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कवि का गद्य:प्राणों को दांव पर रखकर लिखा था दिनकर ने 'उर्वशी' काव्य, फिर उसी के लिए मिला था ज्ञानपीठ पुरस्कार

एक महीने पहले
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  • रामधारी सिंह ‘दिनकर' का परिचय लिखना सूर्य को दीपक दिखाने के समान होगा। दिनकर की प्रतिष्ठा राष्ट्रकवि और एक जनकवि के रूप में है। उन्हें ‘उर्वशी’ काव्य के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
  • महादेवी वर्मा ने कहा था कि- वे विश्वकवि हैं, क्योंकि उनकी कविताओं में मात्र राष्ट्रीयता की वाणी और उसकी स्वायत्तता का गौरवगान और संघर्ष नहीं है, वरन् प्रेम का एक व्यापक क्षितिज है जो उन्हें विश्वकवि की श्रेणी में ले आता है।
  • भारतवर्ष के इन्हीं जनकवि की पुण्यतिथि अप्रैल माह की 24 तारीख़ को है। इस प्रसंग में उनके द्वारा लिखित डायरी का एक अंश यहां प्रस्तुत है।

2 जनवरी, 1961
दिल्ली

कल रात ‘उर्वशी’ काव्य पूरा हो गया। लगता है, माथे पर से एक बोझ उतर गया। पहले कवि चाहता है कि कविता मुझे पकड़ ले और जब कविता उसे पकड़ लेती है, तब कवि से न सोते बनता है, न जागते बनता है। अधूरी कविता क्षण-क्षण उसके दिमाग़ में सुई चुभोती रहती है और जब तक कविता पूरी न हो जाए, कवि दिन-रात परेशानी में पड़ा रहता है। रचना का यह दर्द ‘उर्वशी’ के प्रसंग में मैंने आठ वर्षों तक लगातार भोगा है।
सन् 1953 ई. में आकाशवाणी के श्री करतारसिंह दुग्गल ने मुझसे कहा था कि रेडियो से प्रसारित करने के लिए आप हमें कोई पद्य-नाटक लिखकर दीजिए। ‘उर्वशी' का आरम्भ दुग्गल जी के उसी अनुरोध से हुआ था और उसका प्रथम अंक रेडियो से प्रसारित भी हुआ था। किंतु प्रथम अंक के प्रसारित हो जाने के बाद मैंने कहा, ‘दुग्गल जी, अब इसका आगे का अंश मैं रेडियो की दृष्टि से नहीं लिखूंगा। इस काव्य के भीतर मुझे बहुत बड़ी सम्भावना दिखाई देने लगी है। अब कविता उसी राह से चलेगी, जिस राह से वह चलना चाहेगी।' अतएव रेडियो से प्रसारण की बात वहीं ख़त्म हो गई।
इस काव्य की रचना में मुझे जितनी कठिनाई हुई है, उतनी किसी अन्य काव्य की रचना में नहीं हुई थी। कविता जहां आकर रुक गई, उसे वहां से आगे ले चलने का रास्ता दो-दो वर्ष तक नहीं सूझा। इस काव्य की पांडुलिपि और अन्य सामग्री को लिए हुए मैं कहां-कहां नहीं घूमा हूं! यहां दिल्ली में कभी जयदयाल जी के घर में जा छिपता था, कभी चरतराम जी के घर में। एक बार सारी सामग्री के साथ कश्मीर चला गया था, लेकिन कविता की एक पंक्ति भी नहीं बनी। एक बार रांची के रायबहादुर हरखचंद के बाग़ीचे में डेरा डाल दिया था। वहां कुछ थोड़ा काम हुआ। लेकिन ज़्यादा काम सन् साठ में हुआ और वह काम आख़िर को दिल्ली और पटना में ही हुआ।
सन् साठ में मैं बीमार हो गया था और लगता था कि सम्भव है, अब चल देना पड़े। मगर ‘उर्वशी’ को पूरा किए बिना मैं मरना नहीं चाहता था इसलिए कविता की रचना मैंने ज़बरदस्ती शुरू कर दी। फिर यही ज़बरदस्ती प्रेरणा में बदल गई और कविता ने मुझे ज़ोर से पकड़ लिया। किंतु, जभी मैं गम्भीर समाधि में जाता, मुझे मूर्च्छा आ जाती। यह बात मैंने पटना के डॉक्टर घोषाल साहब से कही। उन्होंने कहा, ‘अभी काव्य-रचना आप छोड़ दीजिए।’ फिर जब मैंने बहुत आग्रह किया कि ‘अब तो प्राण का मोह छोड़कर इस कविता को पूरा करना है’, तब उन्होंने कहा कि ‘मूर्च्छा आने पर थोड़ा-सा मधु चाट लिया करें।' इस प्रकार प्राणों का संकट झेलकर मैंने इस काव्य को पूर्ण कर दिया। आज मैं बहुत ही ख़ुश हूं, बहुत ही हल्का हो गया हूं।
‘उर्वशी’ के कम्पोज़िशन से मुझे बहुत ही संतोष है। यह काव्य जिस रूप में लिखा गया है, उसे उससे अधिक सुंदर रूप में लिखना मेरी शक्ति के बाहर की बात थी। मुझे लगता है, मैंने इसकी रचना नहीं की है, यह अदृश्य में कहीं लिखा-लिखाया पड़ा हुआ था। मैंने मात्र उसका अनुसंधान कर लिया है।
आज पंत जी को ‘उर्वशी’ के बारे में मैंने जो पत्र लिखा है, उसमें अपना यह विश्वास भी मैंने लिख दिया है-
मैं घोर चिंतना में घुसकर
पहुंचा भाषा के उस तट पर,
था जहां काव्य यह धरा हुआ,
सब लिखा-लिखाया पड़ा हुआ।
बस, झेल गहन गोते का सुख
ले आया इसे जगत् सम्मुख।

लोकभारती प्रकाशन द्वारा दिनकर ग्रंथमाला के तहत प्रकाशित पुस्तक ‘दिनकर की डायरी' से साभार

उर्वशी काव्य का एक अंश

यह शिला-सा वक्ष, ये चट्टान-सी मेरी भुजाएं सूर्य के आलोक से दीपित, समुन्नत भाल, मेरे प्राण का सागर अगम, उत्ताल, उच्छल है। सामने टिकते नहीं वनराज, पर्वत डोलते हैं, कांपता है कुण्डली मारे समय का व्याल, मेरी बांह में मारुत, गरुड़, गजराज का बल है। मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूं मैं, उर्वशी! अपने समय का सूर्य हूं मैं। अंध तम के भाल पर पावक जलाता हूं, बादलों के सीस पर स्यंदन चलाता हूं पर, न जाने, बात क्या है! इंद्र का आयुध पुरुष जो झेल सकता है, सिंह से बांहें मिलाकर खेल सकता है, फूल के आगे वही असहाय हो जाता, शक्ति के रहते हुए निरुपाय हो जाता। विद्ध हो जाता सहज बंकिम नयन के बाण से जीत लेती रूपसी नारी उसे मुस्कान से। मैं तुम्हारे बाण का बींधा हुआ खग, वक्ष पर धर शीश मरना चाहता हूं। मैं तुम्हारे हाथ का लीला कमल हूं प्राण के सर में उतरना चाहता हूं।

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