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हास्यपुराण:दुर्याेधन के गिरने पर द्रौपदी नहीं, भीम हंसे थे, महाभारत की ऐसी ही घटनाएं जिनमें हंसी की बड़ी भारी क़ीमत चुकानी पड़ी

डॉ. विवेक चौरसियाएक महीने पहले
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  • माना कि हंसना तन, मन और जीवन के लिए ज़रूरी है, इसलिए अधिक से अधिक हंसते-मुस्कराते हुए जीना चाहिए, लेकिन यह क़ायदा हर जगह लागू नहीं होता।
  • जीवन में अनेक अवसर ऐसे भी होते हैं, जब हमारी हंसी हमारे लिए तो आनंददायक होती है, मगर दूसरों के लिए दुःखदायी बन जाती है। ऐसी हंसी न हंसने वाले के लिए शुभ होती है, न कि उस पर जिसकी हंसी उड़ाई गई है।

हम जीवन में अक्सर छोटी-छोटी हंसी-मज़ाक़ के कारण मची बड़ी महाभारत को देखते रहते हैं, किंतु कभी भी उनसे सबक़ नहीं लेते। जबकि यह हास उपहास बनकर दोनों उन दोनों पक्षों के बीच कटुता ही बढ़ाता है। ऐसे में ‘महाभारत’ की ये चार कथाएं और उनसे हासिल होने वाले सबक़ हमें सिखाते हैं कि ग़लत समय और ग़लत व्यक्ति पर, ग़लत ढंग और ग़लत नीयत से हंसने की हमें और देशकाल को कितनी भारी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है।

दुर्योधन का गिरना और भीम का हंसना

महाभारत में दुर्योधन और उसके भाई खलनायक माने जाते हैं, लेकिन लोगों को यह कम ही पता है कि कौरव-पांडवों की दुश्मनी में भीम के मुंह का बड़ा हाथ था। भीम कौरवों की हंसी उड़ाने का मौक़ा भी नहीं चूकते थे। भीम की इसी आदत ने पांडवों के प्रति बचपन से जलन रखने वाले दुर्योधन के मन में वैर की आग को और अधिक धधका दिया था। सभापर्व की कथा के अनुसार राज्य के बंटवारे में युधिष्ठिर को खांडवप्रस्थ का क्षेत्र मिला था, जिसे श्रीकृष्ण की कृपा से पांडवों ने सुंदर इंद्रप्रस्थ बना लिया था। इस नगर में मयदानव ने युधिष्ठिर के लिए एक अपूर्व महल बनाया था। इसकी ख़ूबी यह थी कि उसमें जल में स्थल का और स्थल में जल का भ्रम हो जाता था। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में जब दुर्योधन इस महल को देखने पहुंचा, तब ज़मीन के धोखे में पानी में गिर गया। तब ‘जले निपतितं दृष्ट्वा भीमसेनो महाबल:। जहास जहसुश्चैव किंकराश्च सुयोधमन।।’ अर्थात दुर्योधन को जल में गिरा देख भीमसेन हंसने लग। माना जाता है कि तब द्रौपदी दुर्योधन पर हंसी थी लेकिन सभापर्व की मूल कथा के अनुसार इस घटना के समय युधिष्ठिर और द्रौपदी दोनों ही वहां नहीं थे। भीम के साथ तीनों छोटे भाई और श्रीकृष्ण खड़े थे। दुर्योधन स्वभाव से जन्मजात चिड़चिड़ा था ही, उस अहंकारी को यह हंसी इतनी चुभी कि वह इसे कभी भूल न सका। अंततः यह हंसी भाई-भाई के बीच महाभारत कराकर आंसुओं के साथ ही धुली।

सबक़

किसी के गिर जाने पर उसे दुर्योधन की तरह गंवार समझकर हम भी अक्सर भीम की तरह भूल कर जाते हैं जबकि यदि हम सहायता न करें तो कम से कम श्रीकृष्ण की तरह तटस्थ रहे। गिरे हुए का उपहास असल में न सही, मन में तो कुरुक्षेत्र सजा ही देगा।

ओ बैल... ओ बैल... बोलते दुःशासन का नाच

शकुनि की मदद से कौरवों ने जब जुएं में पांडवों का सारा राज्य हथिया लिया, तब शर्त के अनुरूप पांचों पांडव द्रौपदी को साथ लेकर वन के लिए निकले थे। जब वे राजसी वस्त्र त्यागकर मृगचर्म में सबके बीच आए तो दुःशासन उन्हें कष्ट में देखकर ख़ुशी से नाच उठा। वह अपने बड़े भाई दुर्योधन के गिरने पर भीम द्वारा उड़ाया मज़ाक भूला नहीं था। बचपन से ही सारे कौरव भाई अधिक खाने और लड़ने के कारण भीम को ‘बैल’ कहकर चिढ़ाते थे। उस समय भी पांडवों को दुर्दशा में पड़ा देख ‘एव ब्रुवाणमजिनैर्विवासितं दुःशासनस्तं परिनृत्यति स्म। मध्ये कुरूणां धर्मनिबद्धमार्गे गौगौरिति स्माह्रयन् मुक्तलज्ज:।।’ अर्थात मृगचर्म धारण किए भीम को देखकर निर्लज्ज दुःशासन कौरवों के बीच में उनकी हंसी उड़ाते हुए नाचने लगा और ‘ओ बैल, ओ बैल’ पुकारने लगा। उस समय दुःशासन को मारने पर उतारू भीम को जैसे-तैसे युधिष्ठिर ने रोका। इतिहास गवाह है कि दुःशासन की इस हंसी ने भीम को इतना भड़काया कि उन्होंने उसी घड़ी भावी युद्ध में उसे मारकर उसकी छाती का रक्तपान करने की नृशंस प्रतिज्ञा तक कर डाली। की ही नहीं, अपितु साढ़े तेरह बरस बाद हुए युद्ध में उसे पूरी करके ही दम लिया। महाभारत में ‘दुःशासन द्वारा पांडवों का उपहास एवं भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव द्वारा शत्रुओं को मारने की भीषण प्रतिज्ञा’ शीर्षक से पृथक अध्याय ही है, जो कदाचित इस तरह के बेढंगे नाच से बचने के लिए ही महत्व के साथ शामिल किया गया है।

सबक़

किसी के सुख में सुखी होना प्रेम है, किसी के दुःख में दुःखी होना करुणा है, मगर किसी के दुःख में सुख पाना ईर्ष्या है। ईर्ष्या और अमर्ष से विपत्तिग्रस्तों पर हंसना दुःशासन की वृत्ति है। यह वृत्ति आत्मनाश ही नहीं करती, कुलनाशक साबित होती है।

दुर्योधन की मुस्कान और मैत्रेय जी का शाप

दुर्योधन घोर अवज्ञाकारी और अहंकारी था। पांडवों के साथ जुएं में हुए छल और चीरहरण के बाद युद्ध की धमकी देकर गए पांडवों से धृतराष्ट्र डरे हुए थे। उन्होंने, भीष्म, द्रोण, कृप और गांधारी ने दुर्योधन को संधि के लिए बहुत समझाया, लेकिन वह राज़ी नहीं हुआ। वनपर्व के दसवें अध्याय की कथा है कि एक दिन महर्षि मैत्रेय जी हस्तिनापुर आए। वे वनवासी पांडवों से मिलकर लौटे थे और महर्षि वेदव्यास की प्रार्थना पर दुर्योधन को शिक्षा देने आए थे। महर्षि जब दुर्योधन को शांति का पाठ पढ़ा रहे थे, तब ‘ऊरुं गजकराकारं करेणाभिजघान स:। दुर्योधन: स्मितं कृत्वा चरणेनोल्लिखन् महीम्।।’ अर्थात उस समय दुर्योधन ने कुटिलतापूर्वक मुस्कराकर हाथी की सूंड के समान अपनी जांघ को ठोंका और पैर के नाखूनों से पृथ्वी को कुरेदने लगा। यह हरकत असभ्यता की हद थी। उस दुर्बुद्धि ने महर्षि को कोई उत्तर भी नहीं दिया। बस ढीठ की तरह मुस्काता हुआ मुंह नीचा किए चुपचाप खड़ा रहा। उसकी इस उपेक्षा भरी हंसी पर मैत्रेय जी आगबबूला हो उठे। इतना कि उन्होंने धृतराष्ट्र के सामने ही जल का आचमन करके दुर्योधन को शाप दे दिया, ‘जा! तेरे द्रोह के कारण बड़ा भारी युद्ध छिड़ेगा। उसमें बलवान भीम अपनी गदा की चोट से तेरी जांघ को तोड़ देंगे। वनपर्व का यह शाप शल्यपर्व की युद्ध कथा में सिद्ध हो ही गया। महर्षि ने जाते वक़्त चेताया था कि यदि पांडवों से शांति संधि कर ली तो शाप का असर न होगा, मगर दुर्योधन अंत तक न माना।

सबक़

जो ‘बड़ों’ की बात मानते हैं उन्हें ‘छोटों’ की लात नहीं खानी पड़ती है। जब बड़े अच्छी और भले की शिक्षा दे रहे हों, तब असहमति के बावजूद हंसी नहीं उड़ाना चाहिए। ऐसी हंसी उन्हें क्रोधित कर सकती है। क्रोध में शाप मिलते हैं, जो सामर्थ्य के बावजूद पराजय का मूल कारण बन जाते हैं।

ऋषियों से मज़ाक और पूरे यदुवंश का नाश

महाभारत का मौसल पर्व, स्त्री पर्व से भी अधिक दारुण माना गया है। इसलिए कि इसमें महाभारत के महानायक श्रीकृष्ण के कुल के नाश की अति करुण कथा है, जो केवल उद्दंडता में ऋषियों के साथ हंसी-मज़ाक के कारण शापित हो मारे गए। कथा के अनुसार एक समय महर्षि विश्वामित्र, कण्व और नारद आदि द्वारका आए हुए थे। तब यदुवंश के अभिमानी राजकुमारों की एक टोली को ठिठौली सूझी। दैव के मारे सारण आदि वीर श्रीकृष्ण और जामवंती के बेटे साम्ब को गर्भवती स्त्री का स्वांग बनाकर ऋषियों के पास ले गए। उन्होंने बनावटी विनम्रता के साथ जब ऋषियों से पूछा कि इसके गर्भ से क्या उत्पन्न होगा, तब ऋषिगण क्रोधित हो उठे। ऋषियों ने राजकुमारों को शाप दिया कि स्त्रीवेश वाला यह पुरुष साम्ब एक भयंकर मूसल पैदा करेगा, जो यादवों के विनाश का कारण बनेगा। जब मज़ाक भारी पड़ा तब राजकुमारों को होश आया और वे डरे। उन्होंने लोहे के उस मूसल को बारीक़ पीसकर समुद्र में फेंक दिया था। उसी के असर से वह विषैली और धारदार घांस उगी थी, जिससे एक-दूसरे को मारते हुए सारे यादव यमलोक पहुंच गए। श्रीमद्भागवत पुराण तो यहां तक कहता है कि श्रीकृष्ण के पैर में अंतिम समय लगे बाण में भी ‘मज़ाक के उसी मनहूस मूसल’ का टुकड़ा बतौर नोक जुड़ा हुआ था। द्वारका के प्रभासतीर्थ क्षेत्र में आज उस स्थान पर एक सुंदर मंदिर भी है, जहां मान्यता के अनुसार श्रीकृष्ण को बाण लगा था।

सबक़

अपनी हंसी की खातिर बड़ों का मज़ाक बनाना अपराध है। अपराध करने पर दंड ही मिलता है। ऐसी हंसी, जिसमें ख़ुद का मज़ा हो मगर दूसरों का अपमान, वह कभी शुभ नहीं हो सकती। जो शुभ नहीं उसमें आनंद कैसा! जो हंसी दिल दुःखाकर पाई वह हंसी कैसी!

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