जीवन-धुन:प्रेरणा कहीं बाहर नहीं होती, यह आपके भीतर ही मौजूद होती है, बस आपके पुकारने की देर भर है

}पूर्ति वैभव खरे6 दिन पहले
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  • प्रत्येक प्रेरणा आपके भीतर है। आप उसे एक बार आवाज़ तो दें और उस आवाज़ को सुनें, फिर देखें। संसार की सभी प्रेरणाएं आपको कम लगेंगी, स्वयं की प्रेरणा के समक्ष।

ऐसा कौन-सा व्यक्ति है, जो जीवन में निराश होना चाहता होगा? शायद कोई नहीं।

निराशा, उदासी, मायूसी या हार किसी को रास नहीं आतीं, फिर भी ये जीवन में मिलती अवश्य हैं, इनके बिना जीवन कहां चलता है? ऐसा कोई न होगा, जो कभी पराजय की गली से न गुज़रा हो।

हार-जीत हर किसी के जीवन में घटित होने वाली घटनाएं हैं। ये अलग बात है कि इन्हें स्वीकारने और धारण करने की क्षमता, मनःस्थिति सबकी भिन्न है। कोई पराजय को नया अवसर समझता है तो कोई जीवन का अंत, कोई तुरंत इसे स्वीकार कर आगे बढ़ता है तो कोई वहीं ठहरकर इसका शोक मानता रहता है। जब हम उदास होते हैं, तब हमें किसी के सहारे की आवश्यकता पड़ती है, पर ये सदैव संभव नहीं। क्योंकि कभी तो कोई ऐसा मिल जाता है जो हमारी मनःस्थिति को समझ हमारी उदासी बांट लेता है और कभी कोई नहीं भी मिलता। तब हम गीत-कविताओं का सहारा लेते हैं और अक्सर वो हमें संबल भी देते हैं। हम जब भी हताश होते तो वह खोजने लगते हैं, जो हमें परिस्थितियों से लड़ने की प्रेरणा दे।

हम यहां-वहां से प्रेरणाएं लेते हैं। हम अक्सर निकल पड़ते हैं ऐसे शख़्स की तलाश में जो हममें ऊर्जा का संचार कर दे। ऐसी स्थिति में हमें जो मिलता है, जैसा मिलता है, उसकी प्रेरणा को पकड़ हम चल देते हैं। ऐसी परिस्थिति में आप किसी से भी प्रेरित हो सकते हैं। ये आप पर निर्भर है। पर आप ख़ुद से ही प्रेरित हों, ये केवल आप पर ही निर्भर है।

ऐसा माना जाता है कि प्रत्येक व्यक्ति में दो प्रकार के प्रेरक विद्यमान हैं- जन्मजात और अर्जित। भूख, प्यास, नींद, यौनेच्छा, मल-मूत्र त्याग- ये पांच जन्मजात प्रेरक हैं, जो हर व्यक्ति में जन्म से होते हैं। बाक़ी अन्य प्रेरकों को हमारे मनीषी-मनोवैज्ञनिकों ने अर्जित प्रेरकों की संज्ञा दी है, जैसे-उत्साह, क्रोध आदि। इन्हें व्यक्ति समाज से अर्जित करता है, हर व्यक्ति अपनी रुचि के अनुरूप इन्हें ग्रहण करता है।

जो भी हो, मेरा मानना है कि सारे प्रेरक व्यक्ति के भीतर ही हैं। परंतु सुप्तावस्था में हैं। क्योंकि हम उन्हें जन्मजात प्रेरकों की भांति जगाते ही नहीं, हम दूसरों से प्रेरित होने के लिए इतने उतावले होते हैं कि अपनी स्वयं की प्रेरणा को नज़रअंदाज़ करते रहते हैं।

स्मरण रहे, जितनी स्थायी और प्रबल आपकी स्वयं की प्रेरणा होगी, उतनी ही अस्थायी और कमज़ोर बाह्य प्रेरणा होगी। आप सब से सलाह-मशविरा लें और निःसंकोच दूसरे से प्रेरित भी हों, परंतु अपनी स्वयं की प्रेरणा की उपेक्षा करके नहीं।

आपकी प्रेरणा आपको तब तक प्रेरित करेगी, जब तक आप अपना लक्ष्य नहीं पा लेते क्योंकि वो सैदव आपके साथ रहेगी। आप कितने भी भाषण सुन लें, प्रेरणादायक गीत, कविताएं पढ़ लें या अन्य माध्यमों से वीडियो, फ़िल्में आदि देख लें- ये सब आपको कुछ समय तक तो याद रहेगा, परंतु बहुत देर तक नहीं। आपको स्वयं को प्रेरित करने के लिए ख़ुद की प्रेरणा से मिलना ही होगा। आपकी भीतर की प्रेरणा यदि जाग गई तो आपका भाग्य जगना भी तय है।

तो अपने कानों पर हाथ रख भीतर की आवाज़ सुनें और कहीं और प्रेरणा खोजने से बेहतर अपने अंतस की प्रेरणा को आत्मसात करें।

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