पौराणिक...:इस कारण लक्ष्मीजी ने पति के रूप में भगवान विष्णु को ही चुना, समुद्र मंथन से हुआ था लक्ष्मीजी का प्रादुर्भाव

डॉ. विवेक चौरसिया15 दिन पहले
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  • लक्ष्मी ने विष्णु का वरण इसलिए किया, क्योंकि उनमें तप और ज्ञान तो हैं ही, वे क्रोध और काम को भी जीत चुके हैं। वे त्यागी नहीं हैं किंतु अनासक्त हैं।
  • उनके पास धर्माचरण भी है और प्रेमाचरण भी। उनका ऐश्वर्य दूसरों पर आश्रित नहीं। उनमें आयु और शील तो हैं ही किन्तु उनका वेष मंगलकारी है...

देवी लक्ष्मी का प्राकट्य जल से हुआ है। सृष्टि के आधारभूत पंचतत्वों में एकमात्र जल है, जिसे जीवन की संज्ञा दी गई है। जल है तो जीवन है। जल से ही जीवन की उत्पत्ति, पोषण और रक्षण होता है। इस अर्थ में लक्ष्मी जीवन की देवी हैं जो जगत का पोषण और रक्षण करती हैं। लक्ष्मी द्वारा विष्णु का वरण करने का कारण भी यही है। दोनों जगत के पालक दम्पती हैं और दोनों की सागर से संगति है। देवी सागर उद्‌भवा हैं तो विष्णु नारायण होकर क्षीरसागर रूपी नीर के निवासी हैं। इस प्रकार दोनों जल रूपी जीवन से जुड़कर प्राणी मात्र को जीवन-ज्योति से जगमग करते हैं। अमृत प्राप्ति के लिए देवताओं तथा दानवों के संयुक्त रूप से समुद्रमंथन की कथा सनातन धर्म के प्रायः सभी ग्रंथों में उपलब्ध है। इसी मंथन में अमृत सहित निकले कुल 14 रत्नों में एक लक्ष्मी थीं, जिनके प्राकट्य की सबसे सुंदर व सरस कथा विष्णु भक्ति को समर्पित श्रीमद्भागवत महापुराण में कही गई है। इस कथा में प्राकट्य के बाद शेष देवताओं, ऋषियों व दानवों की उपेक्षा करके लक्ष्मी जी ने विष्णु का ही वरण क्यों किया, इसी में लक्ष्मी प्राप्ति का महामंत्र छुपा हुआ है।

जल है जीवन और ऐश्वर्य का स्रोत
भागवत के आठवें स्कन्ध की कथा के अनुसार...
स मुद्रमंथन में सबसे पहले हलाहल विष निकला और अंत में अमृत। संकेत है कि हर कार्य में अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति से पहले प्रारम्भ में असफलता का विष ही मिलता है। यदि व्यक्ति इससे विचलित न होकर अपने प्रयत्न जारी रखे तो अपेक्षित लक्ष्य से पहले छोटी सफलताओं के रत्न सहज ही मिलने लगते हैं।
इसी अर्थ में विष के बाद क्रमशः कामधेनु, उच्चै:श्रवा अश्व, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष और अप्सराएं निकलीं। ये प्रतीक है कि जल ही समस्त कामनाओं की पूर्ति करता है। कामधेनु और कल्पवृक्ष इसी के उदाहरण हैं। जीवन की गति और जीवन का वैभव भी जल से है। अश्व और गज का प्राकट्य इसी के प्रतीक हैं। अप् अर्थात जल के रस से निर्मित होने के कारण ही अप्सराओं का सौंदर्य अनुपम है। इसलिए कि जल से ही जगत की सुंदरता है। मणि जल के रत्नदाता होने की प्रतीक है। इसीलिए सागर का एक नाम रत्नाकर है। रात्रि में प्रकाश का दाता चन्द्रमा और जीवन पोषक व रक्षक अन्न व औषधियां भी जल से ही प्रकटी हैं क्योंकि जल से ही जगत का उजाला और पुष्टि-तुष्टि सम्भव है।
जल ही धन है इसीलिए धन की देवी लक्ष्मी का उद्‌भव जल से हुआ है।

यूं हुआ था श्रीलक्ष्मी का अभिनंदन
कथा कहती है कि अप्सराओं के बाद शोभा की मूर्ति स्वयं भगवती लक्ष्मी देवी प्रकट हुईं। वे भगवान की नित्यशक्ति हैं। उनकी बिजली के समान चमकीली छटा से दिशाएं जगमगा उठीं। उनके सौंदर्य, औदार्य, यौवन, रूप-रंग और महिमा से सबका चित्त खिंच गया।
देवताओं, असुरों, मनुष्यों सभी ने ये कामना की लक्ष्मी देवी हमें मिल जाएं।
देवराज इंद्र अपने हाथों उनके बैठने के लिए आसन ले आए। श्रेष्ठ नदियों ने मूर्तिमान होकर उनके अभिषेक के लिए स्वर्ण कलशों में पवित्र जल लाकर प्रस्तुत किया। पृथ्वी ने अभिषेक के लिए योग्य औषधियां अर्पित कीं। गायों ने पंचगव्य और वसन्त ऋतु ने चैत्र-वैशाख में होने वाले सब फूल व फल उपस्थित कर दिए। इन सामग्रियों से ऋषियों ने विधिपूर्वक मंगलमूर्ति महालक्ष्मी का अभिषेक किया। उस घड़ी गन्धर्वों ने मंगलमय संगीत की तान छेड़ दी। बादल सदेह होकर मृदंग, डमरू, ढोल, नगाड़े, नरसिंगे, शंख, वेणु और वीणाएं बजाने लगे। तब लक्ष्मी देवी हाथ में कमल लेकर सिंहासन पर विराजमान हो गईं। दिग्गजों ने जल से भरे कलशों से उनको स्नान कराया। उस समय ब्राह्मणगण वेदमन्त्रों का पाठ कर रहे थे।
समुद्र ने देवी को धारण करने के लिए पीले रेशमी वस्त्र समर्पित किए। जल के देवता वरुण ने दिव्य सुगंध वाली वैजयंतीमाला, प्रजापति विश्वकर्मा ने भांति-भांति के आभूषण, सरस्वती ने मोतियों का हार, भगवान ब्रह्माजी ने कमल और नागों ने दो कुंडल देवी को भेंट चढ़ाए।

जब देवी उठीं सुपात्र के वरण को
इस अभिनन्दन के उपरांत लक्ष्मी देवी हाथों में कमल पुष्पों की माला लिए सुपात्र का वरण करने को उठीं। उस माला के चारों ओर उसकी सुगन्ध से मतवाले भौरे गुंजार कर रहे थे। उस समय लक्ष्मी जी के मुख की शोभा अवर्णनीय थी। कुछ लज्जा के साथ वे मन्द-मन्द मुस्करा रही थीं। देवी की कामना सुपात्र पुरुष का वरण करने की थी किंतु गन्धर्व, यक्ष, असुर, सिद्ध, चारण और देवताओं में उन्हें खोजने पर भी योग्य वर न मिल सका।

कथा के अनुसार...
तब देवी मन ही मन विचार करने लगीं कि यहां कोई तपस्वी तो हैं परन्तु उन्होंने क्रोध पर विजय नहीं प्राप्त की है। किसी में ज्ञान है मगर वह अनासक्त नहीं है। कुछ बड़े महत्वशाली हैं किंतु वे काम को नहीं जीत सके हैं। किसी में ऐश्वर्य है लेकिन वे दूसरों पर आश्रित हैं। किसी में धर्माचरण तो है परन्तु प्राणियों के प्रति प्रेम का व्यवहार नहीं है। किसी में त्याग है लेकिन केवल त्याग से मुक्ति संभव नहीं है। कुछ वीर हैं लेकिन मृत्युपाश से मुक्त नहीं हैं। कुछ महात्माओं में विषयासक्ति नहीं है लेकिन वे सदैव समाधि में ही तल्लीन रहते हैं। कोई ऋषि दीर्घायु हैं किंतु उनका शील मेरे योग्य नहीं है और जिसमें शील है उसकी आयु का ठिकाना नहीं है। जिनमें शील व आयु दोनों हैं, वे अमंगल वेष में रहते हैं।
इस प्रकार चिंतन करते हुए अंत में लक्ष्मी देवी ने समस्त सद्‌गुणों की खान भगवान विष्णु का चयन किया। इसलिए कि प्राकृत गुण उनका स्पर्श नहीं कर सकते हैं और अणिमा आदि समस्त गुण उन्हें चाहा करते हैं, लेकिन भगवान हैं कि किसी की भी अपेक्षा नहीं करते। वास्तव में वे ही लक्ष्मी जी के एकमात्र आश्रय हैं, अतः देवी ने उनके गले में कमल पुष्पों की वह माला डाल दी और प्रेमपूर्ण चितवन के साथ उनके हृदय स्थल को देखती हुई उनके निकट खड़ी हो गईं। यह दृश्य देख चारों ओर उत्सव मनने लगा और जयकारों से तीनों लोक गूंज उठे।

सुपात्र के आठ गुण
साधो! इस कथा का मर्म सुपात्र पुरुष के चयन से पूर्व लक्ष्मी के चिंतन के किन्तु-परन्तु से समझा जा सकता है।

पहला
कठोर श्रम अर्थात तप करने पर धन तो पाया जा सकता है लेकिन यदि क्रोध पर क़ाबू न हो तो पास आया धन भी हम गंवा देते हैं। इस अर्थ में जो परिश्रम के साथ क्रोध को नियंत्रित करने में समर्थ होता है उसे ही ‘लक्ष्मी’ मिलती हैं।
दूसरा
ज्ञान से अनेक लोग धन कमा लेते हैं लेकिन उनकी आसक्ति उस धन को ‘लक्ष्मी’ की गरिमा नहीं दे पाती। केवल ज्ञान से अर्जित धन लक्ष्मी नहीं है बल्कि सच्ची लक्ष्मी तो धन के साथ अनासक्ति में है। यही सच्चा ज्ञान भी है। इस अर्थ में जो ज्ञानी के साथ अनासक्त होते हैं, उन्हें ही लक्ष्मी सुलभ होती है।

तीसरा
धन के लिए महत्वाकांक्षी होना आवश्यक है। इसलिए महत्वाकांक्षा से भरे लोग पर्याप्त धन कमा लेते हैं लेकिन वह धन भी ‘लक्ष्मी’ नहीं होता। इसलिए कि अधिक धन व्यक्ति को विलासी और वासनाग्रस्त कर धन की ‘श्री’ का लोप कर देता है। अतः लक्ष्मी उन्हीं का वरण करती है जो महत्वशाली होकर अपनी वासनाओं को भी जीत चुके हों।

चौथा
जिनका ऐश्वर्य दूसरे के आश्रित हो अर्थात् जो बाप-दादाओं के धन पर मौज करते हैं, उनका धन लक्ष्मी क़तई नहीं होता।
सच्ची लक्ष्मी श्रम से अर्जित स्वाश्रित लोगों के ऐश्वर्य में ही विराजमान हो पाती हैं, पराश्रितों के वैभव में नहीं।

पांचवां
धर्माचरण अर्थात कर्तव्य व सदाचार से ही धन आता है लेकिन जो प्रेम से रहित होते हैं, उनका वह धन ‘लक्ष्मी’ नहीं कहलाता। वास्तविक लक्ष्मी तो उसी को मिलती हैं जो कर्तव्य के साथ प्राणीमात्र के प्रति प्रेम का आचरण करता हो।

छठा
संसार के त्यागी के पास भी कभी लक्ष्मी नहीं टिकतीं। ऐसा इसलिए क्योंकि त्याग मात्र से जीवन की मुक्ति नहीं है। इसी कारण शास्त्रों में मोक्ष के लिए धर्म के साथ अर्थ और काम तीनों का त्रिवर्ग ही पुरुषार्थ कहा गया है।

सातवां
दीर्घायु का आशय स्वास्थ्य से है। स्वस्थ व्यक्ति ही धन कमा पाता है। लेकिन वह धन तभी ‘लक्ष्मी’ के गौरव को प्राप्त होता है जब शील अर्थात सद्चरित्र से सम्पन्न हो।

आठवां
जिसमें स्वास्थ्य और शील के साथ मंगल वेष को महत्व दिया गया है। जिसका आशय है कि जो सुव्यवस्थित नहीं रहते, लक्ष्मी उन्हें कभी नहीं मिलती।

(लेखक पौराणिक साहित्य के अध्येता और परिवार में जीवन मूल्य और नई पीढ़ी में भारतीय संस्कृति के प्रति आग्रही हैं।)

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