स्वाद-आबाद:हज़ारों सालों से भारत में खाई जा रही है खीर, हर प्रांत में अपनी अलग पहचान रखती है यह खीर

पुष्पेश पंत6 महीने पहले
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  • पौराणिक आख्यानों के अनुसार — भगवान विष्णु महालक्ष्मी के साथ वैकुंठ में क्षीर सागर की लहरों पर स्थित शेष शय्या पर विश्राम करते इस जगत का पालन करते हैं।
  • क्षीर शब्द संस्कृत में दूध का पर्याय है और खीर नामक सात्विक पौष्टिक व्यंजन का नाम इसी आधार पर हुआ है।
  • खीर को ‘परमान्न’ तथा ‘ब्रह्मान्न’ नाम से भी जाना जाता है।
  • महालक्ष्मी पूजन के दिन खीर का ही प्रसाद प्रमुख होता है।
  • दीपावली के अवसर पर इस बार स्वाद-आबाद स्तंभ खीर की महिमा को समर्पित...

ऐतिहासिक संदर्भ जानकारी देते हैं कि चावल, चीनी एवं दूध से पकाई खीर की महिमा हज़ारों साल से प्रतिष्ठित है।
मान्यता है कि ज्ञान प्राप्ति के बाद सिद्धार्थ गौतम ने अपना सुदीर्घ उपवास सुजाता नामक कन्या द्वारा अर्पित खीर से तोड़ा था। खीर-खंड भोजन से ही सम्मानित अतिथियों का स्वागत-सत्कार किए जाने की हमारी परंपरा है। खीर-पूड़ी, पूड़ी-हलवा विशेष भोजन का अभिन्न अंग हैं।
एक चावल की खीर
आम तौर पर खीर चावल से ही पकाई जाती है पर देश-काल के अनुसार चावल तथा दूध की मात्रा, इनका परस्पर अनुपात बदलता रहता है। अवध के बावर्ची ‘एक चावल की खीर’ की ईजाद का दावा करते हैं, जिसमें नाममात्र के लिए ही चावल का एक दाना डाला जाता है। यह खीर लच्छेदार रबड़ी की सहोदरा लगती है। वैसे भी बेहतरीन खीर दूध-भात से बहुत फ़र्क़ होती है। मद्धिम आंच पर देर तक औटाकर गाढ़े दूध की क़ुदरती मिठास ही बहुत कम चावलों के साथ जुगलबंदी साधती है। इसे किसी अलंकरण की आवश्यकता नहीं होती।

लहसुन खीर
लहसुन खीर

लाहौल विला लहसुन
माथा चकराने वाली अगर कोई खीर है तो वह है ‘लहसुन की खीर।’ यह भी अवध के बावर्चियों की ही करामात है। इसमें लहसुन के कोयों को फिटकरी में उबालकर तेज़ महक से मुक्त किया जाता है और फिर इनका इस्तेमाल चावल के दानों की जगह किया जाता था। इसे पकाने वाले आज बहुत कम बचे हैं।

बादाम बन जाता है चावल
आजकल सड़क के किनारे निर्मित ढाबों में ‘बादाम की ठंडी खीर’ को भोजन के बाद मुंह में मिठास घोलने के लिए मेनू में सदाबहार आइटम के रूप में शामिल कर लिया गया है। बादाम की गिनी-चुनी हवाइयां ही इसका नाम सार्थक करती हैं, कद्दूकस किया नारियल ही मुंह में अधिक लगता है। कबाबी बावर्ची बादाम को छीलकर, फिर तराशकर चावल की शक्ल देकर जिस खीर से मेहमानों को चकित करते थे उससे इसका दूर का ही रिश्ता नज़र आता है। ‘चिलग़ोज़े की खीर’ तो और भी दुर्लभ है- लगभग लुप्तप्राय। हां, कई लोग बहुत सारे मेवों को मिलाकर खीर पकाते हैं, जिसमें चावल का इस्तेमाल नहीं करते। कश्मीरी पंडित रसोई का ‘शुफ्ता’ इसी से प्रेरित लगता है। चावल की जगह इसमें सूखे फल, मेवे, ‘चामन’ यानी पनीर के चौकौर टुकड़े इस्तेमाल किए जाते हैं।

मखाने की खीर
मखाने की खीर

परदेस में भी ये स्वाद
व्रत-उपवास के दिन अनाज वर्जित समझा जाता है पर फलाहारी थाली में खीर का स्थान सुरक्षित रहता है। इस अवसर पर खीर मखाने या साबूदाने से तैयार की जाती है। नारियल के दूध में साबूदाने की खीर थाइलैंड, वियतनाम, मलाया, इंडोनेशिया आदि देशों में भी खाई जाती है।

आटे की खीर
आटे की खीर

स्थानीय ज़ायक़ा
भारत के विभिन्न प्रदेशों में आप खीर के स्थानीय ज़ायक़ों का आनंद ले सकते हैं। उत्तराखंड में गाढ़ी खीर के कटोरे में ऊपर से पिघला घी डाला जाता है और कद्दूकस किया नारियल भी। किशमिश, बादाम आदि यहां के दुर्गम गांवों में दुर्लभ ही रहे हैं, अभी हाल तक। राजस्थान एवं गुजरात के देहाती अंचल में बाजरे की खीर चाव से खाई जाती है तो उत्तर प्रदेश में सूजी या आटे की खीर भी खाई-खिलाई जाती है।

बाजरे की खीर
बाजरे की खीर

शकरकंद की जनसुलभ खीर
पूर्वांचल के गांवों में शकरकंद की खीर को आप सबसे ग़रीबपरवर खीर कह सकते हैं। शकरकंद को कद्दूकस कर चावल तथा दूध के अभाव को दूर किया जा सकता है। कंद की क़ुदरती मिठास महंगी चीनी की अनिवार्यता का भरम तोड़ती है। नाम मात्र का दूध देर तक खौला कर गाढ़ा करने की दरकार नहीं रहती। खीर एक गुण अनेक!

छेना पायश
छेना पायश

ताड़-खजूर के गुड़ की खीर
पंजाब में गाजर की खीर चाव से खाई जाती रही है दो पीढ़ी पहले तक। राजधानी दिल्ली के भंडारा रोड वाले इलाक़े में गुलाटी नामक शाकाहारी रेस्तरां में फलों तथा सब्ज़ियों की खीर नियमित रूप से बनाई जाती थी। बंगाल में ताड़-खजूर के गुड़ से जो पायोश बनाते हैं, उसका चॉकलेटी स्वाद उसे असाधारण बनाता है। कुछ लोग इसे रसगुल्लों के साथ खाना पसंद करते हैं। बंगाल में ही छेने की नन्ही गोलियों के साथ पकाई जाने वाली ‘छेना पायश’ भी बहुत लोकप्रिय है।

गाजर की खीर
गाजर की खीर

दाल भी बढ़ाती है स्वाद
दक्षिण में खीर में चावल की की तुलना में सेवइयों का चलन ज़्यादा है हालांकि ‘परिप्पु पायसम’ नामक पारंपरिक खीरें चावल नहीं दाल से तैयार की जाती हैं। केरल में इन्हें गाय या भैंस के बजाय नारियल के दूध से तैयार किया जाता है। मिठास घोलने के लिए चीनी नहीं गुड़ का ही प्रयोग होता है। केरल में दर्जनों क़िस्म के सुस्वादु, सुवासित केले पैदा होते हैं। कुछ खीर में इनका भी इस्तेमाल करते हैं, जिन्हें पम पायसम कहते हैं।

केसरिया खीर
केसरिया खीर

रंगीन भी होती है खीर
आमतौर पर खीर की छवि बर्फ़ या दूध जैसी सफ़ेद ही उभरती है पर दिलचस्प बात यह है कि कुछ खीर रंगीन भी होती हैं। केसरिया खीर में जाफ़रान के चंद रेशे उसे आकर्षक पीले रंग का पुट देते हैं तो गुलाबी खीर के तेवर पूरी तरह गुलाबी होते हैं। गन्ने के रस की खीर भोपाल की रियासत में जश्ने-हरियाली के अवसर पर अनिवार्यतः पकाई जाती थी और सावनी समां बांधती थी। इस दावत में हरे दस्तरख़्वान का हर व्यंजन हरा ही होता था- रिजाला, मेथी मुर्ग़/ कीमा, साग गोश्त, तरह तरह के साग- फिर भला खीर क्यों ना अपना रंग बदलती? इस खीर की मिठास काफ़ी तेज़ पर ताज़गी भरी रहती है और इसमें चावल गन्ने के रस में ही पकाए जाते हैं।

सेवाइयां की खीर
सेवाइयां की खीर

शीर-कुरमा और फिरनी
यह समझना भ्रामक है कि खीर की महत्ता सिर्फ़ हिंदुओं-बौद्धों के लिए ही है। मुस्लिम भी विशेष पर्व के अवसर पर खीर पकाते-खिलाते हैं। मीठी ईद पर सेवइयों की खीर कबाब-बिरयानी और तरह-तरह के कोरमों से होड़ लेती है। बोहरा समुदाय में जो ‘शीर कुरमा’ परोसा जाता है, वह सेवइयों की मीठी खीर ही तो है! कुछ लोगों का मानना है कि चावल के दानों की जगह चावल को पीसकर जो ‘फिरनी’ तैयार होती है और जिसे मिट्टी के शिकोरों में जमाकर खाते-खिलाते हैं वह खीर का सबसे परिष्कृत, मुंह में रखते ही घुल जाने वाला विकसित अवतार है। वास्तव में हवा से हल्की फिरनी पश्चिम यूरोप के हवा से हल्के सूफ़्ले की याद दिला जाती है!

फिरनी
फिरनी

टेढ़ी खीर
गुलाब की खीर की कहानी कम दिलचस्प नहीं। सैलाना के महाराज दिलीपसिंह न केवल खाने के शौक़ीन थे वरन उन्हें पकाने का भी चाव था। उन्होंने देश भर की रियासतों-रजवाड़ों का भ्रमण कर पाकविधियों का संग्रह किया था। उनका दूसरा शौक़ था गुलाबों की खेती और इनकी नई क़िस्मों को उगाना। सैलाना रियासत थी तो बहुत छोटी पर महाराज के इन दो शौक़ों की वजह से देश भर में मशहूर हो गई। उनके उत्तराधिकारी महाराज दिग्विजय सिंह ने इनका संग्रह एक पुस्तक में किया है। इनके वंशज महाराज विक्रमजीत सिंह पारिवारिक नुस्ख़े का अनुसरण कर गुलाब की नायाब खीर पकाते हैं। यह काम आसान नहीं और टेढ़ी खीर वाले मुहावरे की याद अनायास दिला देता है।

गुलाब की खीर
गुलाब की खीर

लेकिन... गुलाबी खीर का अर्थ यह नहीं कि— खीर गुलाब-जल से सुवासित कर ऊपर गुलाब की पंखुड़ियां बिखेर दी जाएं। कुछ उतावले होटलवालों का मन इतने से भी नहीं भरता तो वे इस खीर को और भी गुलाबी बनाने कि लिए इसमें गुलकंद डालने का लोभ भी नहीं संवरण कर पाते। खीर न हुई मीठा पान हो गया! बहरहाल, सैलाना नरेश जो खीर बहुत जतन से बनाते थे, उसमें ताज़ा गुलाब की मौजूदगी महसूस की जा सकती थी। हां इस बाबत सतर्क रहने की ज़रूरत है कि पंखुड़ियां रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों के ज़हरीले प्रदूषण से मुक्त हो।

गांधीजी की खीर
गांधी के चंपारन प्रवास के संस्मरणों में महादेव भाई की भाभी ने उस घटना का उल्लेख किया है कि — जब बापू ने आश्रमवासियों को अपने हाथ से पकाकर आटे की खीर खिलाई थी। दूध जल गया था पर बापू के प्रति प्रेम के कारण सभी बिना शिकायत किए इसे खाते चले गए!
क्षीर सागर में यह खीर-यात्रा आज भी जारी है और निश्चय ही भविष्य में नई-नई खीरें प्रकट होंगी। शेषनाग का एक नाम अनंत है, उसे ही सार्थक करती हुई!

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