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दिल का भंवर:पहले भगवान से बहुत प्रार्थनाएं की, फिर एक दिन ऐसा घटा कि मैंने सभी प्रार्थनाएं बंद कर दीं

सोनू लाम्बा20 दिन पहले
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  • हम प्रार्थनाओं में भी कुछ ना कुछ मांगते रहते हैं, लेकिन मांगना ही तो अड़चन है। कैसा हो अगर हमारी प्रार्थनाएं मांगों से ख़ाली हो जाएं?
  • क्या तब एक रोशनी हमें नई राह नहीं दिखलाएगी?

मेरी सारी प्रार्थनाएं छोटे-बड़े मांगपत्र ही थे। बचपन में वे छोटी-छोटी ख़्वाहिशें, जिन्हें किसी से भी कह दिया जाता तो पूरी कर देता लेकिन शायद मेरे बालमन ने किसी को इतना विश्वसनीय समझा ही नहीं, जितना कि ईश्वर को। वे प्रार्थनाएं पूरी होती थीं या नहीं, कभी याद भी नहीं रखा, क्योंकि वक़्त गुज़रता जाता है तो ख़्वाहिशें बदलती जाती हैं। फिर मन ने प्रतीक्षा ही नहीं की होगी, किसी मनोकामना के पूर्ण होने की, जो त्वरित पूरी हो गई, सो हो गई। उस वक़्त प्रार्थना करना ही महत्वपूर्ण था, उसे पूरे होता देखना नहीं।

किशोरावस्था में तनाव देने लगी थीं घटनाएं। दबाव बढ़ जाते थे- घर और बाहर दोनों ही जगह। ख़ुद से ख़ुद की अपेक्षाएं अलग और दुनिया की अपेक्षाएं जुदा। अपेक्षाएं हमेशा अनावश्यक दबाव पैदा करती हैं... सो प्रार्थनाओं में शामिल हो चला एक ही भाव- तनाव से मुक्ति... उन्मुक्त और बेपरवाह उड़ान की चाह, ईश्वर के समक्ष रखे जा रहे मांग पत्र बदल गए थे और मन ईश्वर से ही अपेक्षा लगा बैठा- जल्दी सुनो...! पूरा करो जल्द ही...। जल्दी, जल्दी, जल्दी...। समय बीता, जीवन में संघर्ष बढ़ा... घर-गृहस्थी में उलझनें, प्रार्थनाएं भी बढ़ती गईं। अब मांगें शिकायतों में परिवर्तित होने लगीं। क्यूं...? मैं ही क्यूं? मेरे साथ ही ऐसा क्यूं? और सब कुछ और उलझने लगा, मन में पीड़ा की परतें जमने लगीं... प्रार्थनाएं आंसुओं के साथ झरने लगीं और वक़्त यूं ही गुज़रता रहा।

फिर एक दिन मैंने प्रार्थनाएं बंद कर दी, निर्वात को आने दिया मन में... तब एहसास हुआ कि वो सब तो मांग-पत्र थे, उसमें प्रार्थनाएं कहां थीं...? तब ही तो मैं ऊब गई थी उनसे, जीवन जीने की शर्तें थीं वे सब कि बस ऐसे हो तो ही ठीक, नहीं हो तो वैसे ही कर दो ना की ज़िद... अपने ही गढ़े प्रतिमानों में फ़िट होने की छटपटाहटें। शून्यता की स्थिति ने मांग पत्रों से मुक्ति दिलाई, अब ईश्वर के समक्ष यूं ही बैठ जाती हूं। कहती हूं आपका सान्निध्य अच्छा लगता है... इत्तेफ़ाक से कोई फूल आंचल में ख़ुद-ब-ख़ुद आ गिरता है तो हाथ अपने आप ही जुड़ जाते हैं, कोई गुत्थी सुलझ जाती है तो मन ही मन धन्यवाद से भर जाती हूं।

अब मैंने मांगना बंद कर दिया और बिन मांगे मिलने वाली सौग़ातों पर धन्यवाद देना शुरू कर दिया है। और यूं धीरे-धीरे मुझे समझ आने लगा है- प्रार्थनाओं का मनोविज्ञान...! जीने की कला ही है- कृतज्ञता का भाव और प्रार्थनाएं उसी का एक रूप।

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