गुल्लक:हर व्यक्ति की ज़रूरत है स्वास्थ्य बीमा क्योंकि स्वास्थ्य ही सबसे बड़ी संपत्ति है

कौशल वर्मा14 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
  • अमेरिकी लेखक जोश बिलिंग्स कहते हैं कि स्वास्थ्य ही हमारी सबसे बड़ी संपत्ति है, इसका एहसास तब होता है जब हम इसे खो देते हैं। जोश की बात एक दूसरी तरह से भी सच है कि सेहत ख़राब होने पर उपचार की प्रक्रिया में सारी जमापूंजी और संपत्ति भी खप सकती है। ऐसे समय में काम आता है...

मध्यमवर्गीय परिवार के आदित्य की मां की तबीयत आजकल ठीक नहीं रहती। दिनभर घुटनों और कमर में दर्द रहता है। सीढ़ियां उतरना-चढ़ना तो छोड़िए, थोड़ी देर तक लगातार खड़े रहना भी मुश्किल हो गया। शुरुआत में तो आदित्य और उसकी मां दोनों ने इसे अनदेखा किया लेकिन हालत जब बिस्तर पकड़ने वाली हो गई तब जाकर मां ने बेटे से कहा कि मुझे अस्पताल ले चलो।

आदित्य ने सोचा कि डॉक्टर के पास हज़ार-पांच सौ में काम हो जाएगा पर डॉक्टर का बिल देखकर उसके होश उड़ गए। एमआरआई, सीटी स्कैन और अन्य जांचें मिलाकर जो बिल बना वो उसकी दो महीने की बचत से भी ज़्यादा था। लेकिन असली कहानी तो अभी बाक़ी थी।

जब जांचों के नतीजे आए तो डॉक्टर ने कहा कि इन्हें साइटिका है और ऑपरेशन व पोस्ट ऑपरेशन को मिलाकर पांच-छह लाख रुपयों का ख़र्च आएगा। स्कूल जाने वाले दो बच्चों के पिता आदित्य के पैरों तले जैसे ज़मीन खिसक गई। इस महंगाई के ज़माने में जहां महीने के पांच हज़ार रुपए बचाना मुश्किल हो जाता है वहां पांच लाख का इंतज़ाम कैसे हो पाएगा!

क्यों ज़रूरी है?

आदित्य को हमेशा से यही लगता था कि स्वास्थ्य बीमा करवाना फ़िज़ूलख़र्ची है। उसके हिसाब से बीमा का मतलब सिर्फ़ जीवन बीमा ही होता है और वह भी उसका करवाया जाता है जो घर का कमाने वाला सदस्य हो। अब स्थिति यह है कि अचानक पता चली बीमारी में मां का महंगा इलाज कराने के लिए उसके पास पैसे नहीं हैं। ऐसी अवस्था में उसके पास अपना घर गिरवी रखने के अलावा कोई उपाय नहीं बचता। उसके एक दोस्त ने कई बार उसे सुझाया था कि घर में सभी सदस्यों का स्वास्थ्य बीमा होना ज़रूरी है, चाहे वह महिला हो या पुरुष।

लेकिन आज उसे एहसास हो रहा है कि पहले जिसे वो फ़िज़ूलख़र्ची समझ रहा था वह हेल्थ इंश्योरेंस घर की वित्तीय व्यवस्था को सुचारु रखने के लिए कितना ज़रूरी है। यह बीमा सिर्फ़ वित्तीय सहायता ही नहीं प्रदान करता, मानसिक संबल भी देता है। अगर आपके पास स्वास्थ्य बीमा है तो आपको सिर्फ़ इस बात की चिंता करनी है कि किस अच्छे अस्पताल में इलाज कराएं, न कि पैसों की व्यवस्था कैसे करें! अब चिकित्सा सुविधाएं बढ़ी हैं और टेस्ट के नतीजे भी जल्दी और सटीक मिलते हैं लेकिन ख़र्च भी अधिक होता है।

वर्तमान समय में भाग-दौड़ वाली तनावपूर्ण जीवनशैली होने और खानपान पर ज़्यादा ध्यान न देने के कारण एक हेल्थ इंश्योरेंस का होना अत्यावश्यक हो गया है। यह निजी क्षेत्र के लिए ख़ासतौर पर सच है। ऐसी अवस्था में बिना किसी स्वास्थ्य बीमा योजना के कोई भी आपातकालीन चिकित्सा ज़रूरत आपकी जेब और बचत दोनों में सेंध लगा सकती है। इस स्थिति में घर के कमाऊ सदस्य की जि़म्मेदारी बनती है कि वो परिवार के सभी सदस्यों का स्वास्थ्य बीमा प्राथमिकता से करवाए। ये उनकी नैतिक जि़म्मेदारी ही नहीं, वित्तीय समझदारी भी है।

कितना मददगार है?

स्वास्थ्य बीमा के चलते धारक को आपात चिकित्सा ज़रूरत में तुरंत पैसों की चिंता नहीं करनी पड़ती। प्रायः हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों का देश के प्रमुख अस्पतालों के साथ अनुबंध होता है जिसकी बदौलत कैशलेस उपचार संभव हो पाता है। अगर किसी कारण इलाज कैशलेस संभव नहीं होता तो इलाज में हुआ ख़र्च बीमा कंपनी बाद में वापस कर देती है। आपको सिर्फ़ इतना करना है कि उपचार के सारे दस्तावेज़ और बिल लेकर बीमा की कंपनी को दे देने हैं। डाक्यूमेंट्स की जांच करके बीमा कंपनी वह राशि जो बीमा की पॉलिसी में कैशलेस देने का वायदा किया गया था, बीमित व्यक्ति के बैंक अकाउंट में ट्रांसफर कर देती है। यह उपचार, देखभाल और सर्जिकल जैसे विभिन्न ख़र्चों पर लागू होता है। पॉलिसी का शुल्क उस पर मिलने वाली सुविधाओं या बीमित राशि की सीमा पर निर्भर करता है।

कैसे करें चुनाव?

सामान्यत: अपनी आवश्यकता के अनुसार ऐसी पॉलिसी का चुनाव करना चाहिए जो पूरे परिवार को कवर करे। विशेषज्ञों की सलाह है कि उसी बीमा कंपनी से बीमा करवाना चाहिए जिसका क्लेम सैटलमेंट रेश्यो अधिक हो। इसका मतलब यह हुआ कि जिस कंपनी ने अधिक से अधिक लोगों को बीमा के पैसे दिए हों उस कंपनी से बीमा करवाना बेहतर होता है। इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि बीमा योजना में दिए गए नेटवर्क अस्पतालों की सूची में उसके शहर या देश के सारे मुख्य अस्पतालों के नाम शामिल हों। इतना ही नहीं, स्वास्थ्य बीमा योजना में कैशलेस भुगतान के साथ-साथ रिंबर्समेंट (ख़र्च वापसी) का विकल्प भी शामिल होना चाहिए।

कवरेज में क्या-क्या?

स्वास्थ्य बीमा को लेकर एक आम धारणा है कि यह सिर्फ़ अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान होने वाले ख़र्चों को ही कवर करता है। जबकि कुछ कंपनियां ऐसी योजनाएं लेकर आई हैं जिनमें अस्पताल में भर्ती होने से पहले एवं बाद के 60-60 दिनों तक के ख़र्चों को कवर किया जाता है। कुछ पॉलिसियों में बीमाधारक के लिए एंबुलेंस और दवाइयों का ख़र्च भी शामिल किया जाता है। आजकल कई पॉलिसी में साल में एक बार फ्री हेल्थ चेकअप की सुविधा भी प्रदान की जाती है।

आपकी ज़रूरतें क्या हैं?

वरिष्ठ नागरिक अपनी ज़रूरत के अनुसार बीमा ले सकते हैं। उनकी आयु के अनुसार पॉलिसी के पैसे बढ़ते-घटते रहते हैं। मतलब जितनी ज़्यादा उम्र उतना ज़्यादा पैसा स्वास्थ्य बीमा करवाने के लिए देना होगा। सीनियर सिटीजन के लिए अधिकतर सर्जरी या फिर दूसरी गंभीर बीमारियों के लिए बीमा पॉलिसी होती हैं। इसी प्रकार महिलाएं भी अपनी ज़रूरत या बीमारियों के अनुसार बीमा करवा सकती हैं। कुछ बीमारियां हंै जिनका ख़तरा महिलाओं के ऊपर हमेशा मंडराता रहता है जैसे कि थायरॉइड, प्रजनन स्वास्थ्य समस्याएं, स्तन कैंसर, गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर, हृदय रोग, डाइबिटीज़ और ब्लड प्रेशर। अगर इन बीमारियों को अनदेखा किया गया तो जान का ख़तरा हो सकता है। इसलिए महिलाओं को बीमा करवाते हुए इन बातों का ध्यान रखना चाहिए कि वो किस रोग से ग्रस्त हैं या उन्हें कोई वंशानुगत बीमारी तो नहीं है जिसके इलाज की सुविधा उनकी पॉलिसी में शामिल होनी चाहिए।

कब लेना फ़ायदेमंद?

आज सुविधाएं बढ़ रही हैं, आरामतलब जीवनशैली के कारण स्वास्थ्य समस्याएं भी कम उम्र में ही हो रही हैं। ऐसे में युवा यदि अपनी हेल्थ को इंश्योर करवाने में ज़्यादा रुचि नहीं दिखाते हैं तो यह उचित नहीं है।

इंश्योरेंस एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर युवा हैं तो आपके लिए ये बेहतर है कि आप जितनी जल्दी हो सके अपना स्वास्थ्य बीमा करवाएं। मुमकिन है तो युवाओं को अपनी पहली सैलरी के साथ ही ऐसी एक पॉलिसी ले लेनी चाहिए। युवा अवस्था में हेल्थ इंश्योरेंस करवाने से एक तो प्रीमियम कम लगता है और दूसरी तरफ़ सुविधाएं भी ज़्यादा से ज़्यादा मिलती हैं। कम उम्र में स्वास्थ्य बीमा करवाने से अधिक से अधिक बीमारियां कवर होती हैं। दरअसल, हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी यह मानती हैं कि युवाओं का स्वास्थ्य अमूमन सही ही रहता है और उनको हेल्थ इंश्योरेंस की ज़रूरत किसी आपातकालीन या अपरिहार्य स्थिति में ही पड़ती है।

ये भी जानिए...

आसान है प्रक्रिया
स्वास्थ्य बीमा लेने के समय आपको कुछ ज़रूरी दस्तावेज़ों की आवश्यकता होती है। हालांकि ये वही दस्तावेज़ हैं जो आपके पास आसानी से उपलब्ध होते हैं। इनमें पहचान पत्र, आयु प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण और पासपोर्ट साइज़ फ़ोटोग्राफ़ शामिल है।

टैक्स में छूट

सरकार आम जनता को स्वास्थ्य बीमा के लिए प्रोत्साहित करना चाहती है। इसीलिए स्वास्थ्य बीमा की प्रीमियम राशि आयकर अधिनियम की धारा 80डी के तहत टैक्स डिडक्शन यानी कर कटौती के योग्य होती है। हमेशा स्वास्थ्य बीमा लेने के बाद अपने सीए को प्रीमियम राशि के बारे में बताएं ताकि वह इस राशि का उल्लेख आपके आयकर विवरण में कर सके।

नो क्लेम बोनस

हेल्थ इंश्योरेंस आमतौर पर एक वार्षिक पॉलिसी होती है। यदि कोई पॉलिसीधारक क्लेम नहीं करता है, तो कुछ बीमा कंपनियां पॉलिसी कवरेज सीमा को संचयी बोनस नाम से एक निश्चित प्रतिशत तक बढ़ाकर रिन्यूअल के समय रिवॉर्ड प्रदान करती हैं।

खबरें और भी हैं...