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  • It Is Almost Impossible To Find A Person In The World Who Has Not Been Bitten By Mosquitoes, A Satire On The Glory Of These Mosquitoes

वक्रोक्ति:दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति ढूंढना लगभग असम्भव है जिसका मच्छरों से पाला न पड़ा हो, इन्हीं मच्छरों की महिमा पर एक व्यंग्य

प्रभाशंकर उपाध्याय4 महीने पहले
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  • मच्छर एक ऐसा जीव है, जिसने विश्वविजेता सिकंदर तक को नहीं बख़्शा तो आप और हम किस खेत की मूली हैं! जब तक मनुष्य की देह में रक्त प्रवाहमान है, मच्छरों का दस्तरख़्वान त्वचा पर सजता रहेगा। लिहाजा, मच्छरों की इसी महिमा पर प्रभाशंकर उपाध्याय की एक वक्रोक्ति पेश है...

‘आवारा मसीहा’ के नायक शरतचंद्र चट्टोपाध्यायजी के घर आकर डाकिया बोला, ‘साहब, श्रीमच्छरचंद के नाम से यह चिट्ठी आई है। मैंने पूरा बंगाली टोला छान मारा मगर इस नाम का कोई आदमी नहीं मिला।' शरतजी बोले, ‘भाई, यह तो मेरी ही चिट्ठी है। इसे मेरे मामा ने भेजा है। उन्हें शब्दों को संधि करके लिखने की आदत है। अतः उन्होंने श्रीमत् शरदचंद्र को श्रीमच्छरचंद लिख दिया है।’ तो देखी आपने इस नन्हे शैतान जीव की कारगुज़ारी। यह शरतजी के नाम में भी जा घुसा। दरहक़ीक़त, मच्छर उस शैतान का नाम है जो हर कहीं जा घुसता है। गर, मच्छरदानी में घुस जाए और पकड़ में न आए तो रात को घुसा सींकिया-सा मच्छर सुबह तोंद फुलाए मोटा-ताज़ा नज़र आता है। हम उसे देखते ही ताली-पीटा बन जाते हैं कि ठहर नासपीटे, तूने मेरा ख़ून पिया है, मैं तेरा ख़ून पी जाऊंगा। मच्छर का ख़ून पीने की बात तो छोड़िए जनाब! यदि यह आपकी ताली की चपेट में आकर मर भी गया तो आपके ही रक्त से आपकी हथेली लाल कर देगा।

इतिहास गवाह है कि मच्छर वह नाचीज़ है, जिसने विश्वविजेता सिकंदर को पछाड़ा, चंगेज़ ख़ां के मंसूबों को ध्वस्त किया। उसने इंग्लैंड के एक तानाशाह ऑलिवर क्रॉमवेल की तानाशाही के धुर्रे उड़ा दिए थे। एक बार इनकी सेना ने रोम की सेना को खदेड़ दिया था। इन बहादुरों ने स्पेन की सेना को इतना कमज़ोर कर दिया था कि वह अपने दुश्मनों से चुटकियों में हार गई थी। तुर्रा यह कि जिनसे दुनिया कांपी, उनको इस मच्छर की तुनतुनाहट से कंपकंपी छूट गई। चुनांचे, विजयी लोगों को पराभूत करने वाला अदना-सा मच्छर कोई जांबाज़ नर नहीं, वरन एक मादा है। बेचारे नर तो फूलों का ज्यूस पीते हैं।

भई, जब उनकी घरवालियों में ही इतना दम-ख़म है तो वे व्यर्थ ही क्यों ज़ोर- आज़माइश करें? वह यह भी चाहती है कि जब आपको काटे और आपका ख़ून पीने में मशगूल हो तो आप हिलें-डुलें नहीं। आप ज़रा भी कसमसाए तो इस महारानी का पारा गर्म हो जाता है और यह भन्नाकर मानव त्वचा पर टूट पड़ती है। आपके शरीर पर बने अनेकानेक लाल-लाल चकत्ते इस बात का प्रतीक हैं कि आपके गाढ़े ख़ून ने किसी मादा मच्छर के भरपूर पोषण का इंतज़ाम कर दिया है और अब वह चैन से अंडे देगी तथा इंसान का ख़ून चूसने वाली असंख्य औलादों को जन्म देगी।

मैं, इस महारानी को दस्यु सुंदरी की तर्ज़ पर डेंगू सुंदरी का नाम दूंगा। यह अपने हल्के आबनूसी वर्ण पर सिल्वर-वाइट कलर की मोहक धारियों समेत पारदर्शी पंखों से युक्त होकर, सुमधुर संगीत सुनाती हुई हौले-से आपके शरीर पर उतरती है तो किसी परी से कम प्रतीत नहीं होती और आपके थोड़े-से रक्तदान के एवज़ में मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया, मंकीगुनिया, फ़ाइलेरिया, गुलनबैरी, इंसेफ़ेलाइटिस, वेस्टनाइल, ज़ीका और कालाअज़ार आदि रोग प्रदान करती है। वैसे, इससे अधिक लहू तो इंसान का इंसान ही पी जाता है।

चुनांचे, मच्छरों की वजह से आम आदमी के साथ शोधकर्ता और वैज्ञानिकगण भी परेशान हैं। पहले मच्छर आठ फ़ीट से अधिक ऊंचाई नहीं छू पाता था। लिहाज़ा आप अपने घरों की छत पर चैन से सोते थे। अब यह कमबख़्त चौथे माले तक शान से फ़्लाइट मार जाता है। पहले यह गंदे पानी में पनपता था, फिर इसने साफ़ पानी में अड्डा जमाया। पहले इस पर डीडीटी बेहद असरदार था। अब बेअसर सिद्ध हो रहा है। मच्छरों से बचने की क्रीम लगाने के बावजूद यह सींक-सा पहलवान मानवी-त्वचा पर शान से विराजित हो काट लेता है। मच्छरों को पकड़ने वाले इलेक्ट्रॉनिक-यंत्रों में आम तौर पर मासूम कीट-पतंगे तो फंस जाते हैं और यह मुआ तुनतुनाता हुआ उड़ जाता है। जैसा कि दंगे-फ़सादों के वक़्त होता है कि अमूमन निर्दोष लोग फंस जाते हैं और शातिर हवा हो लेते हैं। और तो और, मच्छरों पर आधारित मलेरिया के परजीवी ने भी नाक में दम किया हुआ है। इसने ऐसी जेनेटिक तब्दीली की है कि कुनैन तक बेअसर सिद्ध हो रही है। आख़िर मच्छरी संगत का कुछ तो असर इस परजीवी पर होना है।

उधर परेशां-हाल वैज्ञानिक मच्छरों की आबादी को कंट्रोल करने का उपाय ढूंढ रहे हैं और यह मुआ उन्हें छकाकर पूतों फल रहा है। वैज्ञानिकों ने पहले मच्छरों के लार्वा को हज़म कर जाने वाली मछलियां ढूंढीं, लेकिन मच्छरों की तादाद बढ़ती ही चली गई। एक तरफ़ शोधकर्ता कहते हैं कि पसीना नहीं आने दें, क्योंकि पसीने की गंध के तो मच्छर बड़े दीवाने हैं। दूसरी ओर ग्लोबल-वार्मिंग बढ़ रही है। पसीना सूखने का नाम ही नहीं लेता। अभी वैज्ञानिकों ने खोजा है कि हल्के रंग के वस्त्रों से मच्छर कम आकर्षित होते हैं। अतः गहरे रंग के वस्त्र क़तई नहीं पहनें। लो, ज़रा पूछो इनसे कि सब लोगों की पसंद तो हल्के रंग के वस्त्र होने से रहे। आख़िर वस्त्रों की इतनी वैरायटी किसलिए है? वैज्ञानिक कहते हैं कि पानी को कहीं ठहरने नहीं दें। पानी की टंकियों को खुला न छोड़ें। चलिए, घरेलू टंकियां तो लोग ढक लेंगे लेकिन रास्तों के गड्‌ढों या नालियों का क्या होगा? सड़कों की मरम्मत तो होती नहीं और नालियों में सार्वजनिक पदार्थों का जाम लगा रहता है। केरोसिन सहज उपलब्ध नहीं होता। लिहाज़ा भूखा-नंगा इंसान क्या धोए और क्या निचोड़े? चलते-चलते हितोपदेश में वर्णित मच्छर की महिमा के गुणगान को भी पढ़ लेते हैं- ‘प्राक पादयोः पतित खादति पृष्ठमांसं, कर्णे कलं किमपि रौति शनैर्विचित्रम्। छिद्रं निरूप्य सहसा प्रविशत्यशड्कः, सर्व खलस्य चरितं मशकः करोति।। (श्लोक सं. 128) अर्थात- पहले पैरों पर गिरता है, पीछे पीठ पर मांस खाता है। कान में कुछ अव्यक्त, विचित्र और सुंदर शब्दों को धीरे-से कहता है। छेद देखकर बिना किसी डर के शीघ्र प्रवेश कर जाता है। मच्छर का यह स्वभाव दुर्जन चरित वालों का भी होता है। शिक्षा- दुष्ट व्यक्ति का स्वभाव कोयले की भांति होता है। कोयला चाहे शीतल हो या दीप्त, दोनों दशाओं में अच्छा नहीं होता। गर्म से हाथ जलते हैं और ठंडे से काले होते हैं।

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