अहा! अतिथि:'क्राइम पेट्रोल' के एंकर के रूप में घर-घर में मिली पहचान, पहली ही बार में हो गया था एनएसडी में अनूप सोनी का चयन

दीपक दुआ17 दिन पहले
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  • मैं अनूप सोनी आपका स्वागत करता हूं।
  • जुर्म की दुनिया के मनोविज्ञान, पुलिस की तफ़्तीश और कहानी के पात्रों की गतिविधियों से जुड़ी स्क्रिप्ट की धाराप्रवाह रोचक प्रस्तुति देते अनूप सोनी सबके ज़ेहन में हैं।
  • उनकी पहचान भले यहां आकर पुख़्ता हुई, लेकिन उनका परिचय सुदीर्घ है।मायानगरी की चकाचौंध में साधारण और सहज होना ही अनूप सोनी की असाधारण ख़ूबी है।
  • उन्हें जिस ‘क्राइम पेट्रोल’ के ज़रिए घर-घर में पहचान मिली, उसमें भी वे अपने वास्तविक रूप में ही नज़र आए। तमाम क़ामयाबी के बावजूद उनके पैर ज़मीन पर ही रहे।
  • दिलचस्प है कि –दृढ़ इरादों वाले अनूप ने हमेशा प्लान-बी अपने पास रखा और लौटने को तैयार रहे। शायद यही वजह है कि वे लगातार आगे बढ़ते गए।
  • अहा! ज़िंदगी से हुई बातचीत में उन्होंने अपना सफ़र बयां किया, जो सफलता पाने और उसे टिकाए रखने के ख़्वाहिशमंद लोगों के लिए प्रेरणास्पद हो सकता है।

अनूप का शाब्दिक अर्थ होता है- उपमा रहित, अद्वितीय, बेजोड़, निराला। अभिनेता अनूप सोनी से बातें होती हैं तो पता चलता है कि वह सचमुच अपने नाम के अर्थों को अपने व्यक्तित्व में संजोए हुए हैं। चौथाई सदी से ज़्यादा वक़्त हो गया उन्हें मायानगरी में, मगर आज भी उनके इर्दगिर्द वह आभामंडल दिखाई नहीं देता जो यहां ज़रा-सी लोकप्रियता और स्टारडम पाने वाले लोग अपने चारों तरफ़ ओढ़े घूमते हैं।

अनूप आज भी उतने ही संभले और ठहरे हुए लगते हैं, जितने वे अपने संघर्ष के दिनों में रहे होंगे। ऊंचा तबक़ा जिन बातों को ‘सो मिडिल क्लास’ कहकर मुंह बनाता है, उन्हीं मध्यमवर्गीय संस्कारों में पगे अनूप अपनी बातों, अपने व्यवहार और अपने काम से हमारे दिलों में जगह बना लेते हैं।

प्लान के साथ किया काम
अनूप बताते हैं, ‘मैंने जीवन में जो कुछ भी किया पूरी प्लानिंग के साथ किया। नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा गया तो तय करके कि एक बार में एडमिशन नहीं हुआ तो लौटकर वकालत की पढ़ाई चालू रखूंगा। मुंबई गया तो तय करके कि दो साल में कुछ नहीं हुआ तो फिर कोई नौकरी कर लूंगा। टीवी से हटा तो सोच-समझकर और फ़िल्में छोड़कर टीवी में लौटा तो पूरे होशोहवास में। इसका श्रेय मैं अपने परिवार और ख़ासतौर से अपने पिता की सीखों को देना चाहूंगा, जो मुझे हमेशा समझाते थे कि प्लान-ए के साथ-साथ प्लान-बी भी तैयार रखना चाहिए।’

फ़ौलादी इरादे और गुलाबी नगरी
अनूप के पिता फ़ौलाद यानी स्टील बनाने वाली सरकारी कंपनी स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया लिमिटेड के कर्मचारी थे। हर कुछ साल में उनका ट्रांसफ़र होता रहता था, सो अनूप ने भी परिवार के संग कई शहर देख डाले। पंजाब के लुधियाना शहर में 30 जनवरी को जन्मे अनूप अभी गोद में ही थे, जब परिवार जालंधर आ गया। यहां कुछ साल मॉडल टाउन में रहे, जिसके बाद दिल्ली के पास फ़रीदाबाद उनका अगला ठिकाना बन गया। अनूप ने छह से तेरह साल की उम्र यहां गुज़ारी और फिर इनका परिवार जा पहुंचा गुलाबी नगरी जयपुर में। आज भी अनूप ख़ुद को जयपुर का ही मानते हैं। कहते हैं, ‘मेरी स्कूली पढ़ाई जयपुर में ही पूरी हुई। यहीं से बी.कॉम करने के बाद मैंने राजस्थान यूनिवर्सिटी में एलएलबी में एडमिशन ले लिया। यहीं मुझे थिएटर का चस्का लगा और यहीं से मैं नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा (एनएसडी) में गया। जयपुर से मुझे सचमुच बहुत प्यार है।’

आगे की कहानी अनूप के ही शब्दों में...

टीन-टप्पर से हुई शुरुआत
स्कूल के आख़िरी दिनों में मैंने एक अख़बार में पढ़ा कि जयपुर के नामी थिएटर आर्टिस्ट साबिर ख़ान साहब एक महीने की थिएटर वर्कशॉप करवा रहे हैं। गर्मी की छुट्टियां थीं और मात्र 30 रुपए फ़ीस थी तो पिताजी ने भी मुझे इजाज़त दे दी। 30 दिन तक मैंने वहां कुछ सीखा, कुछ देखा, कुछ किया और एक महीने बाद हम लोगों ने मिलकर एक नाटक भी किया, जिसका नाम था ‘टीन-टप्पर’। इसमें मेरे काम की प्रशंसा हुई और 17 साल की उम्र में ऐसी तारीफ़ें मिलीं कि मुझे लगने लगा अभिनय में भी मेरा भविष्य हो सकता है। इसके बाद मुझे रंगमंच का चस्का लग गया और कॉलेज करते-करते मैंने बहुत सारा थिएटर किया।

वकालत छोड़ थिएटर की ओर
बी. कॉम करने के बाद मैंने एलएलबी में दाख़िला लिया और फ़र्स्ट ईयर पूरा भी कर लिया कि तभी मुझे दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ़़ ड्रामा के बारे में पता चला। जिस तरह के परिवार से मैं आता हूं, वहां पर पढ़ाई-लिखाई के बाद नौकरी करने को अहमियत दी जाती है। मेरा भी यही प्लान था कि लॉ कर रहा हूं, इसके बाद वकालत की प्रैक्टिस करूंगा। पर एनएसडी के बारे में जानकारी मिली तो सोचा कि कोशिश करने में क्या हर्ज़ है! मैंने पिताजी से बात की तो उन्होंने एतराज़ नहीं किया लेकिन समझाया कि यह एक-दो महीने की वर्कशॉप नहीं है, जो तुम लॉ की पढ़ाई बीच में छोड़कर चले गए और वापस आकर फिर से शुरू कर दी। तीन साल तक दिल्ली जाकर रहना होगा, उसके बाद क्या करोगे? तब मैंने कहा कि मैं एडमिशन के लिए कोशिश करता हूं, अगर हो गया तो ठीक, नहीं तो लॉ तो मैं कर ही रहा हूं।

कठिन डगर एनएसडी की
एनएसडी में प्रवेश भी आसान नहीं था। इरफ़ान ख़ान के बाद पूरे राजस्थान से किसी का भी वहां पर दाख़िला नहीं हुआ था। कई चरणों से गुज़रना पड़ता है और तब कहीं जाकर 20 लोगों को एडमिशन मिलता है। तो इस काम में जयपुर के बहुत सारे सीनियर रंगकर्मियों ने मेरी मदद की कि मुझे क्या तैयारी करनी चाहिए, क्या पढ़ना चाहिए वगै़रह। मैंने भी ख़ुद को झोंक दिया और मेहनत कहिए या क़िस्मत, पहली ही बार में मेरा वहां एडमिशन हो गया।

झोली भरकर ज्ञान मिला
जब मैं नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा पहुंचा तो वह मेरे लिए एक अलग ही दुनिया थी। मैंने ख़्वाबों-ख़यालों में भी नहीं सोचा था कि रंगमंच का संसार इतना विस्तार लिए हुए है और अभी तक हम लोग जो करते आए हैं वह तो इसके आगे कुछ भी नहीं। न सिर्फ़ देश के बल्कि दुनियाभर के नाटकों और साहित्य के बारे में मुझे वहां जानने, समझने और पढ़ने को मिला। एनएसडी की विशाल लाइब्रेरी में मैंने ऐसी-ऐसी किताबें पढ़ीं, जिनके बारे में कभी सुना और सोचा तक नहीं था। उन तीन सालों में मुझे वहां से झोली भरकर ज्ञान मिला, जिसका लाभ मुझे आज तक मिल रहा है। मेरा जो पूरा व्यक्तित्व है, वह वहीं रहकर बना और निखरा।

1993 में एनएसडी से निकलने के बाद मैं वापस जयपुर गया और फिर से थिएटर करने लगा। बाद में पिताजी का ट्रांसफ़र दिल्ली हो गया। यहां भी मैं थिएटर करने लगा, जिसके कुछ महीने बाद मैंने घरवालों को कहा कि अब मैं एक बार मुंबई जाकर फ़िल्म इंडस्ट्री में हाथ आज़माना चाहता हूं। एक बार फिर से घर में बैठक हुई कि क्या करोगे, कैसे काम मिलेगा, न कोई जान-पहचान, न कोई गॉडफ़ादर। लेकिन मैंने कहा कि मेरे ऊपर एनएसडी का जो ठप्पा है, उसकी फ़िल्म इंडस्ट्री में इज़्ज़त है और बतौर एक एक्टर मुझे ख़ुद को एक मौक़ा तो देना ही चाहिए। तब यह तय हुआ कि मैं ख़ुद को दो साल दूंगा और इस बीच अगर मुंबई शहर ने मुझे स्वीकार कर लिया तो ठीक, वरना मैं वापस आकर एलएलबी पूरी करूंगा। फिर वकालत को ही अपना प्रोफ़ेशन बनाऊंगा और थिएटर सिर्फ़ मेरा शौक़ रहेगा।

ई है मुंबई नगरिया
चूंकि मैं एक मिशन लेकर मुंबई आया था और मेरे पास सीमित वक़्त था तो मैं यहां आते ही जुट गया और लोगों से मिलने, काम मांगने में लग गया। इसी बीच मुंबई में एक मशहूर एक्टिंग स्कूल चलाने वाले किशोर नमित कपूर साहब से मेरी मुलाक़ात हुई और उन्होंने मुझे अपने स्कूल में हफ़्तेे में दो दिन बच्चों को पढ़ाने का काम दे दिया। वहां पर बहुत सारे नए कलाकारों को मैंने पढ़ाया, जिनमें अक्षय खन्ना, प्रिया गिल, सोनाली बेंद्रे, अपूर्व अग्निहोत्री, तारा देशपांडे जैसे लोग शामिल थे। लेकिन तब भी मेरे दिमाग़ में यह स्पष्ट था कि मुझे ताउम्र यह नहीं करना है। इसलिए काम मांगने का मेरा मिशन भी साथ-साथ चल रहा था।

सी हॉक्स से भरी उड़ान
कुछ छोटे-छोटे काम मुझे मिल रहे थे और मेरा गुज़ारा चलने लगा था, लेकिन तभी मुझे एक बहुत बड़े टेलीविज़न शो का ऑफ़र आया, जिसका नाम था ‘सी हॉक्स’। इस धारावाहिक ने मेरे करियर को सही मायने में लॉन्च कर दिया। ओम पुरी साहब, आर. माधवन, मनोज पाहवा, सिमोन सिंह, मिलिंद सोमण, जैसे कलाकारों और अनुभव सिन्हा व शिवम नायर जैसे निर्देशकों के साथ मुझे इसमें काम करने का मौक़ा मिला। दर्शकों ने इस धारावाहिक को पसंद किया। मेरी गाड़ी चल निकली।

पहला आशियाना
मुझे लगातार काम मिल रहा था और पैसा भी ठीक-ठाक मिलने लगा था। मैंने 1999 में ही मुंबई में अपना पहला घर ख़रीद लिया था। घरवालों को भी लगने लगा कि जब इसने तीन साल में ही घर ख़रीद लिया है तो आगे भी अपनी लाइफ़ चला ही लेगा। बस, उसके बाद न उन्होंने कभी कोई रोक-टोक की और न मैंने पीछे मुड़कर देखा। लेकिन कुछ समय बाद मुझे लगा कि यार, मैं फ़िल्में तो कर नहीं रहा हूं। तो सोचा कि टेलीविज़न से एक ब्रेक लेते हैं और फ़िल्मों में कोशिश करते हैं। अब मैंने पूरी प्लानिंग के साथ फ़िल्मों की तरफ़ क़दम बढ़ाए और ‘ख़ुशी’, ‘इंतेहा’, ‘गंगाजल’, ‘अपहरण’, ‘तथास्तु’ जैसी कई फ़िल्मों में काम किया।

हीरो बनने की चाह नहीं
इंडस्ट्री में असलियत को समझना बहुत ज़रूरी है। मुझे हमेशा से ही अच्छे रोल की चाहत रही और इस बात का शुरू से ही अहसास था कि जिस तरह का सिनेमा बन रहा है और उसमें एक हीरो से जिस क़िस्म की अपेक्षाएं की जाती हैं, वह बात अपने साथ है नहीं। न ही अपना यहां कोई गॉडफ़ादर था जो मुझ पर करोड़ों ख़र्च करके मुझे हीरो बनाने का जोखिम उठाता। तो इस बात को लेकर मेरे दिमाग़ में कोई कन्फ्यूजन कभी नहीं रहा और मुझे जो काम मिलता गया, उसी में से अपने लिए बेहतर काम चुनकर करता रहा। मन में बस यही था कि जो भी काम करूं वह अच्छा हो जो मुझे एक कलाकार के तौर पर आगे ले जाए और दर्शकों को भी मुझे देखना अच्छा लगे। लेकिन बहुत जल्द मुझे यहां भी ऐसा लगने लगा कि अब मुझे कुछ और करना चाहिए।

वापस छोटे पर्दे पर
उन्हीं दिनों मेरी मुलाकात ‘सीआईडी’ बनाने वाले बीपी सिंह से हुई, जिन्होंने मुझे ‘सीआईडी स्पेशल ब्यूरो’ ऑफ़र किया। इसमें मैंने क़रीब दो साल तक काम किया इसके बाद मुझे ‘बालिका वधू’ ऑफ़र हुआ। हालांकि मैं डेली-सोप नहीं करना चाहता था लेकिन जब इसके लेखक पूर्णेंदु शेखर जी ने कहानी सुनाई तो लगा कि इसमें काम किया जा सकता है। देखते ही देखते यह सीरियल लोकप्रियता के चरम पर जा पहुंचा। डेढ़-दो साल बाद मुझे फिर कुछ बदलाव की ज़रूरत महसूस हुई। तब मुझे ‘क्राइम पैट्रोल’ का प्रस्ताव मिला।

क्राइम पेट्रोल ने बदल डाली दुनिया
क्राइम पेट्रोल भी मैंने इसलिए किया था कि यह एक्टिंग नहीं है बल्कि मुझे इसमें एंकरिंग करनी थी। लगा कि इसमें तो मैं अनूप सोनी ही रहूंगा न कि कोई दूसरा किरदार। ऐसा पहले कभी नहीं किया था तो इसे करने को राज़ी हो गया और देखिए जो लोकप्रियता, जो कामयाबी, जो पहचान मुझे मेरा कोई धारावाहिक, कोई फ़िल्म नहीं दिलवा पाई, वह मुझे इस शो से मिल गई।

बहन-भाई का प्यार
मेरी सिर्फ़ एक बहन है जो मुझसे पांच साल छोटी है और इस समय अपने परिवार के साथ अहमदाबाद में रहती है। बचपन में हमारे बीच कोई ऐसा ख़ास लड़ाई-झगड़ा वगै़रह नहीं होता था क्योंकि एक तो मैं उससे पांच साल बड़ा था और दूजे जब तक वह थोड़ी बड़ी हुई तो मैं पहले थिएटर और फिर नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा में चला गया। हमारे बीच नोक-झोंक तो हुईं लेकिन एक-दूसरे को सताने या तंग करने की यादें नहीं हैं। बल्कि मुझे एक वक़्त पर तो यह मलाल भी रहा कि मैंने उसके साथ ज़्यादा समय नहीं बिताया। अगर मैं थिएटर या टेलीविज़न की दुनिया में नहीं होता तो शायद बहन के साथ और समय बिता पाता।

ख़ाली डिब्बा था मैं
जब मैं एनएसडी पहुंचा तो एक ख़ाली डिब्बे की तरह था और मेरे टीचर्स उस डिब्बे में जो भरते गए उसे मैं अपने भीतर जज़्ब करता चला गया। इसीलिए आज मैं अपने उन तमाम टीचर्स को बहुत याद करता हूं, जिनमें कीर्ति जैन जी, निभा जोशी जी, रामगोपाल बजाज जी, बेरी जॉन जी, अनुराधा कपूर जी, रॉबिन दास जी जैसे वे लोग थे, जिन्होंने हमें निखारने में बहुत योगदान दिया। अगर उस समय नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के ये लोग नहीं होते तो आज मैं इस मुक़ाम पर नहीं होता।

सीनियर-जूनियर भाई-भाई
ज़ाकिर हुसैन, राजेश तैलंग, आदिल हुसैन आदि मेरे बैच में थे तो बहुत सारे सीनियर और जूनियर भी थे जिनके साथ मेरी हसीन यादें हैं। आशुतोष राणा, यशपाल शर्मा, कुमुद मिश्रा मुझसे जूनियर बैच में थे। अतुल कुलकर्णी इनके बाद वाली बैच में थे। एनएसडी की रैगिंग भी बहुत रचनात्मक होती थी। शुरुआत के सात दिन रोज़ रात को 9 से 12 बजे तक सीनियर लोग रैगिंग करते थे और उसके लिए भी बाक़ायदा कोई न कोई प्रोजेक्ट दिया जाता था कि आपको यह बनाकर लाना है या करके दिखाना है। इसके बाद आठवें दिन होता था बड़ा खाना, जो सीनियर्स की तरफ़ से जूनियर्स के स्वागत में आयोजित किया जाता था। इसमें सीनियर ख़ुद खाना बनाते थे और जूनियर्स को अपने हाथों से परोसते भी थे। सीनियर-जूनियर के बीच एक सम्मान का रिश्ता वहीं से बन जाता था और वह आज तक कायम है। जैसे आशुतोष राणा हैं या अतुल कुलकर्णी हैं, ये मुझे जहां भी मिलते हैं, भाई कहकर संबोधित करते हैं। इसी तरह से मैं अपने सीनियर्स राजेश जायस या तिग्मांशु धूलिया को हमेशा भाई ही कहता हूं।

दिल्ली की गलियाें का अनुभव
दिल्ली मेरा पहले भी जाना होता था क्योंकि हमारे बहुत सारे रिश्तेदार वहां हैं, लेकिन एनएसडी के उन तीन सालों की यादें बहुत ख़ुशनुमा हैं। हमारा होस्टल जहां था, वहां से चाहे इंडिया गेट हो, बंगाली मार्केट या आईटीओ का प्रेस एरिया, सभी नज़दीक थे। आईटीओ पर अंडे और पराठे की दुकानें रातभर चलती थीं क्योंकि वहां रात को अख़बार छपते थे तो वहां हमारा अक्सर जाना होता था। कई बार पैदल तो कई बार किसी की मोटरसाइकिल पर लदकर वहां जाने, पराठे खाने या सबके लिए पैक करवाकर लाने का एक अलग ही अनुभव था।

थाली से ऊपर उठना है
हम तीन लोग थे- मैं, राजेश तैलंग और हरीश खन्ना जो एनएसडी से एक साथ निकले थे और मुंबई के अंधेरी ईस्ट इलाक़े में एक साथ एक कमरा किराए पर लेकर रहते थे। मेरे मन में यह ख़याल तो ख़ैर कभी नहीं आया कि मुझसे नहीं हो पाएगा और मुझे वापस जाना पड़ेगा। लेकिन यह विचार ज़रूर आता था कि यार, इस तरह से तो ज़्यादा दिन नहीं चल सकेगा कि एक छोटे-से कमरे में तीन लोग साथ रह रहे हैं, ढाबे पर थाली लेकर खा रहे हैं। तो मन में यह ठान लिया था कि इससे बाहर निकलना है, इस थाली से ऊपर उठना है। तो जब ‘सी हॉक्स’ के बाद मैंने थोड़ा-बहुत पैसा जमा कर लिया और एक घर ख़रीदा तो सबसे पहले उसमें एक कुक रखा, जो मुझे मेरी पसंद का खाना बनाकर खिलाता था। तो मैं आज भी वे दिन याद करता हूं और ऊपरवाले का शुक्र अदा करता हूं कि उसने मुझे इतनी क़ाबिलियत दी कि मैं जीवन में आगे बढ़ सका।

नो नेपोटिज़्म
फ़िल्म इंडस्ट्री के बारे में अक्सर यह बात होती है कि यहां फ़िल्मी कलाकारों के परिवार से आने वालों को या जान-पहचान वालों को ज़्यादा काम मिलता है। लेकिन मेरा मानना है कि ऐसा नहीं है। जान-पहचान वालों को कोई एक बार या दो बार मौक़ा दे देगा लेकिन आख़िरकार आपका काम ही आपकी पहचान बनेगा। मैं जब यहां आया तो किसी को नहीं जानता था। लेकिन इस इंडस्ट्री ने मेरे काम का आकलन किया और मुझे यहां भरपूर काम मिला।

बच्चे मन के पक्के
हर पीढ़ी की कुछ ख़ूबियां और ख़ामियां होती हैं। मुझे लगता है कि आज की पीढ़ी के बच्चों की सोच हम लोगों के मुकाबले ज़्यादा स्पष्ट है। आप उन्हें नैतिकता सिखा सकते हैं, अच्छे संस्कार दे सकते हैं, ऐसा करना भी चाहिए; लेकिन उन्हें किस दिशा में जाना है, क्या करना है, यह शायद वे आपसे बेहतर समझते हैं। आप उन्हें सलाह दे सकते हैं, सहयोग दे सकते हैं, लेकिन उंगली पकड़कर उन्हें नहीं चला सकते।

मेरे बच्चे जो करना चाहेंगे, मैं उन्हें नहीं रोकूंगा। जैसे मेरे पिता ने मेरा साथ दिया, मुझे दुनिया की ऊंच-नीच से वाकिफ़ कराया, वही काम मैं उनके लिए करूंगा। अगर हम अभिभावक के तौर पर जागरूक हों, दुनिया के बदलावों से परिचित हों, बच्चों को सही-ग़लत में अंतर करना सिखाएं, तो न सिर्फ़ अपराध कम होंगे, अपराध-पीड़ित कम होंगे, बल्कि ये दुनिया बेहतर भी बनेगी।

(लेखक परिचय

दीपक दुआ

1993 से फ़िल्म पत्रकारिता में सक्रिय। सिनेमा व पर्यटन पर नियमित लेखन। चुनिंदा फ़िल्म समीक्षकों की संस्था ‘फ़िल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य। देश के बहुत से फ़िल्म समारोहों से जुड़ाव।)

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