स्वाद-आबाद:ओडिशा में है भगवान जगन्नाथ का धाम, इसलिए पूरी तरह से सात्विक और प्राकृतिक होता है यहां का भोजन

पुष्पेश पंत4 महीने पहले
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  • ओडिशा की बहुमुखी पहचान अनूठी है। मौर्यकाल में यह कलिंग के रूप में जाना जाता था। समुद्र-तटवर्ती कलिंग का संपर्क सागर पार दक्षिण-पूर्व एशिया के पड़ोसियों से था।
  • बाली, यवद्वीप, सुमात्रा, पूर्ण द्वीप, चंपा की साहसिक यात्राएं करने वाले नाविक व्यापारियों की कथाएं ओडिशा की जन-स्मृति का अभिन्न अंग हैं। पारंपरिक बाली यात्रा नामक उत्सव इस विरासत को आज भी जीवित रखे है।
  • मसाला व्यापार मार्ग का महत्व रेशम राजपथ से कम नहीं था। इस आदान-प्रदान ने ओडिशा को सांस्कृतिक संगम स्थल बनाया और उसके खानपान में नानाविध रंग भरे। इस बार का स्वाद-आबाद ओडिशा पर।

भगवान जगन्नाथ के धाम के कारण ओडिशा की पुरी नगरी हिंदू तीर्थयात्रियों की आस्था का केंद्र है। आदि शंकराचार्य ने देश को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बांधने वाले ज्योतिर्मठ की स्थापना यहां की थी और तभी से देश के दूरदराज़ इलाक़े से यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के खानपान का प्रभाव 56 भोग नामक सात्विक प्रसाद में प्रतिबिंबित होता है। मान्यता है कि ओडिशा के सूपकारों- विशेषकर धर्म कार्यों में लिप्त रसोइयों- की पाकविधि विगत हज़ार साल से रत्तीभर नहीं बदली है। वे किसी ऐसे पदार्थ का उपयोग अपनी रसोई में नहीं करते, जिसका आयात विदेशों से हुआ, मसलन आलू, मिर्च, टमाटर आदि। सात्विक खाना उबालकर ही पकाया जाता है और छौंक तथा तड़का नहीं लगाया जाता, क्योंकि नाक में गंध के प्रवेश से नैवेद्य जूठा होने का जोखिम रहता है। यही कारण है कि ओडिशा के भोजन में खाद्य पदार्थों के क़ुदरती स्वाद को ही बरक़रार रखा जाता है।

मध्य युग में यहां के गंगवंशी शासकों ने भव्य मंदिरों का निर्माण करवाया, जिनमें कोणार्क का सूर्य मंदिर और भुवनेश्वर का लिंगराज देवालय विश्वविख्यात हैं। इसी समय यहां चांदी की बेहद नज़ाकत वाले फिलगिरी हस्तशिल्प का विकास हुआ। ओड़िसी नृत्यशैली भारत की आठ शास्त्रीय शैलियों में से एक है। इसके आसन और मुद्राएं मंदिरों की दीवारों पर चित्रित हैं। इसी नागर शैली के मंदिर सुदूर उत्तराखंड में भी मिलते हैं, जिनसे यह संकेत मिलता है कि ओडिशा के संबंधों का विस्तार अतीत में कितना व्यापक था। औपनिवेशिक काल में ओडिशा बिहार की तरह बंगाल प्रांत का हिस्सा रहा और आज तक यह फ़र्क़ करना कठिन हो जाता है कि किसने किसके खाने को कितना प्रभावित किया। रसगुल्ले को लेकर रस्साकशी इसका छोटा-सा उदाहरण है।

मिला-जुला स्वाद
इतिहास की तरह भूगोल ने भी ओडिशा के भोजन को समृद्ध किया है। इस राज्य की सरहद आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड को छूती है और यह स्वाभाविक है कि इसकी झलक खाने में भी दिखलाई देती है। ख़ासकर आदिवासी अंचल में और वनवासी ग्रामीणों के जीवन में, जिनके लिए मानचित्र पर मनुष्य द्वारा खींची सीमारेखाएं मायने नहीं रखतीं। ये समूह युग-युग से नदियों, जंगलों, औषधीय गुणों वाली वनस्पतियों काे आपस में साझा करते आए हैं।
यह भी याद रखने लायक़ है कि ब्रिटिश सरकार के सीधे नियंत्रण के अलावा कई छोटी-बड़ी रियासतें थीं, जैसे केऊनझार, देनकनाल, बोलंगीर, मयूरभंज आदि। इनके शादी-ब्याह भारत के समकक्ष रजवाड़ों में होते थे। अर्थात् देश के अनेक स्थानों का स्वाद भी यहां के श्रेष्ठिवर्ग की थाली में स्थान पाता रहा है।

दाल, साग और बेसार
शुरू कहां से करें? ओडिशा में आम आदमी का खाना बहुत सादा पर पौष्टिक और स्वादिष्ट होता है। यहां भात का साथ निभाती है दालमा नामक दाल। इसमें कई सब्ज़ियां- जैसे कच्चा केला, बैंगन, कद्दू, जिमीकंद, पपीता, कटहल आदि पड़ता है। पर इसे एक तरह का साम्भर समझने की भूल ना करें। इसमें न तो इमली की खटास होती है और न ही गुड़ की मिठास। खटाई के लिए कच्चे आम के टुकड़े ज़रूर इस्तेमाल किए जाते हैं। लेकिन मिर्च-मसाला नाम को भी नहीं होता।

बेसार
बेसार

यदि दाल भी सुलभ न हो तो यहां शाक-पात से ही गुज़ारा होता है। साग की सूची में हर तरह की हरी पत्तियों को शामिल किया जाता है- पालक, सरसों, पोई, सुनसुनिया। सरसों के दाने पीसकर प्रमुख मसाले की तरह काम लाए जाते हैं, जिसे बेसार कहते हैं। तवे पर सिर्फ़ बेसार में लिपटी हल्की तली मछली को भी यही नाम दिया जाता है, जो सूरत और सीरत में बंगाल की शोरशे माछ से बहुत फ़र्क़ होती है। अनेक सब्ज़ियों के मिश्रण को भी बेसार के रूप में पकाया जाता है।

ग़ैर-परम्परागत ज़ायक़े
ओडिशा की खारे पानी वाली चिलिका झील झींगों, केकड़ों और समुद्र से यहां पहुंचने वाली मछलियों के लिए प्रसिद्ध है। यहां के व्यंजनों में मुग़लिया दस्तरख़्वान की छाप दिखलाई देती है। रोज़मर्रा खाई जाने वाली मछली ‘भाजा’ की शक्ल में परोसी जाती है। ओडिशा के झोल तथा झाल भी सादे और कम चिकनाई वाले होते हैं। ओडिशा के अनेक ब्राह्मण परिवार बेहिचक मछली खाते हैं। हांडी मासों में बकरे के मांस को मिट्टी की हांडी और पत्रों मासों में पत्तों में भी पकाया जाता है। मुर्ग़ी का कस्सो मासों देसी या जंगली मुर्ग़ी से तैयार किया जाता है। आदिवासी अंचल में लाल चींटों की चटनी भी पीसी जाती है, जिसे कोरे चावल के साथ खाते हैं।

धनिकों और निर्धनों की पसंद
इस प्रदेश के भोजन में खिचड़ी तथा कढ़ी का प्रचलन है। ये चीज़ें जगन्नाथ पुरी के 56 भोग में नैवेद्य के थाल में भी रहती हैं, हालांकि ऋतु चक्र के अनुसार इनमें काम लाई जाने वाली सामग्री बदलती रहती है।
पांथा भात को यहां पकाळ नाम से जाना जाता है। रात के बचे भात को पानी में डुबाेकर उसमें हलका ख़मीर उठाया जाता है। यह पारंपरिक रूप से निर्धन किसान का कलेवा रहा है। हाल के दिनों में इसका स्वाद संपन्न ओडिशावासियों की ज़ुबान पर भी चढ़ चुका है। पकाळ की दावतों में तरह-तरह के सामिष और निरामिष भाजे, पापड़, बड़ियां, अचार चावलों के इर्द-गिर्द सजाए जाते हैं।

दही वड़ा आलूदम
दही वड़ा आलूदम

भुवनेश्वर और कटक की जुड़वा नगरियों में छोटे-छोटे दही बड़े ‘आलूदम’ के साथ खाए जाते हैं। यह सब्ज़ी बंगाली आलूदम से बहुत फ़र्क़ और रसेदार तरकारी जैसी होती है। चबैने के लिए पियाजी भी कम लोकप्रिय नहीं, जो पतले कटे प्याज़ की पकौड़ियां होती हैं। सूखे मटर की घुघुनी तथा चूड़ा (कुटा चावल) एवं मुरमुरा (मूडी) क़स्बों तथा ग्रामीण अंचल में समान रूप से लोकप्रिय हैं।

दही बैंगन
दही बैंगन

सांतुली और पीठे
ओडिशा की सब्ज़ियों में हमें सबसे ज़्यादा सम्मोहित किया दही वाले बैंगनों ने। यह उन गिनी-चुनी तरकारियों में है, जिन्हें गर्म नहीं ठंडा यानी कमरे के तापमान पर ही खाया-खिलाया जाता है। पानी जैसे पतले हल्दी माछ का आनंद भी ऐसे ही लिया जाता है। मिक्स्ड वेजिटेबल का ओडिया संस्करण सांतुली है, जिसमें आलू, बैंगन, फलियां काटकर या तो तली जाती हैं या उबाली जाती हैं। नमक, हरी मिर्च, हल्दी, जीरा, राई तक ही मसाले सीमित रहते हैं। कट्टा राई खुंब की सब्ज़ी है, जो सूखी और तरीवाली बनाई जाती है।

चाकुली पीठा
चाकुली पीठा

पीठे- नमकीन तथा मीठे- ओडिशा के लोगों के खाने में अनिवार्यतः रहते हैं। इनमें मोटे दोसे जैसा चाकुली पीठा शोरबे के साथ खाया जाता है तो अन्य पीठे नारियल, गुड़ या दाल की पीठी भरकर भाप से पकाए जाते हैं या भारी तले वाले बर्तन में केक की तरह सेंके जाते हैं। हल्दी के पत्तों में लपेटकर तैयार किया जाने वाला हौल्दी पतरौ पीठा विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

छेनापूडो
छेनापूडो

मीठे की मौज
मिष्टान्न की सूची में छेनापूड़ो सर्वश्रेष्ठ समझा जाता है। इसे खानपान के शौक़ीन भारतीय चीज़-केक कहते हैं। ताज़े छेने का हल्का जला स्वाद अद्‌भुत लगता है। हमारी समझ में रसगुल्ले के आविष्कार की लड़ाई बेकार है। छेने का यह अवतार ओडिशा के हलवाइयों की मौलिक प्रतिभा का यथेष्ठ प्रमाण है। इसे देर तक बचाकर रखा नहीं जा सकता, इसीलिए तीर्थयात्री अपने साथ खाजा ले जाते हैं। यह तली हुई ख़स्ता मिठाई मैदे से बनती है और कई परत वाली होती है। पकाने के बाद इसे चाशनी में डुबाया जाता है पर अचरज इस बात पर होता है कि इसकी मिठास तेज़ नहीं लगती।

खाजा
खाजा

रही बात रसगुल्लों की तो ओडिशा के रसगुल्लों में भी गुड़ इस्तेमाल होता है, जो इनको एक ख़ास ज़ायक़ा और हल्का मटमैला भूरा रंग देता है। कणिका नाम के मीठे घी से तर चावल विशेष पर्व-अनुष्ठान के अवसर पर पकाए जाते हैं। खीरी यहां की स्थानीय खीर है, जो बंगाली पायश से कम गाढ़ी होती है।

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