पलछिन:महानगर की भीड़ में भी शांति और तल्लीनता खोजने पर मिल ही जाती है

राहुल राजेशएक महीने पहले
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  • महानगर की भीड़ में अगर निसर्ग का एक कोना मिल जाए तो व्याकुल मन के लिए वही एक आलम्बन बन जाता है।
  • वैसी ही शांति और तल्लीनता को व्यक्त करने वाला यह रम्य-निबंध इस बार के पलछिन में पाठकों के लिए प्रस्तुत है।

सहारा तेरे इंतज़ार का है एक नाम ये भी तो प्यार का है।

दिल्ली के उत्तमनगर के ककरोला गांव में एक ड्राइवर बाबू रहते थे। चार्टर्ड बस चलाते थे। उत्तमनगर से नेहरू प्लेस। यह सन् पनचानवेे की बात है। उत्तर प्रदेश के सीतापुर के रहने वाले थे। सांवरे, तीखे नैन-नक़्श वाले। लंबे-छरहरे। बहुत हंसमुख और गपोड़। वही यह शेर अक्सर गुनगुनाया करते थे। सुनाया करते थे। उनका नाम तो याद न रहा। यह शेर याद रह गया। पहले सोचता था, एक प्रेमी अपनी प्रेमिका के इंतज़ार में यह कह रहा है। इस तरह सोचते हुए, यह शेर और वज़नदार हो जाता था। तब उम्र भी तो ऐसी ही थी! एक दिन डाइबर बाबू से पूछ बैठा- रोज़-रोज़ ये किसके लिए कहते हैं आप? उन्होंने कहा- राहुल बाबू, ये जो अपने भोलेनाथ हैं न, उनके लिए! मैं दंग रह गया। झेंप गया। वे अक्सर आसमान की ओर हाथ उठाकर यह शेर क्यों दुहराया करते थे, अब समझ आया। मुम्बई में ख़ूब हरी-भरी कॉलोनी और खुली-खुली बालकनी मिलना किसी बड़ी नेमत से कम नहीं। ईश्वर की कृपा से हमें ये नेमतें नसीब हुई हैं। उगते और ढलते सूर्य की सुनहली आभा, सुबह-शाम पक्षियों का भरपूर कलरव और आंख-आंख भर हरियाली- इससे अधिक भला और क्या चाहिए! मेरे आवास की एक बालकनी सदर की ओर खुलती है, जहां से सड़क की चहल-पहल दिखती है। और दूसरी बालकनी फ़िल्म सिटी और ‘आरे’ वन की ओर। इस दूसरी बालकनी से हासिल यह विश्रांत-हरियाली ही मुम्बई में मेरे जीने का सहारा है! सुबह-शाम इसी हरियाली को देखकर सांसें बटोरता हूं। और साहस भी। पहाड़ी पर चढ़ती-उतरती धूप बांध लेती है। इस हरियाली और पहाड़ी पर मंडराते बादल बांध लेते हैं। इन पर तैरती धुंध बांध लेती है। इन पर बरसती धारासार बारिश बांध लेती है। धारासार बारिश का संगीत बांध लेता है। यह पूरा दृश्य मुझे बांध लेता है। मेरा जीवन बांध लेता है। कभी-कभी इसी हरियाली के बीच से चूल्हे का धुआं लहराते हुए उठता दिख जाता है तो मन हुलस जाता है। वरना अब तो हर जगह गैस चूल्हे का ही ज़माना है! तब भी चूल्हे से उठते धुएं की स्मृति मन में बसी हुई है। यह हमारे छप्पर-छानी वाले गांव-घर का सबसे समृद्ध बिम्ब है। यह अमिट ही रहेगा। ताउम्र। सांझ ढले बालकनी की बत्ती बुझाकर, इस हरियाली पर उतरती अंधियारी को देखना भी ख़ूब अच्छा लगता है। मुम्बई जैसे महानगर में, जहां स्वयं रात्रि को भी अपना आदिम रूप बचाने के लिए रोशनियों के समंदर से युद्ध करना पड़ता हो, वहां अंधियारी की यह झीनी चादर बहुत सुकून देती है। इसी अंधियारी के ऊपर सुदूर से कुछेक बहुमंज़िली इमारतों की खिड़कियां टिमटिमाती रहती हैं। आंखों को, पलकों को अपनी नरम-नरम अंगुलियों से छूती। बहुत मद्धिम-मद्धिम। अंधियारी के ऊपर पसरा आकाश धुंधलके में अलसाया दिखता है। और दिख जाते हैं कुछेक टिमटिमाते तारे। जिन्हें हम यानी मैं और दोनों नन्ही बेटियां बड़े चाव और लगाव से निहारते हैं। इसी आकाश में कभी सुफैद, कभी कारे, कभी चांदनी में नहाए बादलों को देखकर हुलस जाती हैं बेटियां। और उनके नाना रूपों को नानाविध नाम देकर ख़ुश हो जाती हैं। इसी अंधियारी में कभी पूरा चांद कमल की तरह खिल उठता है, तो कभी सोने के हंसिये की तरह दमक उठता है। पूर्णिमा का चांद देर तक देखने की कोशिश करते हैं, बालकनी से गर्दन निकाल-निकालकर। बालकनी के फ़र्श पर जब चांद की सुनहरी छवि उतर आती है तो मन जुड़ा जाता है। हम कमरे की बत्ती बुझाकर चांद को अंदर बुला लेते हैं। कभी चांद फ़र्श पर देर तक बिराजता है तो कभी घड़ी भर बैठकर ही चला जाता है। हम इत्ते भर से बहुत ख़ुश होते हैं। चांद भी ख़ुश होता होगा यक़ीनन!

दूर दिखती पहाड़ी अंधियारी में ओझल नहीं होती। आंखों में बनी रहती है रात्रि पहर भी। अपनी शिरोरेखाओं में पुनर्परिभाषित होती। हरियाली, पहाड़ी और अंधियारी से गुंथा यह दृश्य मीठा-मीठा सुख रचता है। एक उत्सव सिरजता है हम सबके लिए। इसी बीच कभी कोई हवाई जहाज़ पहाड़ी पर उतरता-सा दिख जाता तो हम और ख़ुश होते। उसकी जलती-बुझती लाल-पीली रोशनी का पीछा करते। जब कभी यह रोशनी किसी ओट में छिप जाती तो उसके प्रकट होने का इंतज़ार करते। अब निकली, तब निकली! ये छिप गई, ये दिख गई! हम बहुत ध्यान से गिनते। एक बार, दो बार, तीन बार... इस तरह कुल पांच बार हर जहाज़ की रोशनी लुकती-छिपती! इस खेल में कभी-कभार मेरी पत्नी भी शामिल हो जातीं। हम सब इस तरह गिनकर बहुत ख़ुश होते! मुझे अपना बचपन याद आता। बेटियां अपना बचपन जीतीं!

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