युवा मंच:बेरोज़गारी को दूर करना है तो शिक्षा के साथ स्किल भी आवश्यक है

तेजस्वी मेहता16 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
  • युवाओं के मन में विचार तो होते हैं, लेकिन वो कहें किससे।
  • कहें तो ऐसे कैसे कहें कि सब सुनें। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए हमने अहा ज़िंदगी में यह नया स्तम्भ प्रारम्भ किया है, जिसमें युवाओं के विचारों को मंच दिया जाएगा। हमारे नौजवान पाठक इसमें प्रतिभागिता हेतु आमंत्रित हैं। फ़िलवक़्त, पहली कड़ी पढ़ें...

बेरोज़गारी लम्बे समय से ज्वलंत समस्या है। यदि युवा इस समस्या को दूर करना चाहते हैं तो उन्हें शिक्षा के साथ अभ्यास और अनुभव दोनों को साधना होगा। बेरोज़गारी का नाता सबसे अधिक युवाओं से ही है। यूं तो बेरोज़गारी की मार से कोई भी आयु वर्ग बच नहीं सकता, परंतु देश का युवा आज परिवार का वो बड़ा बच्चा है, जिससे बेरोज़गारी बुआ को कुछ अधिक स्नेह है। बेरोज़गारी को मिटाने का सबसे सशक्त हथियार है ‘शिक्षा’ और हमारे जीवन के लगभग 18 वर्ष शिक्षा के पाटन के तले ही बीतते हैं। इसके बावजूद हम शिक्षा और बेरोज़गारी के उस सम्बंध को समझने में कच्चे नींबू ही निकले। विद्यालय छोड़ने के बाद हमने वो सब किया, जो हमें बेरोज़गारी के शाप से मुक्त होने के लिए नहीं करना चाहिए था। हमें करना था सिर्फ़ एक काम। हमें शिक्षा का जामा पहन अभ्यास से सींचनी थी हमारे भविष्य की फ़सल, हमारे रोज़गार के ज़रिए। लेकिन हमने यह सब नहीं किया। उन दिनों हमें कॉलेज की चकाचौंध आकर्षित कर रही थी। नए-नए अजनबी चेहरों से मिलना, कैंटीन जाना, कॉफ़ी पीना, हंसी-मज़ाक़ करना... कक्षा में बोरिंग-से सिलेबस को रटने के बाद बचता ही क्या था! स्कूल से निकलकर कॉलेज छोड़ने तक के जो तीन-चार साल होते हैं, ये हमारे जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण होते हैं। लेकिन दुनिया इनके बारे में यही जानती है कि इन सालों में कुछ नहीं होना है। जबकि हमारा मन प्रतिक्षण यह जान रहा होता है कि यह वर्ष और हम मिलकर भविष्य की लकीर खींचेंगे। रोज़गार के इतने क़रीब आकर शिक्षा से मुंह मोड़ लेने का विचार भविष्य की नींव को खोखला करने लगता है। इसमें बहुत हद तक दोष हमारी शिक्षा प्रणाली का भी है, जो कि विद्यार्थियों को स्किल डेवलपमेंट का मौक़ा देने के बजाय रट्‌टन विद्या पर अधिक विश्वास करने के लिए प्रोत्साहित करती है। कोई भी अभियंता सिर्फ़ किताबें पढ़कर सफल नहीं हो सकता, उसकी सच्ची परीक्षा तो फ़ील्ड में ही होगी और ऐसे समय में स्किल के सिवा कुछ काम नहीं आएगा। विश्वविद्यालय की सेमेस्टर परीक्षा में ज़रूर रट्‌टन विद्या आपको पार लगा सकती है, लेकिन रोज़गार दिलाने के लिए तो यह पर्याप्त नहीं है। इसके अलावा भी हमारे आसपास का माहौल कई बार हमसे सरल से सरल तरीक़े से काम बनाने की बात कहता है, जिसके प्रभावस्वरूप हम आलस्य से मित्रता कर लेते हैं। लालसा कुछ इस क़दर बढ़ जाती है कि हमें लगने लगता है कि बस जल्द ही ये कॉलेज ख़त्म हो और कोई घर पर आकर हमें बड़ी-सी नौकरी दे जाए, लेकिन यह तो वह ख़्वाब है जो पलक झपकते ही टूट जाता है। यदि वाक़ई में कुछ पाना है तो हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि शिक्षा, अभ्यास और अनुभव, ये तीन सोपान वि‌श्वविद्यालय के तीन सालों में साध लिए जाएं तो भविष्य का भय मिट जाता है। इसके बाद युवा अपनी इच्छा-अनुरूप काम का चयन करने की स्थिति में होता है और बड़े-से संसार में एक छोटी-सी जीत से कई घर गुलज़ार हो जाते हैं।

खबरें और भी हैं...