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स्वाद आबाद:भोजन में भी होता है हास्य रस, कहीं थाली से उड़ता था पंछी तो कहीं खिचड़ी ही सूरमा पर भारी पड़ती थी

पुष्पेश पंत16 दिन पहले
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1960 के दशक का एक फ़िल्मी गाना है, जो उस ज़माने में काफ़ी लोकप्रिय हुआ था-
‘अप्रैल फ़ूल बनाया, तो उनको ग़ुस्सा आया!
इसमें मेरा क्या क़सूर, ज़माने का क़सूर, जिसने दस्तूर बनाया!'

अब यह बहस बेकार है कि यह दस्तूर स्वदेशी है कि विदेशी, अपने परिवार के सदस्यों और दोस्तों को इस दिन छकाने या दिल्लगी में बेवक़ूफ़ बनाने की प्रथा अपनी जड़ें हमारे देश में भी जमा चुकी है। खान-पान का संसार हास-परिहास के साथ छकाने के लालच से अछूता नहीं रहा है।

याद रखने लायक़ बात यह है कि हमारे विनोदी पुरखे इसके लिए एक ख़ास मुक़र्रर दिन का इंतज़ार नहीं करते थे। कभी ‘बुरा न मानो होली है!’ का नारा बुलंद किया जाता था तो कभी ख़ुद को खाने का असाधारण पारखी समझने वाले अहंकारी मेहमान को शर्मिंदा करने की व्यूह रचना गृहणियां रचती थीं।

उड़ जावे पंछी फुर्र...

वाजिद अली शाह के शासनकाल में वाक्‌पटु दरबारियों की तरह व्यंजनों के माध्यम से अपने कौशल का प्रदर्शन करने की कला अवध के बावर्चियों ने विकसित की थी। शरर की प्रसिद्ध पुस्तक गुजिश्ता लखनऊ में कई ऐसे क़िस्सों का बखान है। शतरंज के अय्याश खिलाड़ियों के लिए करने-धरने को कुछ ख़ास अंग्रेज़ों ने छोड़ा नहीं था, पूरा समय एक-दूसरे की टांग-खिंचाई में बीतता था। कभी नमकीन कोरमे या पुलाव की शक्ल में मीठे मुरब्बे मेहमान के सामने पेश किए जाते थे तो कभी सामने रखी तश्तरी ही खाने का मुख्य पदार्थ होती थी। इसी समय वह पर्दानशीन पुलाव ईजाद किया गया, जिसकी आटे की चादर हटाते ही चहचहाते पंछी उड़ निकलते थे! बहुत समय तक इस क़िस्से को मनगढ़ंत समझा जाता था, पर हाल में प्रकाशित ऑस्ट्रिया के युवराज आर्कड्यूक फ्रांत्स फ़र्दिनान्द के यात्रा संस्मरणों से इसकी प्रामाणिक पुष्टि हो चुकी है कि इस अद्भुत व्यंजन को निज़ाम ने उनके स्वागत में पेश किया था। हमारे मित्र लखनऊ के मुहम्मद फ़ारूक ने हमें यह बताया था कि उनके पिता के देहांत के बाद इसे बनाने का कौशल उस शहर में शेष नहीं रहा था। फ़ारूक मियां ने ही यह रहस्योद्‌घाटन किया कि ऊपर से पंछी अंदर जिस व्यंजन में रखा जाता था उसका तला नहीं होता था, सिर्फ़ बाहरी गोलाकार परत यह भ्रम पैदा करती थी कि नीचे से भी यह बंद है। ज़ाहिर है पंछी इस दस्तरख़्वान में ले जाने के ठीक पहले इस पिंजरे में थोड़ी देर के लिए ही क़ैद किए जाते थे। ख़ुद फ़ारूक भाई को इस बात का फख़्र है कि वह जो ‘माही कलिया’ पकाते हैं, स्वाद और शक्लो-सूरत में बिल्कुल मछली लगता है, जबकि इसे बकरे के गोश्त से (टखने की ‘मछली’ कहलाने वाली मांसपेशी से) तैयार किया जाता है।

खिचड़ी जो सूरमा को पछाड़ दे
शरर ने ही हमें उस खिचड़ी की याद भी ताज़ा कराई है, जिसके ‘चावल’ के दाने बादाम की गिरी से तराशे जाते थे और दाल की जगह पिस्ते के कण!
एक बार एक भूखे पहलवान के सामने इसके कुछ निवाले रखे गए तो वह ग़ुस्से में बौखला उठा, लेकिन इस गरिष्ठ पकवान की तासीर यह थी कि दो-चार निवाले खाते ही उसका पेट भर गया, पसीने छूटने लगे और वह पानी मांगने लगा।
आज़ादी के पहले देसी रियासतों रजवाड़ों में भी यह होड़ लगी रहती थी कि अपनी नफ़ासत-नज़ाकत का प्रदर्शन दस्तरख़्वान पर करें। इन्हीं दिनों ‘गोश्त का हलवा’ और ‘लहसुन की खीर’ का आविष्कार हुआ और ‘मुजाफ़र’ एवं ‘मुतंज़न’ जैसे मीठे पुलावों का भी। गोश्त के हलवे का नुस्ख़ा सैलाना के महाराज द्वारा संकलित पाक पुस्तक में मिलता है और वहीं ‘मांस की कढ़ी’ बनाने का तरीक़ा भी बतलाया गया है।
इनसे प्रेरणा ग्रहण कर हमारे एक और प्रतिभाशाली शौक़िया शेफ़ ओसामा जलाली ने ‘हरी मिर्च का हलवा’ खिलाना शुरू किया है। उनकी अम्मी आलू का मज़ेदार ज़र्दा बनाने में सिद्धहस्त हैं, जिसे देखते-खाते यह पता ही नहीं चलता कि इसमें चावल का नामों-निशान नहीं। हैदराबाद में बनाए जाने वाले ‘बेसन के खट्टे नींबुओं’ को भी इस सूची में रखा जा सकता है। बर्फ़ी की शक्ल में कटे अंडे के हलवे के टुकड़े आजकल कम देखने को मिलते हैं। कोई बीसेक साल पहले ही यह मिठाई लुप्तप्राय बन चुकी थी।

घरेलू रसोई भी पीछे नहीं!
यह सोचना ग़लत है कि घरों की रसोई में
खाने वालों को झांसा देने का चलन नहीं था। बंगाल में ‘धोकार दालना’ सामिष व्यंजन वाली तरी में बेसन की कतली का खिलवाड़ है, जो अपना नाम सार्थक करता है। बनारस के विख्यात आनंद कृष्णदास जी ने बरसों पूर्व मेरा परिचय ‘अलीक मत्स्य' से कराया था, जिसे अरबी के पत्तों में दाल की मसालेदार पीठी भरकर तैयार किया जाता है। गांव-देहात में गोश्त के मसालों में पतौड़े/ रिकौंच डुबाकर इसी तरह की मरीचिका को जन्म दिया जाता था। दक्षिण भारत में तमिलनाडु के अभावग्रस्त परिवारों में चिकन खाने की बच्चों की ज़िद पूरा करने के लिए सूखे नारियल के टुकड़ों को मसालेदार पतली तरी में पकाते हैं। लेकिन इसे शायद करुण रस का उदाहरण कहना चाहिए, हास्य रस का नहीं।

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