अहा ! अतिथि:बड़े परदे के एक्शन हीरो विद्युत जामवाल असल जीवन में हैं बेहद संजीदा, पढ़िए विद्युत जामवाल से ख़ास बातचीत

चंडीदत्त शुक्ल10 महीने पहले
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  • फोर्स के लिए पहले ही ऑडिशन में चुन लिए गए थे विद्युत
  • तीन साल की उम्र से ही इंडियन मार्शल आर्ट सीखना शुरू किया

किसी ऐसी शख़्सियत के बारे में जानना हमेशा प्रेरक होता है, जिसने योद्धा-भाव के साथ अपनी अलहदा पहचान बनाई हो। विद्युत जामवाल की देह भी अपने आपमें ऐसी ही एक भाषा है, जिसे पढ़ते हुए हम जान पाते हैं कि- संकल्प दृढ़ हों, समर्पण भाव बना रहे, अटूट लगन के साथ यदि ख़ुद को साधें तो कठिन से कठिन चुनौती से भी टकरा सकते हैं। विभिन्न युद्ध कलाओं के माहिर, एक्शन स्टार विद्युत शारीरिक सौष्ठव के मामले में सिल्वर स्क्रीन पर अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज कराते हैं। मन संयमित रख, तन गढ़ने की यात्रा उन्होंने किस तरह तय की- इस बारे में विद्युत से हमने बातचीत की।

इस बार ‘अहा! अतिथि’ में पढ़िए, अविकल सवाल-सिलसिला:

विद्युत जामवाल की भुजाएं ही मज़बूत नहीं हैं, आंखें भी गहरे अर्थ समेटे हैं। अच्छे-खासे लंबे और फुर्तीले विद्युत जामवाल को अपनी ये स्ट्रेंथ पता है। यही कारण है कि वे नई फ़िल्मों में एक्शन के साथ-साथ मानवीय भावनाओं के बहुरंगी संसार के कुछ और इंद्रधनुष चुनने में जुट गए हैं।

विद्युत साफ करते हैं ‘अपनी पहचान बनाने, सफल होने, फिर इस स्थिति तक पहुंचने कि अपनी बात जोरदार तरीके से कह सकें- में वक्त लगता है। धीरे-धीरे वो समय आ रहा है, जब मैं ये कह सकता हूं कि एक्शन के अलावा, रोने-हंसने वाले विस्तृत रेंज के किरदार मुझसे कराए जाएं और उम्मीद है कि अब निर्माता-निर्देशक मुझे इमेज से बाहर आने के अवसर देंगे।

विद्युत के शब्दों में तकनीक की बारीकियों को अंजाम देने के साथ-साथ रोमांस के रोमांच को परदे पर उतारना मुश्किल काम तो है, लेकिन ये एक दिलचस्प अनुभव भी है।’ इस प्रक्रिया को वे निज की खोज बताते हैं। विद्युत की गहरी बातों में जीवन का अर्थबोध समाहित है। विद्युत कहते हैं कि बचपन से सुना है- मैं कौन हूं। बुद्ध ने ये यात्रा तय करने के लिए सांसारिकता से मुक्ति प्राप्त की और बोध-प्रकाश का जागरण किया। मेरे लिए मार्शल आर्ट्स, अभिनय, प्रशिक्षण- ये सब कुछ इसी मैं का अनुसंधान है।

विद्युत को मौक़े कई मिले, लेकिन उनकी इमेज खलनायक की बन गई थी। ‘कमांडो’ सीरीज़ ने विद्युत की पहचान बदलने में बड़ा रोल अदा किया। इसके लिए विद्युत ने मार्शल आर्ट्स के लिए प्रसिद्ध लगभग पच्चीस देशों की यात्रा की और वहां लाइव एक्शन शोज़ में स्टंट दिखाए। शाकाहारी भोजन के समर्थक और परदे पर विश्वसनीय नज़र आने वाले विद्युत निजी जीवन में भी सहज और भरोसेमंद लगते हैं।

लड़ना ही आपको दूर तक आगे ले जाता है

आप ख़ुद को योद्धा मानते हैं या विजेता? ये सवाल इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि नॉन फ़िल्मी बैकग्राउंड से आकर भी आप दर्शकों के दिलों में स्थापित होने में क़ामयाब रहे हैं, वहीं बॉक्स ऑफ़िस के मोर्चे पर लड़ाई जारी है। इसे क्या कहें? संघर्ष और सफलता का तालमेल या फिर जद्दोज़हद का बचे रहना?
सवाल रोचक है और सोचने पर मजबूर भी करता है। मुझे लगता है कि ख़ुद को कभी विजेता नहीं मानना चाहिए, किसी भी रूप में, क्योंकि जैसे ही हम मान लेते हैं कि लड़ाई जीत चुके हैं- संघर्ष की क्षमता, प्यास और ज़रूरत ख़त्म हो जाती है।
लड़ना ही आपको दूर तक और देर तक आगे ले जाता है। इस युद्ध-यात्रा में आप कई बार हार जाते हैं या ख़ुद को निढाल महसूस करते हैं और बहुत बार ऐसा भी होता है कि उठ खड़े होते हैं और फिर मुश्किलों और चुनौतियों से दो-दो हाथ करने में जुट जाते हैं।

जहां तक बॉक्स ऑफ़िस की बात है- फ़िल्मों के कलेक्शन की चिंता अधिक नहीं करता। मेरे लिए ये महत्वपूर्ण है कि दर्शक मेरे काम और परफ़ॉर्मेंस के लिए की गई कोशिश से जुड़ सके हैं या नहीं! मेरे हिस्से में अगर जीत जैसा कुछ हासिल हुआ भी है तो वो जनता की जीत है, क्योंकि भले आप फ़िल्मी खानदान से हों या एकदम साधारण जनता के बीच से उठकर आए हों, दर्शक देखना चाहेंगे तो सिल्वर स्क्रीन पर, थिएटर्स में लाकर खड़ा कर देंगे- भले इंडस्ट्री स्वागत करने के लिए तैयार हो कि ना हो।

तीन साल की उम्र से सीखा इंडियन मार्शल आर्ट

सच में, लड़ाई जारी रहना महत्वपूर्ण है। ये कथन इस संदर्भ में और ख़ास हो जाता है कि तीन साल की उम्र से ही आप इंडियन मार्शल आर्ट सीखने लगे थे और ये अब तक जारी है !
भारतीय मार्शल आर्ट- कलरीपायट्टू। वैसे, महत्वपूर्ण ये नहीं कि मैं तीन साल की उम्र से सीख रहा हूं, बल्कि ध्यान देने वाली बात यह है कि मैंने कभी अभ्यास करना नहीं छोड़ा।
कई बार लोग मिलते हैं और ख़ुशी के साथ बताते हैं कि विद्युत, मैंने पांच या सात दिन पहले एक्सरसाइज़ करना शुरू कर दिया है। मैं फलां मार्शल आर्ट सीख रहा हूं या कोई ख़ास दैहिक अभ्यास कर रहा हूं और फिर 15 दिन में ही वे परिणाम की अपेक्षा करने लगते हैं। ऐसी बेसब्री से कुछ हासिल नहीं होगा। शुरू करने में क्या है? बात तो तब है, जब लगातार जुटे रहें। मुझे कुछ मिला या हासिल नहीं हुआ, कोई परिणाम आया या फिर एक ख़ास कालखंड में मैं निष्फल भी रहा, लेकिन मार्शल आर्ट का अभ्यास कभी छोड़ा नहीं।

जहां-जहां गए वहां-वहां सीखा

जहां तक मेरी जानकारी है, पिता जी की नौकरी ऐसी थी जिसमें काफ़ी स्थानांतरण होते थे। स्वाभाविक तौर पर आपके गुरु बदल जाते रहे होंगे। मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण लेना फिर तो अनियमित हुआ होगा?
यदि आप नॉन फ़िल्मी बैकग्राउंड से हैं तो इसका एक लाभ यह है कि- आप जिससे चाहें, बेहिचक मिल सकते हैं, जहां चाहें, वहां जा सकते हैं। आपका कोई भी पीछा नहीं करेगा, कोई भी आपकी तस्वीरें नहीं खींचेगा और ये सवाल भी नहीं होगा कि कहां-क्या करने आए हैं? तो मैंने अपनी इस स्थिति का पूरा-पूरा लाभ लिया। जहां भी पता लगता कि कोई अच्छे गुरु हैं, वहां चला जाता और सीखना शुरू कर देता। इस तरह मेरी इस युद्ध कला का पिछला प्रशिक्षण जहां रुका होता, सिलसिला उससे आगे चल निकलता।
हमारे देश में गुणी लोगों-गुरुजनों की कमी नहीं है। मन लगाकर सीखने वाले ही कम हैं। हां, जो कला आप सीखना चाहते हैं, उसके फ़ॉर्म में फ़र्क हो सकता है। पंजाब में गतका सिखाया जाता है और उत्तर प्रदेश में लाठी चलाने का करतब सीखने का मौक़ा मिलता है। पिता जी आर्मी में थे और मैं उनके साथ अलग-अलग शहरों में जाता-रुकता-रहता रहा। ये सच बात है कि हर जगह कलरीपायट्टू की फ़ॉर्मल ट्रेनिंग नहीं मिली, लेकिन हुनर सीखने का सिलसिला भी कभी बंद नहीं किया। जो कला जिस जगह की थी, वो मैंने आत्मसात की, ग्रहण कर ली। जैसे मणिपुर में थांग टा के गुर सीखे। थांग टा भी भारतीय मार्शल आर्ट है। इसमें तलवारबाजी और लठ्ठबाजी का अद्भुत हुनर सिखाया जाता है। थांग टा में नौ साल से लेकर 49 वर्ष तक के योद्धा पारंगत होते हैं।

हर काम उसी दिन पूरा करना है

पिता एक फ़ौजी और मां अध्यापिका, ज़ाहिर है आपके घर में तो बहुत अनुशासन रहा होगा…!
बाक़ी दुनिया के लिए अनुशासन के क्या मायने हैं ये नहीं जानता। शायद ये सुबह चार बजे उठना है। या ये कि सम्भलकर बोलो और सारा काम सबसे पहले, बिना कुछ कहे, निपटा लो।
हमारे घर में ऐसी सख़्ती नहीं थी, जिसे अलग से अनुशासन का नाम दिया जाए। ये अघोषित नियम ज़रूर था कि दिनभर के लिए जो प्लान बनाया गया है, वो चाहे एक घंटे में पूरा हो या चार घंटे में- उसी दिन मुकम्मल कर लेना है। उसमें कोई बहानेबाज़ी, आलस्य या टालमटोल नहीं चलेगा। अगर तय किया है कि एक हज़ार मीटर आज चलना है और किसी वजह से 500 मीटर ही चल पाए तो रात के 12 बजने से पहले 500 मीटर और चल लेना है। हर दिन का लक्ष्य तय होता था, जिसे टालने की अनुमति नहीं थी।

छोटी जगहों के बड़े दिल वाले लोगों ने बड़ी बातें सिखाईं

ये जज़्बा कैसे पैदा हुआ कि सामने जो भी चुनौती आए या मुश्किल का सामना करना पड़े, उसे चित कर देना है। अक्सर तो लोग बीच का रास्ता तलाश लेते हैं...।
इसकी वजह है- क़ुदरत से गहरा जुड़ाव और लोगों से रिश्तों का सरल-सहज होना। मैं ऐसे छोटे-छोटे शहरों में रहा हूं, जिनका लोग आमतौर पर नाम तक नहीं जानते। ज़ाहिर है कि ऐसी जगहों पर बेहद निश्छल और अकृत्रिम लोग मिले। जैसे पंजाब के दोआबा का आदमपुर, जिसकी चर्चा पुलवामा अटैक के समय हुई। उस समय आदमपुर से ही एयरक्राफ़्ट्स रवाना हुए थे... तो मैं कहना चाहता था कि छोटी जगहों के बड़े दिल वाले लोगों ने बड़ी बातें सिखाईं। इसी तरह प्रकृति के सान्निध्य से मैंने समझा कि कोई चुनौती या मुश्किल ज़िंदादिली से बड़ी नहीं होती।
क़ुदरत हमेशा अपने लिए रास्ते बनाती है और मुसीबतज़दा लोगों को समाधान भी मुहैया कराती है। देखिए, जानकारी फिर भी किताबों या स्कूलों में हासिल कर सकते हैं, लेकिन प्रायोगिक तौर पर काम किए बिना व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त नहीं होगा। अलग-अलग विद्यालयों में विभिन्न अध्यापकों के मार्गदर्शन और दोस्तों के साथ से भी बहुत कुछ सीखने का अवसर मिला है। यहां, मुम्बई में भी मेरी दोस्ती उन्हीं लोगों से है, जो पार्टी करने के बजाय कुछ नया सीखने में यक़ीन रखते हैं। ट्रांसफ़रेबल नौकरियों के साथ जो भी दिक़्क़तें हों, एक ख़ूबी भी है कि हर तीन साल में आपको नई जगह पर जाना होता है। वहां नए रिश्ते बनते हैं और बहुत कुछ पहली बार सीखने का मौक़ा मिलता है। ये सारे अनुभव जीवन के दस्तावेज़ में जुड़ते जाते हैं।

कई बार ऐसा भी होता है ना कि जब आप एक घर छोड़कर दूसरे शहर की तरफ़ क़दम बढ़ाते हैं तो जड़ों से कटने की तकलीफ़ गहरा जाती है। आपका अनुभव कैसा था? शहर छोड़ने की पीड़ा ज़्यादा थी या कुछ नया जानने की लालसा अधिक रही?
हम जिस दौर में हैं, उसमें जगहें छोड़ने की तकलीफ़ कम होती है, क्योंकि तकनीक काफ़ी प्रगति कर चुकी है। कोई रिश्ता या एहसास पीछे कहां छूटता है? ई-मेल की सुविधा तो बहुत पहले आ गई थी। और अब सोशल मीडिया पर नाम सर्च करें तो बचपन के दोस्त भी दिख जाते हैं। ऐसे में किसी की याद आए तो फ़ोन उठाओ, नम्बर मिलाओ और बात कर लो।
दुनिया बहुत छोटी हो गई है, इसलिए बिछड़ जाने का ग़म कभी था ही नहीं। पता था कि आप जब चाहें, तब किसी से फिर जुड़ सकते हैं।

जिसे आप संघर्ष मानते हैं, वो हमारी ज़िंदगी का रूटीन हिस्सा है

पापा भले फ़ौजी थे, लेकिन मां का दिल तो बेहद नाज़ुक होता है। उन्होंने आपको ऐसा कौशल सीखने की इजाज़त कैसे दी, जिसमें चोट लगना तय होता है?
नाज़ुक मिज़ाज महिला नहीं हैं मेरी मां। उनकी फ़िज़िकल एबिलिटी काफ़ी है। वैसे भी, मध्यवर्गीय परिवारों के कामकाजी लोग ज़्यादा इधर-उधर नहीं सोचते, ना ही इस तरह की बातों में उलझते हैं। कम से कम मेरा परिवार ऐसा बिल्कुल नहीं है। हमारे यहां संघर्ष को ग्लैमराइज़ नहीं किया जाता। चलना, दौड़ना, गिरना, चोटिल होना- ये सब जीवन का अंग है।
एक उदाहरण देता हूं- लॉकडाउन से पहले मैं मुम्बई के एक कॉलेज में गया था। वहां के स्टूडेंट्स ने मुझसे कहा कि विद्युत! आपने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किया है। मैंने जवाब दिया कि मुम्बई आने से पहले मैंने स्ट्रगल शब्द सुना ही नहीं था। जिसे आप संघर्ष मानते हैं, वो हमारी ज़िंदगी का रूटीन हिस्सा है। स्ट्रगल नामक शब्द अमीरों, सुविधाभोगियों ने गढ़ा है। जब तक उनसे कुछ होता नहीं, वे यही बताते रहते हैं कि कोशिश तो की थी, बस परिणाम नहीं आया। जब कभी, कुछ हासिल हो जाता है तो अपनी क़ामयाबी के लिए कहानियां गढ़ लेते हैं और बताने लगते हैं कि हमने बहुत स्ट्रगल किया है। ये माना जा सकता है कि आपने हार्ड वर्क किया होगा, लेकिन हर काम स्ट्रगल थोड़े होता है।

पार्टियों की बजाय प्रैक्टिस ज्यादा पसंद है

मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग करते हुए यकायक मॉडलिंग और फिर फ़िल्मों में आना कैसे हुआ?

भारतीय मार्शल आर्ट्स को जनसाधारण के बीच स्थापित करना मेरे जीवन का एकमात्र लक्ष्य है, ताकि लोगों के तन-मन में उत्साह और बल का विश्वास जन्म ले सके। वे जान सकें कि दुनिया भर में जितने भी क़िस्म के मार्शल आर्ट हैं- कराटे, कुंगफ़ू आदि, उस सबकी जड़ें भारत में हैं और यहीं से वो विधा संसार भर में पहुंची है। मेरी समझ में बहुत पहले ये बात आ गई थी कि फ़िल्में जनप्रिय माध्यम हैं और यदि मैं सिनेमा से जुड़ जाऊं तो मार्शल आर्ट्स का प्रचार-प्रसार करने में आसानी होगी। जब 19 साल का था, तब पिता जी की मृत्यु हो गई थी। मां ने हरदम सपोर्ट किया और यही कहा कि जो मन कहे, उस पर विश्वास करो और अंतरात्मा की आवाज़ पहचानकर चलते रहो। मुझे पता था कि रास्ता आसान नहीं है, क्योंकि इस इंडस्ट्री में लाखों लोग भाग्य आज़माने के लिए आते हैं। साथ ही भरोसा भी था कि कुछ तो मुझमें अलग है, जो बाक़ियों में नहीं है। इस तरह समझ सकते हैं कि ना तो बहुत डरा हुआ था और ना ही ओवर कॉन्फ़िडेंट। जीवन में ये सीखा है कि लगे रहो, टिके रहो, जूझते रहो तो एक दिन मंजि़ल मिल ही जाती है।

आप पार्टियों में कम दिखते हैं, मौज-मस्ती नहीं करते। कभी ये नहीं लगता कि युवावस्था को एंजॉय नहीं कर पा रहे हैं?
अन्यथा ना लें तो बताऊं कि मेरे पास पार्टियों में जाने का समय ही नहीं है। जितना समय मिलता है, उसे मैं अपने लक्ष्य पर केंद्रित करता हूं और युद्ध कला की प्रैक्टिस में जुटा रहता हूं।

आपके निजी जीवन के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं! इसकी कोई खास वज़ह?
घर में माता, बड़े भाई और बहन हैं, जो बॉलीवुड के ग्लैमर से एकदम दूर हैं पर मेरी छोटी-छोटी सफलताओं से काफ़ी खुश रहते हैं। वे सामने आकर बयान नहीं करते, लेकिन जब कभी हम बात करते हैं तो स्पष्ट तौर पर भावनाएं एक्सचेंज होती हैं।

जामवाल के जीवन मंत्र
मैं कभी वो आदमी नहीं बनना चाहता, जो उम्र या हैसियत का नाजायज़ फ़ायदा उठाता हो। मैंने देखा है, कई लोग कहते हैं कि उम्र ज़्यादा हो गई है और शरीर साथ नहीं दे रहा है। ये ख़ुद को धोखे में रखने के अलावा और कुछ भी नहीं है। जब तक जीना है, जुटे रहना है- यही जीवन मंत्र है।
आप अपने लिए समय नहीं जुटा सकते तो किसके लिए जुटाएंगे। हर व्यक्ति के पास भरपूर समय होता है। मैं इस सूत्र वाक्य पर पूरा भरोसा करता हूं। अगर मैंने सोच रखा है कि एक हज़ार पुशअप्स मारने हैं तो वो करने ही हैं। कई बार मैं सुबह साढ़े छह बजे शूटिंग के लिए पहुंच जाता हूं और काम तो साढ़े नौ बजे करना होता है तो आप ही सोचिए- अभ्यास पूरा करने के लिए कितना समय होता है।
बड़ा सोचकर बैठे रहेंगे तो कुछ नहीं होगा। याद रखें- छोटे-छोटे रेज़ोल्यूशन लेने से ही आपको बड़े परिणाम मिलते हैं।
बहाना बनाने वालों का तो भगवान भी कुछ नहीं कर सकता। उन्हें हर काम में कोई ना कोई एक्सक्यूज़ निकाल लेना होता है।
क़ामयाबी मुझे बदल नहीं पाई है। वैसे भी, सफलता अगर आपको आलसी बनाती है तो सक्सेसफ़ुल होने से अच्छा है कि विफल हो जाएं।
हम सब क्षमताओं से भरपूर हैं। उन्हें पहचानना चाहिए। जो कुछ कर रहे हों, उसमें ख़ुद को हंड्रेड परसेंट झोंक दें तो सफल होंगे ही।
सच है कि कई बार दो जून खाना नसीब नहीं होता, लेकिन कुछ हासिल करने की ज़िद में जुटे इंसान को ये सब महसूस नहीं होता।
उस शख्स को जो मुम्बई का या फ़िल्म इंडस्ट्री से ताल्लुक़ रखने वाला नहीं हैं, उसे सुविधाओं का मोह त्यागना ही होगा। मुसीबतों का आगे बढ़कर सामना करना होगा। कई बार मुझे कठिन एक्शन सीक्वेंस करते हुए डर भी लगता है, लेकिन मैं अपने पैर पीछे नहीं खींच सकता। आख़िरकार, चुनौतियों से दो-दो हाथ हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा?साथ ही इस दुनिया का हर आदमी बुरा नहीं है। इस बात को समझना बहुत ज़रूरी है।

स्टंट, मॉडलिंग और अभिनय

1980 के दिसम्बर माह की 10 तारीख़ को कानपुर में जन्मे विद्युत जामवाल की जड़ें जम्मू के राजपूत परिवार से जुड़ी हैं। विद्युत के शब्दों में, ‘सबसे पहले मैंने दिल्ली से करेस्पॉन्डेंस कोर्स से ग्रैजुएशन किया, इसके बाद मॉडलिंग। मॉडलिंग ने आत्मविश्वास जगाया, फ़ैशन के प्रति जागरूक किया और सिनेमा में जाने के रास्ते आसान कर दिए।’

1996 में विद्युत ने मॉडलिंग शुरू की। एक दशक बाद वे मुम्बई में बतौर अभिनेता सक्रिय हुए और अब यहीं रहते हैं। इस सबसे पहले उनके मन में विचार तो आ गया था कि आगे चलकर बतौर एक्शन हीरो फ़िल्म इंडस्ट्री में जाना है, लेकिन मॉडलिंग के बारे में तब भी नहीं सोचा था।

2011 में आई निशिकांत कामथ की ‘फ़ोर्स’ उनकी शुरुआती हिंदी फ़िल्म थी, जिसके लिए वे पहले ही ऑडिशन में चुन लिए गए थे। डेब्यू कलाकार के रूप में प्रभावी प्रदर्शन के लिए विद्युत को फ़िल्मफ़ेयर समेत कई अवार्ड मिले। लेकिन इंटरनेट पर बिखरी जानकारियों को जुटाएं तो पता चलता है कि तेलुगु फ़िल्म ‘सक्थी’ से विद्युत ने डेब्यू किया।

विद्युत बताते हैं...
‘लगातार ट्रैवल करने से ये फ़ायदा हुआ है कि बहुत-सी भाषाएं बोलना-पढ़ना आ गया है। एक मित्र की सलाह पर अपने एक्शन सीक्वेंसेज़ की शो रील बनाई। साउथ फ़िल्म इंडस्ट्री के कैमरामैन समीर रेड्डी तक वो शो रील पहुंचाई जिसे उन्होंने एनटीआर को दिखाया। उन्होंने मुझे छोटा-सा रोल दे दिया। फ़िल्म तो नहीं चली, लेकिन काम मिलने लगा। शुरुआत में रेकमेंडेशन से काम मिलता गया। कई हीरो एडिटिंग टेबल पर मेरे एक्शन सीन पर कैंची चलवा देते। कुछ अरसे बाद मेरी फ़िल्म ‘थुपकी’ आई। उसके हिट होने ने मेरे लिए भी सफलता के सारे रास्ते खोल दिए। मैंने भी अपनी मेहनत दस गुना ज़्यादा बढ़ा दी। सोच लिया था कि नहीं रुकूंगा तो चलता ही जा रहा हूं।

मैंने एक टीवी कार्यक्रम में बिग बी (अमिताभ बच्चन) को कहते सुना था- मैं उस माटी का वृक्ष नहीं, जिसको नदियों ने सींचा है, बंजर माटी में पलकर मैंने मृत्यु से जीवन खींचा है। यही पक्तियां मेरे जीवन का यथार्थ भी है।’

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