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बोधकथा:काम से जी चुराने वाले शिष्यों को गुरुजी ने यूं पढ़ाया पाठ कि उन्होंने फिर कामचोरी से तौबा कर ली

19 दिन पहले
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  • शिष्यों को सीख देने के लिए गुरु के पास कई अनोखे उपाय होते हैं।
  • ऐसे ही दो आलसी शिष्यों को गुरु ने मज़ेदार तरीक़े से सीख दी कि वे उसे कभी नहीं भूल पाए।

द ण्डकारण्य के जंगलों में एक गुरुकुल था जहां के गुरुजी की ख़्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। उस गुरुकुल में यूं तो बहुत प्रज्ञावान शिष्य पढ़ा करते थे, किंतु दो शिष्य ऐसे थे जो महाआलसी थे।
एक दिन की बात है। गुरुजी पूजा करने बैठे। संयोगवश उस दिन वे दोनों कामचाेर शिष्य ही उनके साथ थे। पूजा की सारी तैयारी के बाद गुरुजी को याद आया कि वे तुलसी की पत्तियां तो लाना भूल ही गए हैं। उन्होंने एक शिष्य से कहा- ‘जाओ तुलसी की कुछ पत्तियां तोड़कर ले आओ।’
शिष्य ने कहा, ‘गुरुजी, मैं आपकी आज्ञा टालना तो नहीं चाहता पर क्षमा करें कि मैं तुलसी के पौधे को पहचानता ही नहीं।’ इतना कहकर वह सिर झुकाकर खड़ा रहा जैसे गुरुजी की आज्ञा का इंतज़ार कर रहा हो।
जब दूसरे शिष्य ने देखा कि तुलसी की पत्तियां लेने के लिए यदि यह नहीं गया तो मुझे ही जाना पड़ेगा। इसलिए अपना पीछा छुड़ाने के लिए डपटने के लहज़े में बोला, ‘अरे तुम्हें तुलसी की पत्तियां भी नहीं पता। इतना आसान तो है उन्हें पहचानना। ये हाथ बराबर लम्बी और बड़ी-बड़ी होती हैं। सारे बाग़ीचे में वही तो लगी हैं। क्यों गुरुजी सही कह रहा हूं न।'
गुरुजी बोले, ‘यानी तुम्हें भी नहीं पता तुलसी का पौधा कौन-सा होता है।’
दूसरा शिष्य बोला, ‘अच्छा वो तुलसी का पौधा नहीं है क्या? फिर तो मुझे भी नहीं पता उसका पौधा कौन-सा है।’
चूंकि गुरुजी का नियम यह था कि एक बार पूजा के लिए बैठने के बाद पूजा के बाद ही उठते थे, इसलिए वे बोले, ‘लगता है अब मुझे ही जाना होगा। लेकिन एक समस्या यह है कि हम पूजा से पहले उठ नहीं सकते। तो ऐसा करो कि तुम दोनों मिलकर हमें इस लकड़ी के आसन सहित ही उठाकर बाग़ में ले चलो। हम वहीं से तुलसी के पत्ते तोड़ लाएंगे।’
शिष्यों को इसकी उम्मीद न थी। मजबूरन उन्हें गुरुजी को उनके आसन सहित उठाना पड़ा। गुरुजी भी उनके साथ बाग़ीचे में गए और तुलसी के पत्ते दिखाकर पूछा, ‘देखो, यह है तुलसी का पौधा। याद रहेगा न!’
दोनों शिष्य दुखते हाथ और कमर को पकड़कर बोले, ‘गुरुजी अगले जन्म तक भी नहीं भूलेंगे।’
प्रस्तुति : कविता मेहता

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