग है।
  • प्राचीन भारत के अनेक ज्योतिर्विद्, नैयायिक, दार्शनिक, वैयाकरण और छंदशास्त्री भी गणित में सिद्धहस्त थे। किंतु भारतीय गणितज्ञों में प्रथम-स्मरणीय आर्यभट ही हैं, जिन्होंने विश्व में सबसे पहले यह अनुमान लगाया था कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है।
  • राष्ट्रीय गणित दिवस के परिप्रेक्ष्य में हमारी यह प्रस्तुति भारत के इसी महान गणितज्ञ को समर्पित है।

आर्यभट ही प्रथम ऐसे आचार्य हैं, जो देव-कोटि या ऋषि-कोटि में नहीं आते, परंतु साथ ही उनका सम्मान वैसा ही है।

इस समय भारतवर्ष में तीन प्रकार की ज्योतिष पद्धतियां प्रचलित हैं- सौर पद्धति और ब्राह्म पद्धति। तीसरी आर्यभट के नाम से प्रचलित है- आर्य सिद्धांत पद्धति। इस प्रकार प्रथम मनुष्य आचार्य होने पर भी वे सम्मान के साथ देवताओं ओर ऋषियों के साथ स्मरण किए जाते हैं।

शक संवत् 309 में आर्यभट का जन्म हुआ था, अर्थात् 476 ईस्वी में। जिस समय उनकी अवस्था 23 साल की थी, उसी कच्ची उमर में उन्होंने ‘आर्यभटीय’ की रचना कर दी। अपना यह ग्रंथ उन्होंने कुसुमपुर अर्थात् पटना में लिखा था, परंतु उनका जन्म शायद दक्षिणी भारत में हुआ था।

वस्तुत: ‘आर्यभटीय’ की जितनी भी प्रतियां मिली हैं, वे सब केरल प्रांत में ही मिली हैं। कुसुमपुर में उन दिनों प्रतापी गुप्त-सम्राटों की राजधानी थी और सारे देश की प्रतिभा वहां खिंचकर आ जाती थी। कुसुमपुरेभ्यर्चितम् ज्ञानम् से ऐसा लगता है कि उनके ज्ञान का सम्मान कुसुमपुर में ही हुआ था। देश के अन्य भागों में उसकी क़द्र शायद नहीं हो पाई थी।

आर्यभट ने ही पहली बार यह बताने का प्रयत्न किया था कि दिन-रात होने का कारण पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूमना है। जहां ब्रह्मगुप्त आदि महान आचार्यों ने इस प्रकार की मान्यता के लिए उनकी भर्त्सना की है, वहीं उनके भक्त टीकाकारों ने अर्थ बदलने का भी प्रयत्न किया है। परंतु यह सत्य है कि उन्होंने भारतवर्ष में प्रथम बार पृथ्वी के घूमने की बात स्वीकार की थी और तदनुसार दिनमान निश्चित करने का प्रयत्न किया था।

अनेक परवर्ती आचार्यों ने उन पर श्रुति और स्मृति के विरुद्ध जाने का आरोप लगाया है। यहां यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि आधुनिक विज्ञान ने पृथ्वी की दो प्रकार की गतियों का पता लगाया है।

एक तो वह स्वयं अपनी धुरी पर घूमती है और दूसरी वह सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है। आर्यभट केवल पहली बात मानते हैं, दूसरी नहीं। परंतु इतने पुराने समय में उन्होंने पृथ्वी में एक गति का पता लगा लिया, यह कम आश्चर्य की बात नहीं है, सो भी केवल 23 वर्ष की अवस्था में। हमारे ज्योतिष ग्रंथों में संख्या बताने की एक निश्चित विधि है। जैसे वेदों का अर्थ चार है, क्योंकि वेदों की संख्या चार है। ग्रह का अर्थ नौ है, क्योंकि ग्रहों की संख्या नौ है। कोई बड़ी संख्या बताने के लिए इन सांकेतिक शब्दों का व्यवहार किया जाता है और उन्हें क्रमश: बाईं ओर रखा जाता है, जैसे वेद, ग्रह, अंक, चंद्र का मतलब होता है- 1994।

आर्यभट ने एक बिलकुल नई पद्धति का आविष्कार किया। उन्होंने अक्षरों और मात्राओं से संख्या बताने की विधि निकाली। जैसे अ अर्थ एक, ई का अर्थ सौ, च का अर्थ छह, छ का अर्थ सात इत्यादि। इस प्रकार संख्या बताने से थोड़े में बहुत बड़ी संख्या कह ली जाती है। लेकिन इसमें एक दोष है कि ज़रा भी अक्षर इधर-उधर लिखने या पढ़ने में अंतर पड़ जाए तो हज़ारों का अंतर पड़ जाता है।

डॉ. केर्न ने बड़े परिश्रम से ‘आर्यभटीय’ का सम्पादन किया था, लेकिन प्रसिद्ध ज्योतिर्विद् शंकर बालकृष्ण दीक्षित ने उसमें देखा कि एक जगह बु के स्थान पर षू छप गया है और इस प्रकार संख्या में 5 लाख 70 हज़ार की ग़लती हो गई। यदि अन्य ग्रंथों की सहायता न ली जाए तो ठीक संख्या निश्चित करना बहुत कठिन हो जाए। लेकिन फिर भी यह पद्धति चाहे जितनी सदोष हो, आर्यभट की स्वतंत्र प्रणाली की निदर्शक अवश्य है।

इस संक्षिप्त पद्धति का यह नतीजा था कि उन्होंने ‘आर्यभटीय’ में अत्यंत जटिल गणना की चर्चा बहुत ही संक्षेप में कर दी है। अंकों की सूचना यद्यपि दुरुच्चाय और दुष्पाठ्य है, फिर भी प्रतिपादित-शैली बहुत ही मनोरम है। यही कारण है कि बहुत समय बीत जाने के बाद भी देश के कुछ हिस्सों में आज तक आर्यभट के सिद्धांतों के अनुसार पंचांग बनाए जाते हैं।

विद्वानों ने बहुत परिश्रम करके आधुनिक गणना-पद्धति के द्वारा शक संवत् 421 की ग्रह-स्थिति का पता लगाया है। देखा गया है कि आर्यभट ने अपने समय का प्राय: शुद्ध गणित किया है। यह उनकी कुशल वेधशक्ति का उत्तम निदर्शक है।

आजकल ज्योतिष व्यावहारिक गणित यानी अप्लाइड मैथेमेटिक्स का विषय माना जाता है, पर पुराने ज्योतिषी अपने सिद्धांत-ग्रंथों में पाटीगणित, अव्यक्त या बीजगणित जैसे शुद्ध गणित की भी चर्चा कर देते हैं। पुराने सिद्धांत-ग्रंथों में ऐसा नहीं मिलता, लेकिन परवर्ती सिद्धांत-ग्रंथों में मिलता है।

आर्यभट ही शायद इस प्रथा के आदि-प्रवर्तक हैं। उन्होंने सिद्धांत-ग्रंथ के गणितपाद में मंगलाचरण के अतिरिक्त 32 आर्याएं और लिखी हैं। उनमें दशगुणोत्तर संख्याओं के नाम, वर्गघन, वर्गमूल, घनमूल, त्रिभुतज, वृत्त और अन्य क्षेत्र, इनके क्षेत्रफल, घनगोल, इनके घनफल, भुजज्यासाधन और भुजज्या-सम्बंधी कुछ विचार, श्रेढी, त्रैराशिक, भित्रकर्म (अपूर्णक), बीजगणित सम्बंधी दो-एक चमत्कारिक उदाहरण और कुट्‌टक- इतने विषय हैं।

पं. शंकर बालकृष्ण दीक्षित ने लिखा है कि टॉलमी और उनसे प्राचीन ग्रीक-ज्योतिषियों को भुजज्या का ज्ञान नहीं था। वे ज्या (साइन) का ही उपयोग करते थे। भारतीय ज्योतिष से परिचित होने के पूर्व यूरोपीय लोगों की यह धारणा थी कि ज्या को छोड़कर भुजज्या (ज्यार्ध) का उपयोग सर्वप्रथम ईस्वी सन् की नौवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में प्रादुर्भूत अरब-ज्योतिषी अलबाटनी ने किया, परंतु आर्यभट के इस ग्रंथ से ज्ञात होता है कि शक संवत् 421 में भी हमें अर्धज्याओं का ज्ञान था।

वर्तमान सूर्य-सिद्धांत में भी अर्धज्याएं हैं। और भी एक उल्लेखनीय बात यह है कि आर्यभट ने वृत्त के व्यास और परिधि का अत्यंत सूक्ष्म अनुपात बतलाया है। वह यह है कि 20000 व्यास के वृत्त की परिधि 62832 होती है अर्थात् व्यास से परिधि 3.1416 गुणित है और इसको भी उन्होंने आसन्न यानी आसपास कहा है। आधुनिक जानकारी के यह बहुत निकट है। आधुनिक मान 3.1415927 है।

आचार्य आर्यभट नि:संदेह बहुत सूक्ष्म गणित के मर्मज्ञ थे। आज से डेढ़ हज़ार साल पहले उन्होंने गणित में क्रांतिकारी स्थापनाएं की थीं- ज्योतिष में भी और शुद्ध गणित में भी। किसी अज्ञात ज्योतिषी ने उनके समय के कुछ ही बाद लिखा था कि सिद्धांत-पद्धति के रहते हुए भी ग्रहों के अस्त और ग्रहणादि विषयों में दृग्विरोध होते देखकर ग्रहों की गति की कल्पना करने के लिए स्वयं सूर्यदेव ही कुसुमपुर में आर्यभट नाम से अवतीर्ण हुए।

यही इस देश की अपनी रीति से किया हुआ सर्वोच्च श्रद्धा-निवेदन है।

राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक ‘महापुरुषों का स्मरण’ से

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