चित्रपट:फ़िल्मों ने भी बताया है कि देने का सुख कितना बड़ा होता है, एक नज़र ऐसी ही चंद फ़िल्मों के मशहूर दृश्यों पर

शशांक दुबे6 दिन पहले
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  • यथार्थ में भले इंसान की प्रवृत्ति ये दिल मांगे मोर वाली हो...लेकिन मानव जीवन की तमाम अच्छाइयों और बुराइयों को समेटने वाला हिंदी सिनेमा अक्सर ‘देने के सुख’ को कभी सहजता के साथ, तो कभी अपनी नाटकीय शैली में व्याख्यायित करता रहा है।
  • हमारी आमुख कथा का यह हिस्सा सिनेमा के इसी परिप्रेक्ष्य को समर्पित है।

हृषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म ‘बावर्ची’ (1972) का नायक (राजेश खन्ना) धन-दौलत, यश और कीर्ति बटोरने के बाद दुनिया के खोखलेपन से ऊब जाता है और एक गुमनाम बावर्ची का भेष धरकर दिन-भर कलह में डूबे रहने वाले एक परिवार को थोड़े ही दिनों में परस्पर नेह के धागे में पिरो देता है। ख़ुशियों के बारे में बावर्ची का अलग ही फ़लसफ़ा है। वह कहता है, ‘जीवन में बड़ी ख़ुशियां तो बहुत कम मिलती हैं, लेकिन छोटी-छोटी ख़ुशियां हमारे चारों तरफ़ फैली होती हैं। फिर हम उन चंद बड़ी ख़ुशियों के लिए ये छोटी-छोटी ख़ुशियां क्यूं क़ुर्बान करें?’ उसका यह कहना भी कितना भला-सा लगता है कि अपना काम तो हर कोई करता है, मगर जो मज़ा दूसरों का काम करने में है, वो किसी और में नहीं। एक दिन वह चुपचाप घर से रवाना हो जाता है, लेकिन तब तक सारा परिवार एकजुट हो अपने जीवन का दर्शन ‘जो सुख देने में है, वह लेने में कहां!’ में खोज लेता है।

ख़ुशी देने के मौक़े अपार
1971 आनंद

देने के इसी सुख को हृषिकेश मुखर्जी इससे पहले भी ‘आनंद’ में अपनी परंपरागत सीधी-सरल और विश्वसनीय-सी लगती शैली में दर्शा चुके थे।
यह फ़िल्म मौत के नित नज़दीक जाने वाले एक ऐसे ज़िंदादिल व्यक्ति की कहानी है, जिसका दर्शन है- ‘ज़िंदगी लंबी नहीं बड़ी होनी चाहिए’। वह मौत से घबराकर निराशा के गर्त में डूबने के बजाय अपने आस-पास मौजूद लोगों के बीच खु़शियां बांटकर शेष बचे जीवन के हर पल को जीना चाहता है। राजेश खन्ना ने आनंद के इस आत्मीय चरित्र को अपनी सरलता से इतनी गहराई दी थी कि फ़िल्म के अन्य पात्रों की ही तरह दर्शक भी उसके दर्द से कहीं भीतर तक जुड़ जाता है।

फ़िल्म में ऐसे कई प्रसंग आते हैं, जब दर्शक एक क्षण को भूल जाता है कि सामने पर्दे पर जो चल रहा है, वह एक नाटक है। वह उससे असंपृक्त क़तई नहीं रह पाता। आनंद (राजेश खन्ना) का अपनी मुंहबोली भाभी से यह कहना कि ‘मैं तुझे क्या आशीर्वाद दूं, तुझे तो यह भी नहीं कह सकता कि मेरी उमर तुझे लग जाए’ या नर्स (ललिता पवार) के स्नेह से अभिभूत हो कहना, ‘इतना प्यार मत करो, वरना अगले जन्म में तुम्हारा असली बेटा बनकर आ जाऊंगा’ दर्शकों को भावविह्वल कर देते हैं। ‘आनंद’ दर्शकों को यह संदेश देती है कि लोगों को ख़ुशियां देने का एक मौक़ा भी मिले तो उसे मत छोड़ो।

1976 छोटी सी बात
देने के इस सुख को हृषि दा की ही तरह ‘मध्यमार्गी सिनेमा’ के ध्वजवाहक बासु चटर्जी ‘छोटी सी बात’ में अलग ही अंदाज़ में दर्शाते हैं।
बात-बात पर सर खुजाने, नाक पर हाथ रखने, व्यावहारिक जीवन, प्रेम और नौकरी के बहुमुखी मोर्चों पर असफल अरुण (अमोल पालेकर) का खंडाला के जूलियस नगेंद्रनाथ विलफ़्रेड सिंह (अशोक कुमार) न केवल मनोवैज्ञानिक तरीक़े से इलाज कर उसे नौकरी में मान-सम्मान और प्रेम में सफलता दिलवाते हैं, बल्कि अपनी समस्या के समाधान के लिए अरुण ने उन्हें जो फ़ीस अदा की थी, वह भी नव विवाहित दंपती को आशीर्वाद स्वरूप लौटा देते हैं।
दरअसल कर्नल साहब युवावस्था में संकोची स्वभाव के चलते अपनी प्रेयसी प्रभा से प्रेम का इज़हार नहीं कर सके थे, तभी से उनकी यही कोशिश रहती है कि अब कोई भी नौजवान अपनी प्रभा के प्रेम से वंचित न रह पाए। इसीलिए वे हर असफल प्रेमी का मार्गदर्शन कर उसके जीवन में ख़ुशियां भर देते हैं।

ज़िम्मेदारी में है सुख
1967 उपकार

जहां हृषि दा और बासु दा की फ़िल्मों में देने का सुख मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति के रूप में उभर कर आता है, वहीं कुछ सामाजिक फ़िल्मों में यह सुख हम एक ज़िम्मेदारी के रूप में देखते हैं।

‘उपकार’ का भारत (मनोज कुमार) पढ़ा-लिखा ग्रामीण है, जो धोती-कुर्ता पहन कंधे पर हल रख अपनी ठेठ गंवई संस्कृति का परिचय देता है और बाज़ मौक़ों पर अंग्रेज़ीदा व्यक्ति के ‘थैंक्यू’ का मुस्कराते हुए ‘मेंशन नॉट’ जवाब देने से भी नहीं हिचकता। भारत का एक ही उद्देश्य है, छोटा भाई पूरण (प्रेम चोपड़ा) पढ़-लिखकर क़ाबिल इंसान बन जाए। वह खेत में हाड़ तोड़ मेहनत कर भाई का करियर संवारता है। उसकी सदाशयता पर गांव का मलंग बाबा (प्राण) उसे कहता है, ‘भारत, कब तक दूसरों की सोचता रहेगा, कभी अपनी भी तो सोच’। लेकिन बड़ा भाई कहां मानता है?

1957 भाभी
ऐसे ही बड़े भाई को हम एवीएम प्रोडक्शन की ‘भाभी’ में भी देखते हैं। यहां भाई-भाभी के नेह की छांह में पले छोटे भाई अपनी पत्नियों के बहकावे में आकर जायदाद का बंटवारा करने के लिए दबाव बनाते हैं।
बड़ा भाई रतन (बलराज साहनी) कलेजे पर पत्थर रखकर संपत्ति का बंटवारा करते हुए कहता है, ‘यह बंटवारा जायदाद का होगा, दिलों का नहीं, क्योंकि दिल टूट जाया करते हैं, बांटे नहीं जाते।’ फिर वह भाइयों के ज़िम्मे कारोबार और बंगला छोड़कर ख़ुशी-ख़ुशी गांव के पुश्तैनी घर में चला जाता है।

1973 ज्वार भाटा
आज ज़माना इतना निष्ठुर हो चला है कि भले देने वाला अपनी सहज प्रवृत्ति के चलते दे, लोग उसे दीवाना ही समझते हैं। फ़िल्म ‘ज्वार भाटा’ में करोड़पति सेठ दुर्गादास (नज़ीर हुसैन) को जब पता चलता है कि ग़रीबों के लिए दाल-रोटी का ढाबा चलाने वाला बिल्लू (धर्मेन्द्र) उनका बिछुड़ा हुआ पोता है, तो वे अपनी सारी जायदाद उसके नाम कर इस दुनिया से रुख़सत हो लेते हैं। बिल्लू की दरियादिली रिश्तेदारों को खलती है और वे उसे जायदाद से बेदख़ल करने के लिए उसे पागल साबित करवाने की कोशिश करते हैं।
कहा जाता है कि जो आदमी ठंड में अपना कोट देकर खु़द कांपते हुए चला जाए या जो किसी बुढ़िया को अपना काम-धाम छोड़कर अस्पताल पहुंचाकर तीमारदारी में लग जाए, वह पागल ही होगा। अपनी सफ़ाई में बिल्लू कहता है, ‘जज साहब, पेड़ ख़ुद धूप में खड़ा रहता है, लेकिन पथिक को फल और छाया देता है, क्या वह पागल है? नदी अपना सारा पानी लोगों को पिलाकर खु़द समुद्र में विलीन हो जाती है, क्या वह पागल है? धरती अपना सीना चीरकर अनाज उगाती है तो क्या वह पागल है? यदि ये सब पागल हैं तो जज साहब मैं भी पागल हूं।’

दे दिया ख़ून और जान भी
1980 क़ुर्बानी

मुंबइया सिनेमा में दिल ही नहीं दिया जाता, दोस्तों के लिए जान भी दे दी जाती है।
‘क़ुर्बानी’ में खलनायक शक्ति कपूर के हाथ में मशीनगन रहती है और सामने नायक फ़ीरोज ख़ान और विनोद खन्ना खड़े रहते हैं। वह पूछता है, कौन पहले मरना चाहता है? जवाब में दोनों दोस्त एक-दूसरे को पीछे धकेलते हुए बंदूक की ओर बढ़ते हैं। ये देख वो क्रूरतापूर्वक हंसते हुए ‘दोस्त के लिए जान देने का क्या जज़्बा है!’ कहकर विनोद खन्ना पर गोली दाग देता है।
कहा जाता है, रक्तदान सबसे बड़ा दान होता है। हमारी फ़िल्मों में इस दान का महिमामंडन बहुत किया जाता है।

1982 कथा
‘कथा’ का नायक राजाराम पु. जोशी (नसीरुद्दीन शाह) सीधा-सादा मराठी मानुष है, जो एक कंपनी में बतौर क्लर्क कार्यरत है और मुंबई की एक पुरानी चॉल में रहता है। एक दिन बस स्टॉप पर बस का इंतज़ार करते-करते उसके कान पास में खड़े प्रतीक्षार्थी के हाथ में रखे ट्रांजिस्टर में एमर्जेंसी अनाउंसमेंट सुनकर खड़े हो जाते हैं, जिसमें बताया जाता है कि एक आदमी को अचानक ख़ून की ज़रूरत आन पड़ी है और यदि किसी का ब्लड ग्रुप बी पॉज़िटिव हो तो तुरंत अस्पताल पहुंच जाए। इतना सुनते ही वह ‘मेरा ग्रुप बी पॉज़िटिव है, मेरा ग्रुप बी पॉज़िटिव है’ कहते हुए अस्पताल के लिए टैक्सी पकड़ लेता है।

1983 अवतार
ऐसा प्रसंग ‘अवतार’ में भी है, जिसमें सेवक (सचिन) अचानक कंगाल हो गए अपने मालिक (राजेश खन्ना) के भरण-पोषण के लिए आए दिन रक्तदान करता है।

1983 अमर अकबर एंथनी
फ़िल्म ‘अमर अकबर एंथनी’ में बचपन में मां-बाप से (और आपस में भी) बिछुड़े तीन भाइयों की मां बीस साल बाद दुर्घटना में घायल हो भर्ती है। उसे ख़ून की जरूरत है। तभी तीनों बेटे अलग-अलग ठिकानों से आकर ख़ून देने के लिए लेट जाते हैं। तीनों के शरीर से ख़ून निकालती नलियां मां की ड्रिप में एक-साथ जुड़ती हैं और पृष्ठभूमि में गाना बजता है, ‘ये सच है कोई कहानी नहीं, ख़ून ख़ून होता है पानी नहीं’। मनमोहन देसाई के इस रूपक में कितनी स्वाभाविकता है और कितनी नाटकीयता, यह तो चिकित्सा का गूढ़ विशेषज्ञ ही बता सकता है, लेकिन सिनेप्रेमी के नज़रिए से परिकल्पनाकार के. के. शुक्ला निश्चित ही बधाई के हक़दार माने जाएंगे।

त्याग के कई-कई क़िस्से
1949-99 अंदाज़...हम दिल दे चुके सनम...

जहां तक मसाला फ़िल्मों की बात करें, तो इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करने से पहले नब्बे फ़ीसदी सिनेमा दिल, जान और ख़ून देने के क़िस्सों से सराबोर रहा है।
महबूब की ‘अंदाज़’ (1949) से लेकर ‘हम दिल दे चुके सनम’ तक में ऐसे प्रेम-त्रिकोण हैं, जिसमें कोई ना कोई कुछ त्यागता है।

1964 संगम
‘संगम’ का सहनायक गोपाल (राजेन्द्र कुमार) अपने दोस्त सुंदर (राज कपूर) के लिए अपनी प्रेयसी राधा (वैजयंती माला) के जीवन से हट जाता है।

1966 दिल दिया दर्द लिया
‘दिल दिया दर्द लिया’ का नायक शंकर (दिलीप कुमार) इतना सीधा है कि अपनी प्रेयसी रूपा (वहीदा रेहमान) को अपने भूतपूर्व मालिक (प्राण) को सौंपते हुए विनती करता है, ‘ठाकुर साहब मैं आपके हाथ जोड़ता हूं, कि आप रूपा को स्वीकार कर लें’, इसके जवाब में ठाकुर उसका आभार मानने के बजाय ‘तू सारी ज़िंदगी मंगते का मंगता ही रहेगा, आज कुछ दे भी रहा है तो भीख मांगकर!’ जैसा संवाद बोलकर उसकी किरकिरी कर देता है।

1991-99 साजन... हम दिल दे चुके सनम...
नब्बे के दशक की दो चर्चित फ़िल्मों ‘साजन’, और ‘हम दिल दे चुके सनम’ में नायक (क्रमशः संजय दत्त और सलमान ख़ान) सहनायक के लिए अपने प्रेम को क़ुर्बान करने के लिए तैयार हो जाते हैं, लेकिन ऐन समय पर सहनायक के हस्तक्षेप के बाद नायक-नायिका का मिलन हो जाता है।

1963 दिल एक मंदिर
यहां श्रीधर की बहुचर्चित फ़िल्म ‘दिल एक मंदिर’ का ज़िक्र करना अप्रासंगिक न होगा। फ़िल्म का नायक धर्मेश (राजेन्द्र कुमार) डॉक्टर है। किसी ज़माने में वह जिस लड़की सीता (मीना कुमारी) से प्रेम करता था, वह अब अपने कैंसर पेशेंट पति (राज कुमार) के इलाज के लिए उसके सामने खड़ी है। डॉक्टर उस मरीज़ को बचाने के लिए देश-विदेश के शोध-पत्रों का दिन-रात बिना कुछ खाए-पिए अध्ययन करता है और उस मरीज़ की जान बचाने में क़ामयाब हो जाता है अलबत्ता अंत में स्वयं उसके प्राण पखेरू उड़ जाते हैं।

एक अद्‌भुत दृश्य...
1955 श्री 420

और अब चलते-चलते ‘देने के इस सुख’ का सबसे अद्‌भुत दृश्य। ‘श्री 420’ का नायक राज (राज कपूर) फक्कड़ी तबीयत का इंसान है।
गर्दिश के दिन में एक केले बेचने वाली बाई (ललिता पंवार) से वह पूछता है, ‘केले क्या भाव लगाए?’
वह बोलती है, ‘दो आने के तीन।’
राज मसखरी करते हुए उससे कहता है, ‘दो आने के तीन नहीं, तीन आने के दो लगाओ’
केलेवाली मोल-भाव नहीं करती, वह उसे मना कर देती है। तभी मन ही मन हिसाब लगाते हुए उसे समझ आता है, यह तो फ़ायदे का सौदा है! वह उसे वापस बुला कर दो केले देते हुए कहती है, ‘ये लो तीन आने के दो’।
राज कहता है, आज पैसे नहीं हैं, जब आएंगे ख़रीद लूंगा।
केलेवाली अपनी ममतामय मुस्कान के साथ उसके सर को सहलाती हुए दो केले हाथ में रख कहती है, ‘कोई बात नहीं, जब पैसे आएं तब दे देना’।
राज अपनी टोपी उतारकर गर्दन झुकाते हुए कहता है, ‘तुम केलेवाली नहीं, दिलवाली हो’ और केलेवाली, राज और दर्शकों की आंखों में हर्ष का सागर छलछला जाता है।

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