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शब्दराग:उर्दू के मशहूर शायर क़तील शिफ़ाई की रचनाएं

8 दिन पहले
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साल 1919 को अविभाजित पंजाब की तहसील हरिपुर, ज़िला हज़ारा में जन्मे क़तील शिफ़ाई यूं तो पाकिस्तान के शायर थे, लेकिन हिंदुस्तान में भी उनकी शोहरत कम नहीं। उनका वास्तविक नाम मोहम्मद औरंगज़ेब था। क़तील उनका तख़ल्लुस था और अपने उस्ताद शिफ़ा कानपुरी के ऐहतराम में उन्होंने इसमें शिफ़ाई जोड़ दिया था। उनके कई नग़मों को फ़िल्मों में इस्तेमाल किया गया है, जो अवाम के कानों पर चढ़े हैं।

उनकी शायरी में झरनों का संगीत, फूलों की महक और ख़ूबसूरत नज़र मिलती है। बक़ौल प्रकाश पंडित, क़तील शिफ़ाई ने उर्दू शायरी की नई डगर को अधिक से अधिक साफ़, सुंदर, प्रकाशमान बनाने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है। संगीतधर्मी छंदों के चुनाव, चुस्त सम्मिश्रण और गुनगुनाते शब्दों के प्रयोग के कारण उन्हें शायरों के दल में तुरंत पहचाना जा सकता है। क़तील की शायरी की चौदह किताबें शाया हुई हैं।

कितना पानी
बोल समंदर बोल कि तुझमें कितना पानी
जितना तुझमें उतरें उतनी बढ़ जाए हैरानी
बोल समंदर बोल कि तुझमें कितना पानी

ऊपर ऊपर चुप चुप रहना अंदर अंदर छिप छिप बहना लेकिन पूनम रात जब आए तब करना मनमानी बोल समंदर बोल कि तुझमें कितना पानी

सीढ़ी तुझमें कौन लगाए कौन तेरी थाह न पाए हर इक राह कठिन है तेरी हर मंज़िल तूफ़ानी बोल समंदर बोल कि तुझमें कितना पानी

झांक ज़रा तू मेरे अंदर मेरा मन भी एक समंदर फ़र्क़ है इतना तुझमें पानी मुझमें है वीरानी बोल समंदर बोल कि तुझमें कितना पानी

बांझ मौसम
वसंत भी नहीं
कि हर्फ़ रंग लूं पीले पीले रंग में
बहार भी नहीं
कि फूल टांक लूं किसी नई उमंग में

ख़िज़ां भी वो नहीं कि ख़ुश्क़ पत्तियां ओस में भिगो सकूं समां भी वो नहीं कि जिसकी तल्ख़ियां सुरूर में डुबो सकूं

गूंग अपने साज़ की एक-एक झांझ है किस तरह बशारतों का हो जनम जब दुलहन ही मौसमों की बांझ है

बशारत: ख़ुशख़बरी

पेशगोई
सोने की अंगूठी में ये हीरे का नगीना
तोहफ़ा तेरा लेते हुए दिल कांप रहा है
आग़ाज़ में अंजाम की बातें मेरे महबूब
अहसास की रग-रग में लहू हांफ रहा है

वो ख़्वाब जो मैंने तिरी आंखों से निचोड़ा अफ़सोस कि इस ख़्वाब की तामीर ग़लत है मैंने तो न चाहा था ये सोने का दरीचा शायद तेरे फ़िरदौर की तामीर ग़लत है

अफ़सोस तेरी मस्लहत-अंदेश मुहब्बत दिल से नहीं सोने से मुझे तौल रही है लेकिन मिरे महबूब इसे कौन छिपाए वो राज़ जो हीरे की कनी खोल रही है

धुल जाएंगे जिस वक़्त शफ़क़ज़ार लबों से जब हुस्न के शादाब नज़ारे न रहेंगे जब चांद-से माथे पे न फूटेगा उजाला जब रात-सी आंखों में सितारे न रहेंगे

हो जाएगा उरियां तेरी फ़ितरत का तलव्वुन हीरे से उतर जाएगा सोने का लबादा जिस वक़्त मैं आफ़ाक़ में रह जाऊंगी तनहा हीरा मेरे काम आएगा सोने से ज़ियादा

ताबीर: सपनों का फल / फ़िरदौर की तामीर: स्वर्ग जैसी रचना / मस्लहत-अंदेश: सतर्क / शफ़क़ज़ार: सुर्ख़ / शादाब: रंगीन / उरियां: नग्न / तलव्वुन: खिलंदड़ स्वभाव / आफ़ाक़: दुनिया

सरताज
चिलमन से उभरती हैं खनकती हुईं किरनें
गाती है फ़ज़ां में कोई ज़रपोश कलाई
मैं हल्क़-ए-नग़मात में हैरान खड़ा हूं
आंखों में समेटे हुए एक जश्ने-तिसाई

ये जश्ने-मसर्रत जिसे तख़लीक़ किया है आराम से बीते हुए पच्चास बरस ने ये क़ाफ़िला-ए-उम्र की रौंदी हुई मंज़िल पूजा है जिसे हिर्स की आवाज़े जरस ने

ये सांस ये सूखे हुए पत्तों का तरन्नुम ये जिस्म ये टूटा हुआ पीतल का कटोरा ये रंग ये तेज़ाब में डूबी हुई चांदी ये उम्र ये यादों की हवाओं का हिलोरा

कुछ भी न सही ख़ून की बेकैफ़ हरारत दौलत ने इसे प्यार का हक़ दे तो दिया है गुलचीं की मचलती हुई मुश्ताक़ नज़र ने कोंपल को हिना बार क़लक़ दे तो दिया है

रातों की हब्स से कि गजरदम की हवाएं गजरों की ये झंकार झरोखे में रहेगी जब तक न हक़ायक़ से हटा दे कोई पर्दा औरत यूं ही अख़लाक़ के धोखे में रहेगी

ज़रपोश: सोने के ज़ेवरात से लदी / हल्क़-ए-नग़मात: गीतों के दायरे में / जश्ने-तिसाई: सुनहरा जश्न / हिर्स: लालच / गुलचीं: माली / मुश्ताक़: उत्सुक / हिना बार क़लक़: मेहंदी जैसी बेचैनी / हब्स: घुटन / अख़लाक़: ख़ुशफ़हमी

आपबीती
मेरे ख़्वाबों के शबिस्तां में उजाला न करो
कि बहुत दूर सवेरा नज़र आता है मुझे
छुप गए हैं मेरी नज़रों से ख़दो-ख़ाले-हयात
हर तरफ़ अब्र घनेरा नज़र आता है मुझे
चांद-तारे तो कहां अब कोई जुगनू भी नहीं
कितना शफ़्फ़ाक़ अंधेरा नज़र आता है मुझे

कोई ताबिंदा किरन यूं मेरे दिल पर लपकी जैसे सोए हुए मज़लूम पे तलवार उठे किसी नग़मे की सदा गूंज के यूं थर्राई जैसे टूटी हुई पाजेब से झंकार उठे मैंने पलकों को उठाया भी तो आंसू पाए मुझसे अब ख़ाक जवानी का कोई बार उठे

तुमने रातों में सितारे तो टटोले होंगे मैंने रातों में अंधेरे ही अंधेरे देखे तुमने ख़्वाबों के परिस्तां तो सजाए होंगे मैंने माहौल के शबरंग फरेरे देखे तुमने इक तार की झंकार तो सुन ली होगी मैंने गीतों में उदासी के बसेरे देखे

मेरे ग़मख़्वार मेरे दोस्त तुम्हें क्या मालूम ज़िंदगी मौत की मानिंद गुज़ारी मैंने एक बिगड़ी हुई सूरत के सिवा कुछ भी न था जब भी हालात की तस्वीर उतारी मैंने किसी अफ़लाक-नशीं ने मुझे दुत्कार दिया जब भी रोकी है मुक़द्दर की सवारी मैंने

मेरे ग़मख़्वार मेरे दोस्त तुम्हें क्या मालूम?

शबिस्तां: शयनागार/ ख़दो-ख़ाले-हयात: जीवन की रूपरेखाएं / अब्र: बादल / शफ़्फ़ाक़: निर्मल / ताबिंदा : चमकदार / मज़लूम : अत्याचार से पीड़ित / सदा : आवाज़ / शबरंग फरेरे: रात के रंग वाले झंडे / ग़मख़्वार : हमदर्द / मानिंद : तरह / अफ़लाक-नशीं: आकाशवासी / मुक़द्दर : भाग्य

ग़ज़ल: एक
टूटने और बिखरने का चलन मांग लिया
हमने हालात से शीशे का बदन मांग लिया

जब सुना आएंगे कुछ लोग नसीहत करने एक दूजे से वहीं हमने वचन मांग लिया

ज़ोर था शेख़ो-बरहमन का हरेक बस्ती में हमने रहने को अलग शह्रे-सुख़न मांग लिया

हम भी मौजूद थे तक़दीर के दरवाज़े पर लोग दौलत पे गिरे हमने वतन मांग लिया

जिसकी तहरीर में होना था हमें दफ़्न क़तील उसने वापस वही काग़ज़ का कफ़न मांग लिया

शह्रे-सुख़न: कविता की बस्ती / तहरीर: लिखित प्रमाण

ग़ज़ल: दो
वफ़ा के जंगलों में खो गया तो
मिरे दिल को अगर कुछ हो गया तो

बहुत इलज़ाम आए धूप के सर जो सायों में मुसाफ़िर खो गया तो

मुअज़्ज़िन की अज़ां बरहक़ है लेकिन नमाज़ी जागकर फिर सो गया तो

जहां दरकार हैं लफ़्ज़ों की फ़स्लें वहां कोई ख़मोशी बो गया तो

क़तील इक दाग़ है तौबा का मुझ पर कोई बादल उसे भी धो गया तो?

मुअज़्ज़िन: सुबह की अज़ान देने वाला / बरहक़: उचित

ग़ज़ल: तीन
तूने ये फूल जो ज़ुल्फ़ों में सजा रक्खा है
इक दिया है जो अंधेरों में जला रक्खा है

जीत ले जाए मुझे कोई नसीबों वाला ज़िंदगी ने मुझे दांव पे लगा रक्खा है

जाने कब दिल में कोई झांकने आ जाए इसलिए मैंने गरेबान खुला रक्खा है

इम्तिहान और मेरे ज़ब्त का तुम क्या लोगे मैंने धड़कन को भी सीने में छिपा रक्खा है

दिल था इक शोला मगर बीत गए दिन वो क़तील अब कुरेदो ना इसे राख में क्या रक्खा है

गरेबान : गर्दन के चारों ओर वाला कपड़े का भाग ज़ब्त : छुपाने की कला

ग़ज़ल: चार
परीशां रात सारी है सितारो तुम तो सो जाओ
सुकूत-ए-मर्ग तारी है सितारो तुम तो सो जाओ

हंसो और हंसते हंसते डूबते जाओ ख़लाओं में हमीं पे रात भारी है सितारो तुम तो सो जाओ

तुम्हें क्या आज भी कोई अगर मिलने नहीं आया ये बाज़ी हम ने हारी है सितारो तुम तो सो जाओ

कहे जाते हो रो रो कर हमारा हाल दुनिया से ये कैसी राज़दारी है सितारो तुम तो सो जाओ

हमें भी नींद आ जाएगी हम भी सो ही जाएंगे अभी कुछ बे-क़रारी है सितारो तुम तो सो जाओ

सुकूत-ए-मर्ग: मृत्यु की-सी चुप्पी / ख़ला: अंतरिक्ष, एकाकीपन, शून्य

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