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दोहे:आओ हम मिल बांध दें, अफ़वाहों के पैर

सुशील यादव21 दिन पहले
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छोड़ो भूली याद को, गुज़रा समय प्रसंग साथ एक फागुन गया, दूजा सावन संग

जग में सारे घूम के, लगता रहा कयास ज़्यादा धन का जोड़ना, करता बहुत उदास

छू सकती है ये नदी, ख़तरा क्रूर निशान क़िस्मत संग बहे नहीं, हाथों का सामान

जाने क्यों इस बार भी, मौसम लगे तनाव रेतीले मरुथल कहां, लेकर घूमे नाव

जाने क्यों अब जी कहे, दिल्ली है अति दूर खोया क्या हमने यहां, पाया सब भरपूर

जितने हम नज़दीक थे, उतने ही अब दूर जो थी अपनी सादगी, शायद वही क़सूर

आओ हम मिल बांध दें, अफ़वाहों के पैर दो गज दूर चले नहीं, बिन मक़सद के बैर

आज कोरोना त्राण से, करता हूं आगाह भूले से मत खोलना, बोतल जिन्न गुनाह

फ़ुर्सत की चादर बिछा, बैठे नीचे नीम ढूंढे से मिलते नहीं, अब वे वैद्य-हकीम

नदिया सूखी यूं मिलीं, तैरा नहीं जहाज़ मन के भीतर झांक ले, ठहरा-ठहरा आज

पसरी केवल सादगी, छूट गया सब मोह इस जंगल के रास्ते, उस घाटी तक खोह

मर्ज़ वही है जानता, पर है नीम-हकीम हल्के-फुल्के रोग में, नुस्ख़ा लिखता नीम

समझौतों के बीच में, कूद रहा ये कौन आपस का है मामला, रह लो तुम भी मौन

पी लें कुंआ खोद के, अब वो नहीं रिवाज़ मन सहता है देखते, डूबा पड़ा जहाज़

जहां-जहां अब जा रहा, वहीं हुआ हूं ढेर मेरी उतरन खाल में, जंगल घूमे शेर

पिघले पत्थर दिल कभी, करना हमको याद जुदा हुए कब भूलते, अपनेपन का स्वाद

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