पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

Install App

Ads से है परेशान? बिना Ads खबरों के लिए इनस्टॉल करें दैनिक भास्कर ऐप

लोकनाट्य:'टोटल थिएटर' की कल्पना का साकार रूप है काशी की रामलीला, हज़ारों की संख्या में इसे देखने पहुंचते हैं लोग

अशोक खन्ना11 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
  • यों तो यह जगत ही रंगमंच है। काशी के अधिष्ठाता नटराज उसके जनक हैं। अपनी अनोखी अदा में डूबा यह शहर स्वयं एक अनवरत नाटक है।
  • काशी में संगीत, नृत्य, नाटक की प्रस्तुति शिव-पार्वती के समक्ष करने को देवता, यक्ष, गंधर्व लालायित रहते हैं, तब मनुष्य पीछे कैसे रह सकते हैं! प्राचीन ग्रंथों में लीलाओं के उल्लेख भरे पड़े हैं तो नटराज की नगरी नटविहीन कैसे रह सकती है!
  • नाट्यशास्त्र में शास्त्रीय रीति से नाटकों के मंचन का उल्लेख मिलता है। नाट्य विधा के महान पुरोधा कालिदास तो शिव के अनन्य भक्त ही थे!
  • रामनवमी के अवसर पर यह लेख काशीनगरी कीनाट्य-संस्कृति पर।

हरेक कालखण्ड में नाट्य विधा के अलग-अलग आयाम दर्शनीय हैं। किंतु 3 अप्रैल, 1868 को पण्डित शीतला प्रसाद त्रिपाठी विरचित नाटक ‘जानकी मंगल’ का मंचन किया गया था, जिसमें 18 वर्षीय युवक भारतेंदु हरिश्चंद्र ने ‘लक्ष्मण’ की भूमिका का निर्वाह किया। इस तिथि को ‘हिंदी रंगमंच का स्थापना दिवस’ माना गया है। हालांकि भारतेंदुजी के पिता गिरधरदास ने 1857 में विशुद्ध रीति से हिंदी का प्रथम नाटक ‘नहुष’ लिखा था, यह भारतेंदुजी ने ही उल्लेख किया है। भारतेंदुजी को नाटक विधा घुट्टी में पिलाई गई थी, यह कहना अतिशयोक्ति न होगी। अपनी भाषा, संस्कृति, विरासत का गर्व क्रिया रूप में भी ढालने वाले भारतेंदु को तत्कालीन काशी नरेश ने रामलीला मंचन को संवारने का दायित्व सौंपा था। रामनगर की रामलीला परंपरा को सांस्कृतिक विरासत का सम्पुट देकर उन्होंने लीला की नाट्य विधा में भी अपना अप्रतिम योगदान किया है।

नेपाल के भाट गांव में सन् 1833 में ‘विद्या विलाप’ का मंचन हुआ। 1850-60 की अवधि में लखनऊ में ‘इंदर सभा’ और वाजिदअली शाह के ‘क़िस्सा राधा कन्हैया’ का मंचन हुआ। झांसी में राजा गंगाधर राव भी नाटक मंचन किया करते थे, ऐसा उल्लेख मिलता है। सूर्य के चारों ओर घूम रही धरती पर सूर्योदय कब और कहां हुआ, यह निर्धारित करना तो संभव ही नहीं। अत: तिथि विवाद का विषय भले ही हो, किंतु हिंदी नाट्य विधा के आरम्भ होने की तिथि जन मान्यताओं की विचार यात्रा में नि:संदेह एक मील का पत्थर तो है ही, यह निर्विवाद तथ्य है! हरेक कालखण्ड में देश-काल-परिस्थितियों की अभिव्यक्ति की अपनी शैली रही है किंतु सोलहवीं शताब्दी में तुलसीदास और मेघा भगत ने जिस नाट्य लीला विधा को समाज को समर्पित किया, वह 500 वर्षों से समय के झंझावातों का सामना करते हुए अपने मूल स्वरूप में आज भी जारी एक अनवरत वार्षिक आयोजन है, यह अध्ययन, दर्शन और संरक्षण का विषय है।

गोस्वामीजी की प्रतिभा
तुलसीदास ने अपनी ज्ञान-भक्ति पिपासा को शांत करने के प्रयास में भारतवर्ष की तीर्थयात्रा करते हुए सावधान गुणग्राही का दायित्व निर्वहन किया और प्रत्येक क्षेत्र की हरेक विशेषता को रामलीला मंचन में समाहित किया।

रामचरितमानस का अध्ययन करने से स्पष्ट होता है कि तुलसीदास न केवल भक्त-कवि थे, वरन नाट्य विधा के आचार्य भी थे। उन्होंने मुखौटे, वस्त्र-शृंगार, संवाद प्रस्तुति की शैली लेने में उदहारणस्वरूप दक्षिण भारत के शुचींद्रम मंदिर से हनुमान का मुखौटा, कुदियत्तम नाट्य से संवाद प्रस्तुति, मथुरा-वृंदावन-द्वारका के मंदिरों से पात्रों का शृंगार आदि शैलियों का रामलीला में प्रयोग किया।
रामचरितमानस सदृश अनवरत जनमानस को आंदोलित करने वाली रचनाओं के साथ-साथ कालांतर में उन्होंने काशी में रामलीला, कृष्णलीला, ध्रुवलीला, वामनलीला, नृसिंह लीला, फागलीला का आरम्भ कर के विश्व को एक अनूठा नाट्य मंच दिया है। यह मात्र लोकरंजन नहीं वरन सामजिक चेतना को आंदोलित करने के साथ-साथ विश्व पटल पर भारतीय जीवन-दर्शन और जीवन-मूल्यों की सहज स्थापना करने की अनूठी संजीवनी भी साबित हुआ है। तुलसीदास ‘नाट्य शास्त्र’ की सूक्ष्मता से कितना परिचित थे, यह उनकी लेखनी के एक उदाहरण मात्र से स्वत: स्पष्ट हो जाता है-
जथा अनेक वेष धरि नृत्य करई नट कोई।
सोइ-सोइ भाव देखावइ आपु होइ न सोई।

​​​तुलसीदास हनुमान्नाटक का भी उल्लेख करते हैं। उपलब्ध प्रमाणों के अनुसार रामचरितमानस की रचना (संवत् 1631) से पूर्व संवत् 1600 में श्री नारायण दास उर्फ़ मेघा भगत ने वाल्मीकि रामायण के आधार पर काशी के नाती इमली में रामलीला आयोजित की, जो अनवरत अपनी परम्परागत शैली को अक्षुण्ण बनाए हुए आज भी प्रतिवर्ष निश्चित अवधि में आयोजित हो रही है!

लीला का पारस-स्पर्श
रामलीला का मंचन केवल लोकरंजन के लिए नहीं होता है; यह पढ़ी, सुनी, देखी भी जाती है और नाटक की एक अनूठी विधा होते हुए भी अगणित दर्शकों की चिंतन और जीवनशैली में सकारात्मक परिवर्तन लाने की अनूठी मिसाल पैदा करती रही है। दूर क्यों जाऊं? मैंने स्वयं 1976 में रामलीला के पारस का स्पर्श अपने गुरु डॉ. भानुशंकर मेहता की अनुकम्पा से पाया और मेरे जैसा जड़ 44-45 वर्षों के बाद आज भी चिंतन-मनन-जीवनशैली के धरातल पर जीवंतता का अनुभव अपने जीवन उत्तरार्ध में करता है, इससे बड़ा प्रमाण और क्या मानूं?

मुझे याद आ रहा है, एक दिन बिना पूर्व सूचना के डाॅ. मेहता मेरे घर पधारे। उनका व्यक्तित्व कितना विशाल था कि काशी नरेश उन्हें काशी का एनसाइक्लोपीडिया कहते थे और संगीत व नाटक जगत में उनका विशेष सम्मान था। मेरे लिए बड़े गर्व की बात थी- मुझ अकिंचन के घर उनका पधारना! किंतु कितनी सहजता से उन्होंने रामलीला और उसकी मंच व्यवस्था यानी तुलसी मंच की बारीकियां मेरे हृदय में उतार दीं कि रामलीला पर अपनी क़लम और कैमरे को साधन बनाकर इस अनूठी विरासत को सहेजने, समझने और अपने जीवन में उतारने में जुट गया।

45 वर्षों की अतीत-गलियों में झांकता हूं तो पाता हूं, मेरा जीवन ही धन्य हो गया। राम-रस के एक ऊर्जास्रोत ने मेरे कैमरे और मेरी क़लम को ही नहीं, मेरे चिंतन की आधारशिला को ही मानो संजीवनी पिलाकर एक अनूठे रंग में रंग दिया।

तुलसी मंच का अभिनव विचार
तुलसी मंच की अवधारणा डॉ. मेहता की अनूठी परिकल्पना है, जिसे उन्होंने गहरे अध्ययन के बाद प्रस्तुत किया था और कला-जगत ने इसे उन्मुक्त कंठ से सराहा। उनका विश्वास था कि यदि कोई ‘समग्र मंच’ यानी ‘टोटल थिएटर’ की कल्पना साकार रूप में देखना चाहे तो उसे ‘काशी की रामलीला’ देखनी चाहिए! काशी में मंचस्थ होने वाली अनेक रामलीलाओं में जहां तुलसी मंच का पूर्ण प्रयोग-दर्शन हो सकता है, वे हैं- नाटी इमली, अस्सीघाट, शिवपुर और रामनगर की रामलीला। रंगकर्म की दृष्टि से ‘तुलसी मंच’ रंगमंच की भारतीय मूल अवधारणा लिए अद्‌भुत स्वरूप वाला मौलिक मंच है।

तुलसी मंच को समझने के लिए कल्पना कीजिए- एक आयताकार रामलीला मैदान, जिसके निकट एक सरोवर, या जलाशय या कोई नदी हो। इसमें उत्तर की ओर एक ऊंचा मंच (सात सीढ़ियों का) और उस पर एक भव्य सिंहासन, जिस पर दिव्य स्वरूप- राम, लक्ष्मण, जानकी और उनके गुरु विश्वामित्र विराज सकें। यह है ‘विष्णु मंच’। यह सभी रामलीलाओं में होता है और इस पर प्रमुख पात्र, जिन्हें ‘स्वरूप’ कहा जाता है, विराजते हैं। मैदान के दूसरे छोर पर पांच सीढ़ियों वाला ऊंचा मंच, जिस पर सिंहासन में राजपुरुष, यथा- दशरथ, जनक, बाली, सुग्रीव, रावण आदि पात्र दृश्य के अनुरूप विराजते हैं। इसे ‘राज मंच’ का नाम दिया गया है। इन दोनों मंचों को जोड़ता लगभग दो मीटर चौड़ा गलियारा, जिसे ‘जीवन पथ’ कहा जा सकता है। इस पर पात्रों का आवागमन, कथानक दृश्य के अनुरूप संवाद या एक्शन-मूवमेंट प्रदर्शित होता है।

पूर्व की ओर एक मंच (दो सोपान ऊंचा), जिस पर लीला के स्त्री पात्र- दशरथ के अंत:पुर, जनक के रनिवास, कोप भवन, अशोक वाटिका में सीता आदि दृश्यों की प्रस्तुति करते हैं। इसे आप ‘देवी मंच’ कह सकते हैं। पश्चिम की ओर एक सोपान ऊंचा मंच, जिस पर रामायणी दल बैठकर रामायण पाठ करते हैं- इसे आप ‘जन-मंच’ की संज्ञा दे सकते हैं। आवश्यकतानुसार इन मंचों को ‘जीवन पथ’ से जोड़ा जा सकता है। जीवन पथ के दोनों ओर दर्शक बैठते हैं, बिना किसी ‘सिटिंग व्यवस्था’ या किसी विशेष सुविधा की परवाह किए।

धनुष यज्ञ की लीला प्रस्तुति के दिन राज-मंच और जन-मंच के बीच सार्वजनिक चुनौती- स्वयंवर के लिए राजश्री में निर्धारित- ‘धनुष-मंच’। राम वनवास की अवधि में जब भरत पधारते हैं तो देवी-मंच और और राज-मंच के बीच भरत-राम मिलन की भक्त-भगवान की झांकी के लिए प्रेम-समर्पण मंच बनाया जाता है, जहां दोनों भाई गले मिलकर विश्व के सम्मुख सर्वोच्च विश्वास का आदर्श प्रस्तुत करते हैं।

तात्पर्य यह कि दृश्यबंधों के अनुरूप तुलसी मंच में आवश्यक परिवर्तन करने का लोच बना रहता है। सभी मंच एक प्रतीक के रूप में हैं और नाट्य निदेशक (जिसे रामलीला में ‘व्यास’ कहा जाता है) दृश्य-पात्र-कथानक-भावप्रस्तुति के अनुसार मंच व्यवस्था में, उसकी ऊंचाई में आवश्यक परिवर्तन कर सकता है। बस एक बात हमेशा केंद्र में रहती है कि दर्शक नाट्य दृश्य के रूपक में कैसे तल्लीन हो सके। नाट्य-रंगमंच का उद्देश्य भी तो यही है कि दर्शक-पात्र-दृश्यबंध में सहज तादात्म्य स्थापित हो सके! लीलास्थल के निकट नदी, सरोवर या तालाब की कल्पना क्षीर-सागर की झांकी, राम का गंगा अवतरण, लंका पहुंचाने के लिए सेतु-बंध की प्रस्तुतियों के लिए किया जाता है। सरोवर की उपलब्धता न होने पर जलाशय का काल्पनिक रूपक बनाकर दृश्य-प्रस्तुति कर ली जाती है। रंगमंच की दृष्टि से इतनी लचीली व्यवस्था वाला ‘तुलसी मंच’ नाट्य प्रस्तुति के लिए भारतीय नाट्य शास्त्र का मौलिक चिंतन है न!

दर्शक-पात्र सम्बन्ध
तुलसी मंच की मज़बूत आधारशिला है- दर्शक-पात्र सम्बन्ध! दोनों के बीच बस एक क्षीण रेखा मात्र होती है। राम विवाह में बराती बन जाते हैं दर्शक, और राम-वनवास में वे पात्रों के साथ-साथ स्वयं भी वनवासी बनकर एक लीलास्थल- अयोध्या से दूसरे लीलास्थल- चित्रकूट तक पैदल ही चल पड़ते हैं। अनुभूति की इन विशेषताओं से भी परे यहां का वार्षिक आयोजन रामलीला शिव की नगरी में प्रतिवर्ष रामरस की वर्षा का निमित्त है, जिसकी अक्षुण्ण सफलता का दारोमदार बनारस के नेमीदर्शकों को जाता है।

ये रामलीला में किसी थिएटर की सजी-धजी आरामदेह कुर्सियों व बैठने की सुचारु व्यवस्था की अपेक्षा नहीं रखते हैं और न ही रामरस से मन-प्राण भिगोने के लिए ‘माइक’ जैसे ध्वनि विस्तारक यंत्रों एवं आधुनिक प्रकाश संयंत्रों के ही मोहताज़ हैं। हज़ारों की भीड़ होने के बावजूद इन आधुनिक उपकरणों के बिना भी दर्शक रामलीला का प्रत्येक दृश्य देखते और संवाद सुनते भी हैं। अपने साथ लाए अपनी सुविधा के रूप में पीढ़े या आसन पर बैठने की स्वयं-नियोजित व्यवस्था, हाथों में रामचरितमानस की पोथी लिए रामायणियों के सस्वर पाठ के साथ स्वयं भी पाठ करते हुए रामलीला आयोजन में सहभागिता का तादात्म्य रामनगर लीला की एक दुर्लभ विशेषता है।

राम-विवाह की लीला में वे बराती बन जाते हैं, राम का वनवास होने पर वे राम की वनवास यात्रा के सहयात्री बन जाते हैं। प्रसंग के अनुसार लीला का स्थान परिवर्तित होता है और महाराजा ही नहीं सभी पात्र, रामायणी एवं दर्शक एक स्थान से दूसरे स्थान को जाते हैं। वह हाथी भी, जिस पर सवार होकर महाराजा लीला देखते हैं, एक नेमी दर्शक की भांति ही रामायणियों की चौपाइयों के साथ झूमता है। नेमी दर्शक बरस-दर-बरस, पीढ़ी-दर-पीढ़ी उस कथानक को आत्मसात करने के लिए जुटते हैं, जिसके हरेक अंश से वे पूर्व परिचित हैं। यह उनमें ऊब पैदा नहीं करता है वरन आस्था की अनूठी तरंग पैदा करता है।

नेमी दर्शक
वर्षों से अनवरत प्रत्येक वर्ष लीला देखने का नियम निर्वाह करने वाले, लीला को आत्मसात कर लेने वाले दर्शक ‘नेमी दर्शक’ कहे जाते हैं। इनमें से अनेक दर्शक बचपन से अब वृद्धावस्था तक पहुंच जाने के बावजूद अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। कतिपय नेमी दर्शक पहले तो लीला के पात्र बने फिर कालांतर में रामलीला ने उनको और उन्होंने लीला को आत्मसात कर लिया। दर्शकों की दृढ़ आस्था और विश्वास के वशीभूत हो प्रतिवर्ष यहां ईश्वर को अवतार लेना पड़ता है यह आश्वस्त करने के लिए कि हमारे जीवन में मरकर पुनः जन्मने वाले रावण का संहार अवश्य होगा!

​​​​केवल धर्मभीरु भारतीय ही नहीं, वरन हर घटनाक्रम को तर्क की कसौटी पर परखने वाले पाश्चात्य जगत के लोग भी भारत के स्वर्णिम इतिहास और परंपरा को वर्तमान से सीधे जोड़ने वाले इस आयोजन के क़ायल हुए बिना नहीं रह सके हैं। ‘यूनेस्को’ ने रामलीला परंपरा को ‘विश्व की सांस्कृतिक धरोहर’ (वर्ल्ड हैरिटेज) घोषित किया है! यदि आप मेरे प्रत्यक्ष अनुभव को मेरा भ्रम या अंधभक्ति मान लें तो भी न जाने कितने देशी-विदेशी दर्शकों का अनुभव है कि यदि श्रद्धा सहित शुद्ध भाव से लीला देखें तो आप पाएंगे कि समय और स्थान, टाइम एंड स्पेस, यहां अपना अर्थ खोकर आपको एक अन्य लोक में ले जाते हैं। आप अनुभव करने को विवश हो जाएंगे कि आपने कुछ ऐसा देख लिया, सुन-समझ लिया, साक्षात दर्शन पा लिया जिसे बता पाने में आपकी वाणी मौन हो जाएगी, शब्द कहीं खो जाएंगे।

दर्शक-पात्र-नाट्य प्रस्तुति-दृश्यबंध के अनुरूप सहज ढलकर नाटक-दर्शक-कथानक के बीच दूरी सहज ही समाप्त करने की क्षमता रखने वाला यह ‘तुलसी मंच’ नाट्य जगत के लिए भारतीय मूल चिंतन वाला विकल्प प्रस्तुत करता है और पाश्चात्य जगत में रंगमंच शैली की विधा ढूंढ रहे रंगकर्मियों को आश्वस्त करता है कि अपनी प्रयोगधर्मिता को सार्थक आयाम देते हुए अंधी दौड़ के मकड़जाल में पड़ी मानव जाति के लिए लोकरंजन के साथ-साथ सामाजिक, संवेदनशील नागरिक होने का अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत कर सकें!

लेखक परिचय

अशोक खन्ना
देश-दुनिया के विश्व रामायण सम्मेलनों में चित्र प्रदर्शनियां व व्याख्यान। कई पुस्तकें प्रकाशित। "काशी की लीला परम्परा' शीघ्र प्रकाश्य।

खबरें और भी हैं...

    आज का राशिफल

    मेष
    Rashi - मेष|Aries - Dainik Bhaskar
    मेष|Aries

    पॉजिटिव- दिन सामान्य ही व्यतीत होगा। कोई भी काम करने से पहले उसके बारे में गहराई से जानकारी अवश्य लें। मुश्किल समय में किसी प्रभावशाली व्यक्ति की सलाह तथा सहयोग भी मिलेगा। समाज सेवी संस्थाओं के प्रति ...

    और पढ़ें