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मरासिम:सास और बहू यदि इन बातों को आत्मसात कर लें तो बहुत सारे बेवजह झगड़ों से आसानी से बचा जा सकता है

डॉ. चीनू अग्रवाल21 दिन पहले
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  • अपने बच्चों की शादी का अरमान भला किसे नहीं होता? सब अपनी-अपनी क्षमता अनुसार अच्छी से अच्छी शादी करना चाहते हैं।
  • बेटियां भी ससुराल को ख़ुशहाल बनाने का सपना संजोए ही तो वहां जाती हैं। जब दोनों तरफ़ एक-सा ही भाव है तो भला सास-बहू के रिश्ते में अक्सर तनाव क्यों उत्पन्न हो जाता है?
  • आइए आज इस लेख के माध्यम से हम इस रिश्ते का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करने का प्रयास करते हैं।

क्या अपेक्षाएं होती हैं सास की बहू से और बहू की सास से? इस रिश्ते का पारंपरिक, आधुनिक, सामाजिक महत्व क्या है? कैसे इसे सुदृढ़ और मधुर बनाया जा सकता है। विचार करने बैठती हूं, तो... मुझे अपनी शादी से पहले का वो क़िस्सा याद आता है जब मम्मी ने मुझे चाय बनाने को कहा।

जब मेरी शादी तय हुई तब मैं डॉक्टर बन चुकी थी, इंटर्नशिप का आख़िरी महीना चल रहा था। पूरा वक़्त पढ़ाई और अस्पताल की ड्यूटी में जाता था। मम्मी वैसे कभी भी रसोई का काम हमसे नहीं करवाया करती थीं। पर चाय अक्सर मैं ही बनाती थी। मैं चाय बना रही थी और मम्मी बाहर के कमरे से मुझसे बात कर रही थीं। बोलीं, बेटा दूध की भगोनी वापस फ्रिज में रख देना। मैंने कहा, अच्छा मां। बेटा चाय की पत्ती डस्टबिन में डाल देना साथ के साथ। मैंने कहा, ठीक है। अदरक किसने के बाद किसनी धो देना नहीं तो सूख जाएगी। मैंने कहा, हां। वो बाहर बैठी-बैठी बोलती रहीं और मैं उनके कहे अनुसार करती भी रही।

जब मैं चाय देने गई तो बोलीं- बेटा मैंने तुम्हें इतने सारे निर्देश दिए तुम्हें बुरा तो नहीं लगा। मैंने कहा- नहीं मां- बुरा क्यों लगेगा? सही तो बता रही थीं आप। वो बोलीं- बेटा, जिस घर में जा रही हो, वहां भी एक मां है। उन्होंने अपनी गृहस्थी को अपने हिसाब से सजाया-संवारा है, उनके घर की अपनी परंपराएं होंगी, अपने रीति-रिवाज़, अपने तरीक़े होंगे। वे तुम्हें बताएंगी, सिखाएंगी, अपनी पारंपरिक, पारिवरिक, सामाजिक और निजी धरोहर तुम्हें सौपना चाहेंगी। कहेंगी- बेटा- हमारे यहां भिंडी ऐसे नहीं, ऐसे बनती है। तुम मन में सोचोगी कि लंबी काटें या गोल, भिंडी तो भिंडी ही रहेगी। तुम्हारे मन में कई तर्क उठेंगे, कई सवाल उठेंगे। क्या मुझे बेवकूफ़ समझते हैं जो इतनी छोटी-छोटी बात बता रहे हैं। यह सब विचार आना स्वाभाविक है। पर अगर तुम खुले मन से उनकी मंशा को देखोगी, उत्सुकता और कौतूहल से उनके घर की परंपराओं को समझने और सीखने की कोशिश करोगी, तो तुम्हें आसानी होगी। जैसे मेरे निर्देशों के बीच तुम्हारे अपने अहं के विचार नहीं आए तो तुम्हें चाय बनाने में आसानी हुई, वैसे ही यह समझना कि उस घर में भी तुम्हारी एक मां है।

भावनाओं का खाता
अपने मायके से मिली इस सीख ने ससुराल के प्रति मेरा दृष्टिकोण बदल कर रख दिया। बाद में मनोविज्ञान पढ़ते हुए मुझे यही समझ आया कि सारा खेल हमारी सोच का ही तो है। जहां मां के सिखाने को हम ग्रहण करते हैं, वहीं सास की उसी बात की उपेक्षा कर देते हैं। वैसे तो हम सब यही सोचकर ससुराल आते हैं कि सास, मां की तरह ही होगी। पर सास-बहू के रिश्ते में आख़िर मां-बेटी के रिश्ते जैसी बात क्यों नहीं आ पाती। इस रिश्ते का एक मनोवैज्ञानिक गणित है। अगर हम उसको समझेंगे तो इस रिश्ते में मिठास घोल सकते हैं।

मां के साथ हमारा रिश्ता अनोखा और अनूठा है। मां ने हमें नौ महीने अपनी कोख में रखा। हमारे लिए उठीं, बैठीं, हमें सूखे में सुलाया, ख़ुद गीले में सोईं। बिल्कुल वैसे ही जैसे बैंक का खाता होता है। मां के साथ यह खाता खुला ही लाखों के बैंक बैलेंस के साथ क्योंकि वो इतनी भावात्मक पूंजी पहले ही हमारे खाते में निवेश कर चुकी थीं। ऐसे में बड़े होते समय अगर कभी मां ने तुम्हें कुछ कह भी दिया तो वह लाख रुपए में से 100 रुपए निकालने के बराबर हुआ। अब देखें कि सास के साथ यह भावनाओं का खाता कब खुला? साधारणतया जब हम अपनी होने वाली सांस से पहली बार मिले तब। उस वक़्त बैंक बैलेंस दोनों तरफ़ हो रहा था। अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम इस रिश्ते में कितना और कैसे निवेश करें।

मान लीजिए आप सास हैं, आपने पहली मुलाकात में ही होने वाली बहू के बारे में कुछ ऐसा कह दिया कि बेटा, तुम डार्क कलर पहना करो, ज़्यादा अच्छे लगेंगे तुम पर। इस तरह की बात से ज़ीरो बैलेंस वाला खाता पहले दिन ही नेगेटिव में चला गया। आप अगर बहू बन के घर में आने वाली हैं और आपने पहले ही अपनी शर्तें रखनी शुरू कर दीं, तभी से सास के साथ रिश्ता जो पहले ही ज़ीरो बैलेंस पर है, डगमगा जाएगा।

इसलिए ध्यान देने की बात है कि हम शुरुआत से किस तरह की बात एक-दूसरे से करते हैं। हमें पता है कि हर एक में अच्छाई होती है। तो क्या हमें अच्छाई पर ध्यान देकर उस पर टिप्पणी करने की ज़रूरत है, जिससे कि सकारात्मक भावनाओं का पूंजी निवेश हो सके? आपके बोल, हाव-भाव, आपकी एक-दूसरे के प्रति सोच, सब कुछ धीरे-धीरे इस निवेश का हिस्सा बनती चली जाएंगी।

कई बार हम अच्छी बात सोचते भी हैं, तो कहने में हिचकिचा जाते हैं। हम यह सोच बैठते हैं कि ज़्यादा तारीफ़ से कहीं बहू सर पर ना चढ़ जाए। इस तरह के बहुत सारे पूर्वग्रह हमारी मानसिकता को दूषित करते रहते हैं। समाज की कुरीतियों को हमें व्यक्तिगत रूप से ऊपर उठकर हराना होता है। और इसलिए क्या लाई आपकी बहू? का सरलता से मुस्कराते हुए जवाब दिया जा सकता है- ढेर सारी ख़ुशियां, हंसी, खिलखिलाहट, हमारा तो घर भर गया इसके आने से। इतना कहते ही आपने अपनी बहू के मन के खाते में ढेरों भावनाएं जमा कर दीं। इस बैंक बैलेंस को जब हम सचेत होकर संभालते रहेंगे तो धीरे-धीरे यह रिश्ता उस परिपक्वता तक पहुंच जाएगा, जहां अगर कभी कोई अरुचिकर बात कहनी भी पड़े तो उसकी कड़वाहट इतनी नहीं होगी। यह ज़िम्मेदारी दोनों तरफ़ बराबर की है। सामाजिक स्तर के सास-बहू के रिश्ते को लेकर सामाजिक स्तर के पूर्वग्रह शिक्षा के अभाव में ज़्यादा गहरे लगते हैं।

इतिहास गवाह है
सास-बहू का रिश्ता हमेशा से कटुता का बोध नहीं कराता था। झांसी के निकट 11वीं सदी के राजा महिपाल के शासनकाल में बना एक मंदिर है। राजा की पत्नी भगवान विष्णु की अनन्य भक्त थीं। उनकी इच्छा अनुसार राजा ने भव्य विष्णु मंदिर बनवाया। कुछ सालों बाद राजा के बेटे की शादी हुई। जो बहू आई वह शिवभक्त थी। राजा-रानी ने बहू की श्रद्धा का सम्मान करते हुए उसके लिए विष्णु मंदिर के पास ही शिव मंदिर बनवा दिया। हज़ार साल से भी ज़्यादा पुराने यह दोनों मंदिर आज भी सास-बहू मंदिर के नाम से जाने जाते हैं।
इस कहानी से सीखने लायक़ बहुत कुछ है। राजा-रानी चाहते तो बहू को यह भी कह सकते थे कि हमारे यहां विष्णु भगवान की पूजा होती है तो तुम्हें भी उनकी ही पूजा करनी होगी। पर उन्होंने बहू के स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकार और उसका सम्मान करते हुए मंदिर का निर्माण करवाया। हमारी परंपराएं और संस्कार अगर बहू के लिए अपनाना हमें अनिवार्य लगता है तो उसकी सोच, समझ, भावनाओं, शिक्षा का सम्मान करना भी उतना ही अनिवार्य है। जिन घरों में ऐसा किया जाता है वहां अपने आप ही संबंध मधुर होने लगते हैं। पर मुश्किल यह नहीं है कि हम अपनी बहू को स्वतंत्रता से चुनाव करने का अधिकार नहीं देना चाहते, मुश्किल यह है कि हम अपने बेटों को भी यह अधिकार देने में बहुत विलंब करते हैं।

बच्चे के साथ बढ़ना
जब एक छोटा बच्चा हमारी गोद में आता है। तो अपनी हर ज़रूरत के लिए हम पर निर्भर रहता है। मां को ही उसकी ज़रूरत समझकर उसे पूरा करना होता है। छह महीने का होते-होते बच्चा बैठने लगता है। एक साल का होकर डगमगाते हुए क़दम रखने लगता है। कुछ महीने में बोलने लगता है। तीन साल का होते-होते पसंद-नापसंद बताने लगता है। पर समस्या यह हो गई कि बच्चा तो बड़ा हो गया पर मां वहीं की वहीं रह गई। ममता से ओतप्रोत मां को यह समझ ही नहीं आ पाया कि बच्चे के साथ-साथ मुझे भी बड़ा होना था।
मां अपने बेटे को सदैव सुरक्षित रखने के भाव में उसे अपने आंचल में छुपाए रखना चाहती है। और कई बार इसी के चलते ख़ुद असुरक्षित महसूस करने लगती है। बेटे की शादी और बहू का घर में आना, असुरक्षा के भाव को चरम पर ले जाता है। इसके चलते सास अपनी बहू से प्रतिस्पर्धा करने लगती है। इससे वह बेटे-बहू के बीच अपनी जगह तलाशते-तलाशते कब उनके रिश्ते में दख़लंदाज़ी करने लगती है उसे ख़ुद ही पता नहीं चलता। इस तरह का व्यवहार बेटी की मां की तरफ़ से भी कई बार देखा जाता है। बेटी की मां भी इस चिंता से ग्रस्त होती है और उसके जीवन को कठिनाइयों से बचाने के भाव में कब उसके लिए ख़ुद ही परेशानी बन जाती है, उसे पता ही नहीं चल पाता। जब बेटा-बेटी बड़े हो जाएं तो उन्हें अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने दें। अपने चुनावों के साथ जुड़े जोखिम भी ख़ुद उठाने दें। याद रखें आप अपने बच्चों के अभिभावक हैं, उनके भाग्यविधाता नहीं। उनके जीवन में उतार-चढ़ाव आएंगे ही। आप अपनी परवरिश और अपने दिए संस्कारों पर विश्वास रखते हुए उन्हें अपना जीवन जीने की स्वतंत्रता प्रदान करें।

रिश्ते की मिठास
घर की ज़िम्मेदारियों को मिल-बांटकर ख़ुशी से एक टीम की तरह निभाने में ही घर का सुख निहित है। हर रिश्ते की तरह सास-बहू के बीच कई मुद्दों को लेकर मतभेद हो सकता है। मतभेद को मनभेद ना बनने दें। अक्सर बच्चों की परवरिश या खानपान को लेकर बहू के विचार आधुनिक होते हैं और सास के विचारों से मेल नहीं खाते। ऐसे में संवाद साध पाना इस समस्या को सुलझाने की कड़ी है। कई बार बहू सास से अपनी बात ना कह कर मन ही मन कुढ़ती रहती है या फिर अपने पति से शिकायत करती है। इससे बात सुलझती नहीं और बिगड़ती है। घर का माहौल तनावपूर्ण हो जाता है। सीधे-सरल शब्दों में अपनी बात रख पाना भी एक कला है, जिससे हम सीख सकते हैं। भावनात्मक जुड़ाव के लिए सास-बहू के रिश्ते को लेकर पूर्वग्रहों से बचें। एक-दूसरे को समझें। एक-दूसरे से सकारात्मक संवाद स्थापित करें और एक-दूसरे को सराहने का कोई मौक़ा ना जाने दें।
अपनी सास या बहू के साथ आप कैसा रिश्ता बनाना चाहती हैं, यह सिर्फ़ और सिर्फ़ आप पर निर्भर करता है। याद रखें चाय में जितनी चीनी घोलेंगे उतनी ही मीठी होगी। अपने स्वादानुसार रिश्ते की मिठास स्वयं तय करें।

( लेखिका जानी-मानी मनोवैज्ञानिक हैं। मनोविज्ञान में पीएचडी। अमेरिका स्थित अल्बर्ट एलिस इंस्टिट्यूट से प्रशिक्षित। फ़ीलिंग माइंड्स संस्था की निदेशक। सीबीएसई स्कूल प्राचार्यों की एक संस्था द्वारा लाइफ़ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित। वे टेड टॉक्स जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच से भी सम्बोधित कर चुकी हैं। )

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