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कथेतर:भारतीय सनातन संस्कृति में अग्नि का है विशेष महत्व, यम-नचिकेता संवाद में यम ने बताया है तीन अग्नियों का रहस्य

पुनर्वसु9 दिन पहले
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  • सभ्यता का एक सोपान अग्नि के साथ प्रारंभ होता है। चक्र के साथ बाद में गतिमान हुआ, अग्नि के साथ पहले आलोकित हुआ था।

कठोपनिषद् में यम-नचिकेता की कथा व संवाद प्रसिद्ध है। वहां यम मृत्यु के पार जाने की कला बताते हैं। नचिकेता परंपरागत यज्ञ की पृष्ठभूमि में अग्नि को स्वर्ग्य मानते हुए उसका रहस्य पूछता है। तब यम तीन अग्नियों का रहस्य बताते हुए उसे त्रिणाचिकेत का नाम देते हैं। परंपरा में अग्नि के तीन रूप माने गए हैं- दावाग्नि यानी धरती की आग, बड़वाग्नि यानी जल की आग (तड़ित्) और जठराग्नि भूख की आग। आयुर्वेद में भी इसी प्रकार अग्नि के तीन प्रकार माने गए हैं- भौम, दिव्य और जठर। वैदिक काल में तीन अग्नियों का विशेष उल्लेख है- आहवनीय, गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि। यज्ञ की आग आहवनीय है, रसोई की आग गार्हपत्य है और गार्हपत्य अग्नि के दक्षिण में रखी जानेवाली अग्नि दक्षिणाग्नि है। शायद तब का दीप वही हो- रसोई का, घर का। वेदांत काल में, जब यज्ञ बहुत अप्रासंगिक होने लगे थे, तब भी अग्नि का संधान जारी है। मुंडक उपनिषद् में अग्नि की सात जिह्वाएं मानी गई हैं, जिनके अलग अलग नाम हैं, जैसे- काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, धूम्रवर्णा, स्फुलिंगिनी व शुचिस्मिता लीलायमाना। वह युग, जबकि हिमयुग बस बीत ही रहा था, सब ओर वन ही वन था, तब आग कितनी महत्वपूर्ण रही होगी। तब के सरल मन ने अग्नि का दैवीकरण ही नहीं, मानवीकरण भी किया था। अनगिन कहानियां हैं अगिन की, जो वेद से पुराण काल तक चली आती हैं- अग्नि दश दिक्पालों व आठ लोकपालों में परिगणित है। अनेक ऋषि-मुनिगण तपते सूरज के नीचे बैठकर और चारों ओर आग जलाकर पंचाग्नि तप किया करते थे। पार्वती ने भी कर्पूरगौर शिव के लिए यह तप किया था और गौरी से काली हो गई थीं। उसी अग्नि से तपकर सीता कुंदन बन निकल आई थीं। त्रिणाचिकेत की तीसरी आग का पता नहीं। वह अधिभौतिक तो नहीं ही होगी, अधिदैविक यज्ञाग्नि भी नहीं होगी। अन्यथा नचिकेता क्यों कहता कि यज्ञ तो भवसागर पार कर विभवसागर जाने के लिए नौकाएं हैं। वह आग अध्यात्म की ही होगी, जाे न दाहती है, न बुझाती है। बस हुतात्मा बनाकर छोड़ जाती है।

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