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जीवन सूत्र:जीवन में आगे बढ़ना है तो 'आज' से ही बनेगा काज

विवेक गुप्ता3 महीने पहले
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  • क़िस्मत थाल में सजाकर कुछ नहीं देती, किंतु यदि कभीं दे भी, तो इतना तय है कि टालमटोली करने वाले उसे भी व्यर्थ हो जाने देंगे।
  • जीवन में सुख, संतुष्टि, सुकून और समृद्धि की सबसे बड़ी दुश्मन कोई चीज़ है, तो कामों को टालने की यह आदत ही है।
  • इसे त्यागे बग़ैर श्री और समृद्धि की प्राप्ति नहीं हो सकती।

उस राजा की कहानी याद कीजिए, जो तमाम सुख-साधन होते हुए भी जीवन का आनंद नहीं ले पाता, क्योंकि उसके सिर पर हमेशा तलवार लटकती रहती है।

टालमटोली करने वाले भी उसी राजा की तरह होते हैं। किसी काम को टाल तो देते हैं, परंतु वह काम कहीं जाता नहीं है, बल्कि अधूरी ज़िम्मेदारी और अपराधबोध के मिले-जुले एहसासों के साथ उन्हें दुगना सताता रहता है।

इस बीच लाख गाने सुन लिए जाएं, हास्य वीडियो देख लिए जाएं, खा-पी लिया जाए या सो ही लिया जाए, परंतु निश्चिंतता वाला आनंद नहीं मिल पाता। काम का तनाव सिर पर सवार रहता ही है।

बाद में, धीरे-धीरे करके और भी काम इकट्‌ठा हो जाते हैं और एक दिन दबाव असहनीय हो जाता है।

तब आती है काम शुरू होने की घड़ी। नहाना, खाना और सोना छोड़कर व्यक्ति काम में जुट जाता है और अंतत: काम हो ही जाता है। अहा! कितनी राहत मिलती है।

राहत ही असली दुश्मन है
टालमटोली करने वाले मन को लगता है कि अंतत: काम जैसे-तैसे हो ही गया, तो आगे भी हो ही जाएगा। लेकिन यह सब गणित लगाते हुए वह ज़िंदगी के असली घाटे को भूल जाता है, जो करियर, सम्बंधों की बर्बादी और छवि पर लगे बट्‌टे के रूप हो चुका होता है।

इस तरह काम हो जाने का सबसे बड़ा नुक़सान है कि आदमी हमेशा औसत ज़िंदगी, औसत उपलब्धि और सामान्य से कम संतुष्टि में जीता रहता है। वह किसी तरह रूटीन के कामों को निबटाने से आगे सोच ही नहीं पाता।

कभी थोड़ा अवकाश मिलने पर उसे याद आता है कि किसी ज़माने में उसकी कोई महत्वाकांक्षा भी हुआ करती थी, उसकी आंखों में कुछ बड़ा करने का सपना पलता था, और फिर वह बस एक ठंडी आह भरकर रह जाता है।

अपने बचपन को याद कीजिए।

बचपन में लगभग हर कोई यही कहता है- ‘मैं बड़ा आदमी बनूंगा।’ जब आप छोटे थे, तो बड़ा आदमी बनने की बात कहते थे और अब भी वही कहते हैं। शायद शब्द थोड़े-बहुत बदल गए हों। शायद अब आप यह बात किसी के सामने कहने से झिझकते हों और दिल ही दिल में दुहराते हों। कब तक बस कहते ही रहेंगे?

आप कोई भी हों, किसी भी पद पर काम कर रहे हों, क्लर्क हों, शिक्षक हों, फ़ोटोग्राफर हों, कलाकार हों, पत्रकार हों या बेरोज़गार भी हों, लेकिन आपके दिल में एक बड़ा सपना ज़रूर होगा। आप ऐसा आदमी बनने के बारे में अवश्य सोचते होंगे, जो औरों से अलग हो। कब तक सोचते ही रहेंगे?

आप बनेंगे, ज़रूर बनेंगे, लेकिन… यह बहुत बड़ा ‘लेकिन’ है। आप बड़े आदमी ज़रूर बनेंगे, अपने सपने को अवश्य पूरा कर पाएंगे, लेकिन अगर आप वर्तमान ढर्रे पर चलते रहे, जैसा अभी कर रहे हैं वैसा ही करते रहे, तो ज़िंदगीभर सिर्फ़ सोचते ही रह जाएंगे।

यह चेतावनी है। यह चेतने का समय है।

ख़ुद सोचिए, आप 30, 35, 38 या 40 बरस के हो चुके हैं। जीवन के सबसे ज़्यादा प्रोडक्टिव और ऊर्जा से भरे वर्ष धड़ाधड़ निकलते जा रहे हैं। फिर अभी नहीं तो कब? अपने सपने को आप पूरा नहीं करेंगे, तो कौन करेगा? अपने लिए आप मेहनत नहीं करेंगे, तो कौन करेगा?

बड़ा आदमी बनने की बात हो या किसी क्षेत्र में शिखर पर पहुंचने की- अब इसे महज़ दबी-छुपी इच्छा मत बनाए रखिए। इसे लक्ष्य बनाइए। इच्छा यानी कोरी कल्पना। लक्ष्य यानी पक्का इरादा + योजना + कर्म। इरादा तो अब भी है, तभी तो आप अपने सपने को भूले नहीं हैं।

बीते बरसों में आपने तमाम योजनाएं भी बना ही ली होंगी। अब बारी है कर्म की।

कल पर गया जो टल

यदि योजना नहीं है, तो भी सिर्फ़ योजना न बनाते रह जाइए। ख़ुद को हमेशा की तरह भरमाइए मत। बस, काम शुरू कर दीजिए। जैसी भी तैयारी हो, जितना भी काम आता हो, जितना भी समय हो, आड़ा-तिरछा जैसा भी हो, काम का श्रीगणेश कर दीजिए।

अगर आप टालमटोली छोड़ना चाहते हैं, तो साफ़ है कि यह आपकी बहुत पुरानी बीमारी है और आप इससे त्रस्त हो चुके हैं।

शुरुआत में किसी को भी टालमटोली से मुक्त होने का ख़्याल नहीं आता। शुरू-शुरू में इसका ज़ोर कम रहता है, गिने-चुने कामों में टालमटोली होती है, इसलिए जीवन की गाड़ी चलती रहती है। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ

ज़िम्मेदारियों का दायरा बढ़ता जाता है और टालमटोली के क्षेत्रों का विस्तार होता है। और फिर परिस्थितियां असहनीय होने लगती हैं।

इसलिए काम करना शुरू कर दीजिए।

जहां से, जो काम पकड़ सकते हैं, वह कीजिए। यही एकमात्र इलाज है। काम वास्तव में करने के सिवाय, दुनिया की कोई भी महान तकनीक कारगर नहीं होगी। काम शुरू करेंगे, तब ही बरसों की ज़ंग झड़ना शुरू होगी।

जाम हो चुके पहिए घिसटना शुरू होंगे। आप तैयारी के लिए रुके रहेंगे, तो वह भी टालमटोली का एक रूप ही होगा। इसलिए कार्य आरम्भ करें और गाड़ी चलने दें। किसी भी बहाने से रुके, तो गाड़ी फिर अनिश्चित काल के लिए थम जाएगी।

आज इतवार है, आज मूड नहीं है, आज दूसरे काम भी हैं- ये सब ‘कल से करूंगा’ के ही भिन्न-भिन्न संस्करण हैं।

आप जानते हैं कि कल कभी नहीं आता। कल से शुरू करने के बारे में सोचना ख़ुद को धोखा देना है, जो आप अब तक देते ही आए हैं। इसी से तो बचना है।

टालमटोली से बचेंगे, तब ही तो जानेंगे कि जीवन का वास्तविक आनंद क्या है, अन्यथा आनंद की मिठास में भी तनाव की कड़वाहट घुली रहेगी और ज़िंदगी तमाम आरामतलबी के बावजूद बेमज़ा ही रहेगी।

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