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मन के मंजीरे:अत्यधिक सुविधाओं ने व्यंजनों से कर दिया है स्वाद को दूर, दादी मां के हाथ के तिल लड्‌डुओं की मीठी-सी याद

अनुमेहा4 महीने पहले
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  • आज हम सुविधा-संपन्न हो चले हैं। सामान फ़ोन पर हाज़िर हो जाता है, फिर भी तिल के लड्डुओं में वो स्वाद नहीं आता, जो दादी मां द्वारा बनाए जाते थे। एक मीठे अतीत को याद करके बता रही हैं अनुमेहा...

मेरे गांव के आंगन का वह बड़ा-सा कटहल का पेड़। उसके पत्तों से छनकर आती जनवरी की गुनगुनी धूप। आंगन में बिछी बड़ी-सी चटाई। मेरे हाथों में काग़ज-क़लम और पास में बैठी दादी मां, मुझसे महीने का राशन लिखवाती हुईं। राशन में ज़रूरत के सामानों के अतिरिक्त दादी मां संक्रांति के लिए अलग से काला तिल, सफ़ेद तिल, नया चूड़ा, रामदाना, मुरमुरा, गुड़, मेवा, इलायची सब लिखा देती थीं। दादाजी को हिदायत भी दी जाती थी कि सब-कुछ अच्छी तरह देखकर लेना है। तिल हथेलियों पर रगड़कर ही ख़रीदें। कहीं पिछले साल वाला ही न दे दे। सभी हिदायतों को शिरोधार्य करते दादाजी मुस्कराते हुए थैला और सूची रख लेते थे। पहले परिवार में सिर्फ़ अपने घर के सदस्य नहीं होते थे। टोले के सभी घरों में जो भी चीज़ बनती, बांटी जाती थी। दूसरे गांवों में रहने वाले संबंधियों के लिए भी पकवान बनाए जाते थे। बुआ की ससुराल भी सनेश भेजा जाता था। सभी त्योहारों में उनकी गिनती भी की जाती थी। इस तरह सामान भी उसी हिसाब से आते थे। संक्रांति की तैयारी एक बड़े उत्सव सदृश प्रतीत होती थी हमें। सामान आने के बाद उसे धूप में चार-पांच दिन सुखाया जाता था। कभी-कभी तिलों को एक बार धोना भी पड़ता था। धूप में सुखाने के बाद बारी आती थी उन सभी की सफ़ाई की। उन दिनों बड़े मार्ट से पैकेट में बंद सामान नहीं आते थे। सामान परचून की दुकानों से लिए जाते थे, जो जितना निभ जाता उतने पर्याप्त कंकड़-पत्थर, मिट्टी सामानों में मिलाते ही थे। अब तो सूप पर सामानों में से आंकड़ चुनने की कला भी सभी भूल चुके। दो-तीन दिनों तक सभी धूप में बैठ इसी काम में लगे रहते थे। आपस में बतियाते काम कैसे हो जाता था किसी को पता भी नहीं चलता था। आंगन में एक बड़ा-सा मिट्टी का चूल्हा गाड़ दिया जाता था। गुड़ की चीजे़ं इतनी आसानी से नहीं बनती हैं। मिट्टी के एक बर्तन (बासन) को सामने से कलाकारी से तोड़ा जाता था। सूखी लकड़ियों को इकट्ठा कर चूल्हा सुलगता, इधर हम बच्चों की आंखों में चमक बढ़ जाती थी। मिट्टी के बर्तन में पहले बालू डालकर चूड़ा भूना जाता था। लोहे की कड़ाही में दादी मां तिल, मुरमुरा, रामदाना सभी को अच्छी तरह भूनकर रख लेती थीं। गुड़ को लोहे की कड़ाही में कम पानी के साथ पिघलाती थीं। ठंडे पानी में गिराकर जांचा जाता था कि पाक सही है या नहीं। गुड़ से बनी चीज़ों में सही पाक (गुड़ की चाशनी का) बहुत ज़रूरी होता है। फिर बड़े-बड़े तसले में भूनकर रखे चूड़ा, तिल, मुरही, रामदाना सबमें गुड़ मिलाया जाता था। लोकगीत गातीं बुआ, मां, चाची सब मिलकर उनके लड्डू बांधती थीं। चूड़ा के लड्डू, जिन्हें चिल्लौर कहा जाता, सफ़ेद पतली धोती में बांधकर बनाए जाते थे, नहीं तो उनके टूटने की संभावना रहती थी। फिर बारी आती थी तिल के लड्डुओं की। हमारी धड़कन बढ़ जाती थी। दादी-मां मछलियां, मेंढक, तारे, सूर्य, चंद्रमा, बच्चा, बुड्‌ढा आदमी, बैठी गुड़िया कितनी ही आकृतियों में लड्डू बनाती थी। उनके तिल के लड्डू बोलते थे। उनमें वे जैसे प्राण-प्रतिष्ठा कर देती थीं। हमारे आग्रह पर उनसे रसोई के सभी सामान बना देतीं। कभी कॉपी, किताब, पेंसिल भी लड्डू से बन जाते। मैं देखती कि वे अपने पिताजी- जो लेखक थे- के लिए क़लम वाला लड्डू बनाकर भेजतीं। दादी मां के बनाए ये अलग-अलग आकृतियों के लड्डू सभी के लिए रहस्य थे। लड्डुओं को खाने से पहले सभी जी भर निहारते थे। घर के छोटे सदस्यों के लिए उनसे पूछकर उनके पसंद की आकृतियां बनाई जाती थीं। मेरी छोटी बहन के लिए तरह-तरह की गुड़िया बनाती थीं दादी मां। आज स्मृतियों में अनायास ही वे विभिन्न आकृतियों वाले लड्डू उभर आए हैं। दादी मां के वे सधे हाथ अब नहीं हैं पर स्नेह से सिक्त उन हाथों से मिले संक्रांति के अवसर पर गुड़-तिल अभी भी वही मिठास लिए हुए हैं। वे गुड़-तिल हमारी संस्कृति का अहम हिस्सा हैं। आज आंखों में एक चलचित्र की भांति वह बीता समय घूम रहा है। उन अनुभूतियों के स्मरण मात्र से मन जितना तृप्त होता रहा, हृदय उतना ही रिक्त। काश वे चूहे, बिल्ली, कुत्ते, हिरण, मोर, कबूतर, सभी पशु-पक्षी के आकार वाले तिल के लड्डू दादी मां वहीं से बनाकर भेज देतीं, जहां वे हमें छोड़कर चली गईं।

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