पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

Install App

Ads से है परेशान? बिना Ads खबरों के लिए इनस्टॉल करें दैनिक भास्कर ऐप

अंतर्चक्षु:जो देख नहीं सकते थे उनके लिए ज्ञान का उजाला किया था ब्रेल ने

यायावर8 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
  • ब्रेल लिपि एक ऐसी विधि है, जो कि दृष्टिबाधित मनुष्यों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। इसके पीछे एक ही व्यक्ति का जीवन संघर्ष है, जिनका नाम था लुई ब्रेल।
  • एक नुकीले औज़ार से हुए हादसे ने उनकी ज़िंदगी के रुख़ को सदा के लिए मोड़कर रख दिया था, किंतु किसने सोचा था कि वैसा ही नुकीला औज़ार इस दृष्टिबाधिता के विरुद्ध उनका सबसे बड़ा हथियार साबित होगा।
  • दृष्टिहीन मनुष्यों के लिए ज्ञान का द्वार खोलने वाले लुई ब्रेल के सम्मान में हर वर्ष 4 जनवरी को विश्व ब्रेल दिवस मनाया जाता है। यह लेख लुई ब्रेल को आदरांजलि है।

वर्ष 1812...
फ्रांस का कॉपव्रे गांव।

श्रीमान ब्रेल की घाेड़ों के लिए साज़ बनाने की एक दुकान थी, जो कि उनके घर के बग़ल में थी। चूंकि घर पास में ही था, इसलिए उनका 3 वर्षीय बेटा लुई दुकान में जाकर खेला करता था। इस काम में ब्रेल बड़े सिद्धहस्त थे और उनका क्षेत्र में बड़ा नाम था।

वे घोड़े की रास, काठी और जीन का भी निर्माण किया करते थे। वे चमड़े को काटकर उसमें बड़े नुकीले औज़ारों से छेद किया करते थे। लुई को कई बार उसके पिता हिदायत दे चुके थे कि ये औज़ार खेलने की चीज़ नहीं हैं। उस दिन, पिता ब्रेल एक ग्राहक की सहायता के लिए दुकान से बाहर की ओर आए। 3 वर्षीय लुई ने पिता को चमड़े में छेद करते देखा था और वह भी उसमें उसी तरह छेद करना चाहता था। उसने औज़ार उठाया और चमड़े में छेद करने की कोशिश की, लेकिन उसमें पिता जितनी शक्ति कहां थी! लुई ने फिर से कोशिश की, और ज़्यादा ताक़त लगाकर।

औज़ार उसके हाथ से फिसला और उछलकर सीधा उसकी बाईं आंख में जाकर लगा। अबोध लुई दर्द से चिल्ला उठा। उसके माता-पिता, दो बहनें और भाई दौड़ते हुए आए। बालक लुई की आंखों को कपड़े से ढंका।

दुर्भाग्य से कॉपव्रे में कोई अस्पताल न था। वे लुई को तुरंत उस महिला के पास लेकर पहुंचे, जो जड़ी-बूटियों की सहायता से इलाज किया करती थी। महिला ने एक कपड़े को जड़ी-बूटी के मिश्रण में मिलाया और लुई की आंख पर रखा। किंतु, इससे उसकी आंख में संक्रमण फैल गया और वह संक्रमण दूसरी आंख तक भी पहुंच गया।

बहुत कम समय में, लुई ने अपनी दोनों आंखों की रोशनी खो दी और वह सदा के लिए दृष्टिबाधित हो गया।

ये वो समय था, जब दृष्टिहीन हर कार्य के लिए दूसरों पर आश्रित हो जाते थे। सुविधासम्पन्न लोग ही बेहतर शिक्षा और सम्मानजनक जीवन के अधिकारी होते थे। अधिकतर भिक्षा का रास्ता अख़्तियार कर अपना जीवन अंत कर लेते थे। किंतु, लुई उनमें से न थे। इस दुर्घटना ने उन्हें एक परिवर्तन का वाहक बनाने का ज़िम्मा दे दिया था। यही लुई की नियति थी।

सबसे होनहार लुई
लुई के पिता ने उसे एक छोटी लकड़ी दे दी, जिससे कि वह सामने आने वाली चीज़ाें को पहले ही महसूस कर पाए।

लुई की उम्र उस वक़्त 6 वर्ष थी, जब उनके गांव में एक पादरी आए। उन्होंने लुई को एक वर्ष तक पढ़ाया, लेकिन लुई की ज़िद थी कि वो स्कूल जाना चाहता है, और बच्चों की तरह। लिहाजा उसे एक साथी मिल गया, जो उसे रोज़ घर से स्कूल तक साथ ले जाता। वह उसकी कक्षा में था।

लुई ने शिक्षक की आवाज़ को सुनना और याद करना शुरू किया। उसने यह काम इतने मन लगाकर किया कि वह जल्द ही बहुत सारी चीज़ें याद करने लगा और बावजूद इसके कि वह लिख-पढ़ नहीं सकता था, वह कक्षा का सबसे होनहार विद्यार्थी था। उसने वहां तीन वर्ष तक पढ़ाई की।

कई बार लुई इस बात को लेकर बड़ा परेशान हो जाता, उसे चिढ़ होने लगती कि वह क्यों नहीं लिख और पढ़ सकता है।

लुई को पढ़ाने वाले पादरी और स्कूल के प्राचार्य का यह मत था कि लुई का दृष्टिहीन बच्चों के स्कूल में दाख़िला करवा देना अधिक उचित रहेगा ताकि वह भावी जीवन सम्मान के साथ जी सके। किंतु सबसे बड़ी मुसीबत यह थी कि उस समय के फ्रांस में इस तरह का एक ही स्कूल था- रॉयल इंस्टिट्यूट फ़ाॅर ब्लाइंड यूथ। वह भी पेरिस में था, जो कि 25 मील के फ़ासले पर था।

जब यह बात लुई के माता-पिता तक पहुंची तो वे इस बात को लेकर अनिच्छुक प्रतीत हुए क्योंकि वे लुई को घर से दूर नहीं भेजना चाहते थे। लुई की उम्र 10 वर्ष थी और तिस पर उस स्कूल की फ़ीस बहुत ज़्यादा था।

पादरी ने लुई के माता-पिता को स्कूल में आवेदन देने के लिए राज़ी किया। स्कूल में लुई का दाख़िला हो गया।

नया स्कूल, नई चुनौती
स्कूल एक पुराने भवन में था। भवन की दीवारें नम और कमरे अंधेरे थे। छात्रों को बहुत ही कम भोजन दिया जाता था। कक्षा के बाद लुई ने वाद्ययंत्र चेलो और पियानो बजाना सीखना शुरू किया। हालांकि वह संगीत के नोट्स पढ़ तो सकता नहीं था इसलिए उसने नोट्स याद कर लिए।

लुई के हृदय में एक बड़ी प्रबल इच्छा थी कि वह किसी भी तरह पढ़ पाए। किंतु, दुर्भाग्य ने लुई का तीन वर्ष की उम्र से जो दामन थामा था कि वह लम्बे समय तक उसके साथ बना रहा।

दृष्टिहीनों के लिए तब बहुत ही कम पुस्तकें मौजूद थीं और वे भी भारी वैक्स पेपर पर प्रकाशित होती थीं। इनमें अक्षरों को उकेरने के लिए लीड के टुकड़ों पर वैक्स पेपर को दबाया जाता था, जिससे वे अक्षरों का आकार ले लेते थे। इस प्रक्रिया को ‘एम्बॉसिंग’ यानी एक प्रकार की उभारदार नक्क़ाशी कहते हैं। ये पुस्तकें बड़ी वज़नी हुआ करती थीं। एक वाक्य पूरे पेज में भी आ सकता था।

लुई ने पेज के ऊपर अपनी ऊंगलियां फिराना सीखना शुरू किया ताकि वह शब्दों काे महसूस करके समझ सके। लेकिन यह प्रक्रिया बहुत समय लेती थी और अक्सर ऐसा होता था कि वह वाक्य के आख़िरी शब्द तक पहुंचते-पहुंचते पहला शब्द भूल बैठता।

इन क़िताबों को पढ़ना वास्तव में एक कठिन चुनौती था।

बदलाव की बयार

एक दिन...
फ्रेंच आर्मी से सेवानिवृत्त कप्तान चार्ल्स बार्बीयर लुई के स्कूल पहुंचे। उन्होंने एक ऐसे तरीक़े की ईजाद की थी, जिसके द्वारा सैनिक रात के समय बिना बोले और बिना रोशनी के एक-दूसरे को संदेश भेज सकते थे। इस कार्य के लिए उन्होंने एक नुक़ीले औज़ार की मदद ली थी, और उन्होंने एक भारी काग़ज़ पर डॉट (.) और डैश (-) बनाए थे।

ये डॉट और डैश अलग-अलग ध्वनियों के प्रतिनिधि थे। इस तरह के निशानों को समायोजित कर शब्द बनाए जा सकते थे और उन्हें बिना रोशनी और आवाज़ के भी पढ़ा जा सकता था। सैनिकों को यह पद्धति सीखने में मुश्किल पेश आई। इसलिए कप्तान ने सोचा कि शायद यह तकनीक दृष्टिहीन छात्रों के काम आ सके।

स्कूल के छात्रों ने भी कुछ संदेश पढ़ने की कोशिश की, लेकिन उनके लिए भी यह बड़ा मुश्किलभरा साबित हुआ। हालांकि, इस विधि ने मौजूदा नक्क़ाशी की विधि से कम जगह में अधिक शब्दों को प्रदर्शित कर दिया था।

सारे बच्चों में लुई इस नई विधि को सीखने के लिए काफ़ी उत्साहित थे। वे जानते थे कि इसे आसान बनाया जा सकता था। उन्हें इस विधि में विराम चिह्न और संख्या को भी दर्शाने का तरीक़ा खोजना था।

लिहाजा अपने ख़ाली समय में वे कैप्टन की इस विधि के सरलीकरण में जुट गए। उन्होंने जी तोड़ मेहनत की। स्टायलस नामक नुकीले उपकरण और एक लकड़ी के बोर्ड को लेकर लुई इस काम में जुट गए।

2 सालों की मेहनत के बाद 15 वर्ष की उम्र में लुई एक नया कोड बनाने में सफल रहे। यह नया कोड सीखने और पढ़ने में आसान था।

लुई इसे रॉयल इंस्टिट्यूट के डायरेक्टर के पास ले गए। कोड का परीक्षण करने के लिए डायरेक्टर ने अख़बार का एक लेख ऊंची आवाज़ में पढ़ा।

लुई ने स्टायलस से बोर्ड पर वो सब लिखा, जो डायरेक्टर बोल रहे थे। जब डायरेक्टर पढ़ चुके तो लुई ने बोर्ड पर अपनी उंगलियां फेरकर वही सब शब्दश: सुना दिया, जो डायरेक्टर ने पढ़ा था। डायरेक्टर प्रभावित हुए।

लुई ने कभी नहीं सोचा था कि 3 वर्ष की उम्र में जो नुकीला औज़ार उनके लिए अभिशाप साबित हुआ था, वही उनके लिए सबसे बड़ा वरदान साबित होगा।

नए युग की शुरुआत
और फिर...
लुई के सहपाठियों ने भी इस नई विधि को सीखना शुरू किया और वे इसे सीखकर बड़े ख़ुश हुए, क्योंकि यह बहुत अच्छी तरह कार्य कर रहा था। अब उन्हें बड़े-बड़े पाठ को याद करने की और ज़रूरत नहीं थी और वे अब नोट्स बना सकते थे। उन्हें पढ़ने और लिखने के लिए किसी और की सहायता की आवश्यकता नहीं थी।

लुई बड़े ख़ुश थे कि उनके साथियों को यह नया कोड पसंद आया था, लेकिन वे चाहते थे कि इस नए कोड को स्कूल के बाहर भी दृष्टिबाधित लोग अपना पाएं।

स्कूल डायरेक्टर ने फ्रांस सरकार को लिखा कि लुई की इस नई विधि को दृष्टिहीन लोगों के लिए आधिकारिक तौर पर अपनाया जाए। इसी बीच लुई इंस्टिट्यूट में सहायक अध्यापक बन गए। उनकी कक्षाएं प्रसिद्ध हो गईं।

वे किताबों को अपने इस नए कोड में उतारने में अधिक से अधिक समय बिताने लगे। उन्होंने प्रतीकों को भी इसमें जोड़ना शुरू किया ताकि दृष्टिहीन संगीतकार संगीत को लिख और पढ़ पाएं।

आख़िरकार उन्होंने एक पुस्तक प्रकाशित की, जिसमें उन्होंने अपने इस नए कोड को विस्तार से समझाया था।

नहीं मिला प्रोत्साहन
लुई ने ऑर्गन नामक वाद्ययंत्र भी बजाना सीख लिया और वे इतना उम्दा इसे बजाने लगे कि पास ही के चर्च में एक ऑर्गन बजाने वाले व्यक्ति के रूप में कार्य करने लगे।

जल्द ही वे संस्थान में पूर्णकालिक शिक्षक भी बन गए। वर्ष 1834 में लुई ने इंडस्ट्री एग्ज़ीबिशन में अपनी डॉट अक्षरों वाली विधि प्रदर्शित की। वहां सभी तरह के आविष्कार प्रदर्शित किए गए थे। वे वहां लोगों द्वारा बोले गए शब्दों के नोट्स बनाते और फिर उन्हें पढ़कर सुनाते।

फ्रांस के महाराज ने प्रदर्शनी में लुई के आविष्कार को देखा, लेकिन उन्होंने न तो इसे दृष्टिहीनों की आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार किया और न ही इस विधि में पुस्तकें तैयार करने के लिए किसी तरह की राशि प्रदान की।

जब लुई पेरिस की इस प्रदर्शनी से लौटे तो वे बड़े निराश हुए कि उनकी यह विधि दूसरे दृष्टिबाधित लोगों के लिए उपलब्ध न हो पाएगी। पिछले कुछ वर्षों में वे कभी-कभी थके हुए महसूस करते थे। कभी-कभी उन्हें अत्यधिक कफ़ और बुख़ार भी हो जाता था।

धीरे-धीरे वे बीमार रहने लगे। उन्हें टीबी का रोग हो गया था। उस समय इस मर्ज़ की सिर्फ़ एक ही दवा थी- शुद्ध वायु और आराम। लुई ने पढ़ाना कम किया और बाहर वक़्त बिताना शुरू कर दिया। लेकिन वे लगातार अपनी डॉट विधि का परिमार्जन करते रहते थे।

इसी बीच राॅयल इंस्टिट्यूट फ़ॉर ब्लाइंड यूथ में नए डायरेक्टर आए। उन्होंने आते ही लुई की इस नई विधि पर रोक लगा दी। उन्हें इस बात का भय था कि इस विधि से छात्र अधिक स्वावलम्बी बन जाएंगे और फिर उन्हें शिक्षकों की आवश्यकता नहीं रहेगी।

लुई को बड़ी निराशा हुई, साथ ही उनका स्वास्थ्य भी दिन-ब-दिन गिरता रहा। लेकिन वे लगातार डॉट सिस्टम में किताबें और संगीत को अनूदित करते रहे।

दृष्टिहीनों के जीवन में आशा की एक नई किरण जगाने वाले लुई ने 1852 में पेरिस में अंतिम सांस ली।

26 साल बाद...

फ्रांस सरकार ने डॉट प्रणाली को मंज़ूरी दी। इस प्रणाली को लुई के सम्मान में ब्रेल कहकर पुकारा गया। फिर 1878 का वह महान दिन भी आया, जब ‘वर्ल्ड कांग्रेस फ़ॉर ब्लाइंड’ ने दुनियाभर के दृष्टिहीन लोगों के पढ़ने और लिखने के लिए ब्रेल लिपि को अपनाया। संयुक्त राष्ट्र की कोशिशों से दुनिया की लगभग हर भाषा ने ब्रेल को अपनाया। आज ब्रेल लिपि में कई पुस्तकें उपलब्ध हैं। अत्याधुनिक मशीनों से इस लिपि में नए-नए कार्य आज किए जा रहे हैं। फ्रांस के कोपव्रे में लुई ब्रेल का घर आज एक संग्रहालय है। दीवार पर एक फलक है।

उस पर लिखा है कि लुई ब्रेल ने इस घर में जन्म लिया था और उन्होंने दृष्टिहीन लोगों के लिखने-पढ़ने के लिए डॉट सिस्टम की ईजाद की।

इसी में आगे लिखा है-

उन्होंने उन लोगों के लिए ज्ञान के द्वार खोले, जो देख नहीं सकते थे।

आज का राशिफल

मेष
Rashi - मेष|Aries - Dainik Bhaskar
मेष|Aries

पॉजिटिव- आज परिस्थितियां अति अनुकूल है। कार्य आसानी से संपन्न होंगे। आपका अधिकतर ध्यान स्वयं के ऊपर केंद्रित रहेगा। अपने भावी लक्ष्यों के प्रति मेहनत तथा सुनियोजित ढंग से कार्य करने से काफी हद तक सफलत...

और पढ़ें

Open Dainik Bhaskar in...

  • Dainik Bhaskar App
  • BrowserBrowser