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  • Lord Narada Is The Psyche son Of Brahma, Narada Is Not The One Who Causes Discord, But Narada Is The Best Among All The Great Sages.

ऋषि परम्परा:ब्रह्मा के मानस-पुत्र हैं देवर्षि नारद, कलह करवाने वाले नहीं बल्कि सभी महर्षियों में श्रेष्ठ हैं नारद

डॉ. विवेक चौरसिया3 महीने पहले
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  • भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में नारद उनके लिए कहा है कि ऋषियों में मैं नारद हूं।
  • जो वीणापाणि होकर संगीत के साधक हैं और नित्य नारायण के गुणगायक हैं और जो समाचार व सूचनाएं देते हैं और सद्कार्यों व सृजन के लिए प्रेरित भी करते हैं।
  • आश्चर्य कि ऐसे नारद की लोक में छवि कलह कराने वाले की है!
  • यह लेख भक्ति के प्रसारक, महाज्ञानी, त्रिकालदर्शी देवर्षि नारद की वास्तविक छवि को प्रस्तुत करता है...

शास्त्र कहते हैं कि नारद भगवान का ‘मन’ हैं... इसीलिए भगवान के मन में जो कुछ भी है वह सब नारद को ज्ञात है। सारा इतिहास, ज्ञान और रहस्य, सबकुछ। नार अर्थात् जल और द अर्थात् दाता। वे जल की भांति तरल, सरल, निर्मल, पारदर्शी, तृप्ति व जीवन दायिनी भक्ति के प्रसारक हैं, अतः नारद हैं। अपने आराध्य नारायण की तरह उनके नाम का साम्य भी भगवान और भक्त की संयुक्ति का संकेत कराता है। एक ओर वे संगीत के साधक हैं तो दूसरी ओर नित्य नारायण के गुणगायक। वे एक-दूसरे के समाचार व सूचनाएं भी देते हैं और सद्कार्यों व सृजन के लिए प्रेरित भी करते हैं। दुर्भाग्यवश, लोक में उनकी छवि ‘कलह कराने’ वाले की है लेकिन सच तो यह है कि शास्त्रों में वे सदा ही समन्वय कराते और नकारात्मक को सकारात्मकता की ओर उन्मुख करते मिलते हैं।

देवर्षि नारद ऋषि परम्परा के महानतम ऋषि हैं। सम्भवतः वे इकलौते हैं, जिन्हें पुराणों में हर स्थान पर राजर्षि और महर्षि से भी ऊपर देवर्षि का सम्बोधन देकर सम्मानित किया गया है। बहुसंख्य स्थानों पर वे देवर्षि और अनेक स्थानों पर ब्रह्मर्षि कहकर पूजे गए हैं। सृष्टि में उनकी उपस्थिति अनादि है और उनके चरणों का प्रसार ब्रह्मलोक से देवलोक और दानवों के राजमहलों से मृत्युलोक तक है।
वेद से पुराण तक, रामायण से महाभारत तक और गीता से स्मृतियों तक नारद हर जगह अपूर्व प्रभाव के साथ उपस्थित हैं। उनकी गरिमा का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि गीता में अर्जुन को अपनी विभूति का परिचय देते हुए स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अपने को ऋषियों में नारद कहा है।
10वें अध्याय का 26वां श्लोक साक्षी है कि —
‘अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारद:।’

अर्थात्

हे पार्थ! वृक्षों में मैं पीपल हूं और देवर्षियों में नारद हूं। इसी तरह महाभारत के शांतिपर्व के 30वें अध्याय में श्रीकृष्ण के वचन हैं —

‘नारद: पर्वतश्चैव द्वावृषी लोकसत्तमौ।’

अर्थात् नारद और पर्वत, ये दोनों ऋषि सम्पूर्ण लोकों में श्रेष्ठ हैं।

वेद से पुराण तक नारद
नारद वेद से पुराण तक वर्णित हैं।
अथर्ववेद में नारद नामक ऋषि का नामोल्लेख अनेक बार हुआ है। ऐतरेय ब्राह्मण में वे हरिश्चंद्र के पुरोहित, सोमक साहदेव्य के शिक्षक तथा आम्बष्ठय एवं युधाश्रौष्टि को अभिषिक्त करने वाले के रूप में ऋषि पर्वत के साथ स्मरण किए गए हैं। मैत्रायणी संहिता में नारद एक आचार्य और सामविधानब्राह्मण में बृहस्पति के शिष्य के रूप में वर्णित हैं। छान्दोग्योपनिषद् में ये सनत्कुमार के साथ उल्लिखित हैं।

ब्रह्मर्षि का आत्मकथ्य
नारद कौन हैं, इस सम्बंधी अनेक कथाएं हैं।
वे ब्रह्मा के मानस पुत्र माने गए हैं और लोक ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को उनकी प्राकट्य तिथि मान उनका स्मरण करता है। श्रीमद्भागवत महापुराण में प्रथम स्कन्ध के पांचवें अध्याय में वेदव्यास को भागवत की रचना के लिए प्रेरित करते हुए नारद कहते हैं कि ‘पूर्व कल्प में मैं वेदवादी ब्राह्मणों की दासी का पुत्र था। ब्राह्मणों के सान्निध्य में मुझे ज्ञान बोध हुआ। आसक्ति मिटी और मैं श्रीकृष्ण परायण हुआ और कालांतर में कालधर्म को प्राप्त हो गया। कल्प के अंत में जिस समय भगवान नारायण प्रलयकालीन समुद्र के जल में शयन करते हैं, उस समय उनके हृदय में शयन करने की इच्छा से इस सारी सृष्टि को समेटकर ब्रह्मा जी जब प्रवेश करने लगे तब उनके श्वास के साथ मैं भी उनके हृदय में प्रवेश कर गया। एक सहस्र चतुर्युगी बीत जाने पर जब ब्रह्मा जगे और उन्होंने सृष्टि करने की इच्छा की, तब उनकी इंद्रियों से मरीचि आदि ऋषियों के साथ मैं भी प्रकट हो गया। मेरे जीवन का व्रत अखण्ड है।’

रामायण रचना के प्रेरक
नारद की महानता की एक बानगी।
महाभारत के शांतिपर्व के 230वें अध्याय में सुलभ है जहां उग्रसेन के पूछने पर श्रीकृष्ण ने नारद के परिचय और प्रशंसा में पूरे 20 श्लोक कहे हैं। उनकी सबसे बड़ी विशेषता है सृजन के लिए प्रेरणा देना। महत्वपूर्ण है कि महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना उन्हीं से प्रेरित होकर की थी। आदिकाव्य के बालकाण्ड की कथा ही नारद व वाल्मीकि संवाद से प्रारम्भ होती है। उसमें नारद ने वाल्मीकि को श्रीराम चरित्र सुनाया और इसी के बाद तमसा तट पर क्रौंच वध का घटनाक्रम हुआ, जिसके बाद रामायण के रूप में विश्व का पहला काव्य सृजित हो सका। इसी तरह श्रीमद्भागवत में नारद की ही प्रेरणा से भक्ति जागृत हुई और वेदव्यास कृष्णलीला के गान को तत्पर हुए। कहा जा सकता है कि लोक के कल्याण के लिए आज यदि रामायण व श्रीमद्भागवत जैसे दो महान ग्रंथ हैं तो उनके बीज नारद ने ही रोपे हैं।

ज्योतिष के भी आचार्य नारद त्रिकालदर्शी हैं। वे केवल संगीत के ही आचार्य नहीं हैं अपितु ज्योतिष मर्मज्ञ और भविष्यवक्ता भी हैं। अठारह महापुराणों में एक नारदोक्त पुराण है जो बृहन्नारदीय पुराण के नाम से प्रसिद्ध है। मत्स्यपुराण के अनुसार, नारद ने बृहत्कल्प-प्रसंग में जिन अनेक धर्म-आख्यायिकाओं को कहा है, पच्चीस हजार श्लोकों का वह महाग्रंथ ही नारद महापुराण है। वर्तमान में उपलब्ध नारदपुराण बाइस हजार श्लोकों का है। तीन हजार श्लोकों की न्यूनता प्राचीन पाण्डुलिपि का कुछ भाग नष्ट हो जाने के कारण हुई है। नारदपुराण में लगभग सात सौ पचास श्लोक ज्योतिषशास्त्र पर हैं। इनमें ज्योतिष के तीनों स्कंध- सिद्धांत, होरा और संहिता की सर्वांगीण विवेचना की गई है। नारदसंहिता के नाम से उपलब्ध इनके एक अन्य ग्रंथ में भी ज्योतिषशास्त्र के सभी विषयों का विस्तृत वर्णन मिलता है। इससे सिद्ध होता है कि देवर्षि नारद भक्ति के साथ ज्योतिष के भी प्रधान आचार्य हैं। ध्यान रहे, श्रीरामचरितमानस की कथा में हिमालय के घर पार्वती के जन्म पर पहुंचे नारद ने ही देवी के बारे में भविष्यवाणी कर कहा था कि इनका विवाह जटाधारी योगी अर्थात् शिवजी से होगा। मानस के बालकाण्ड का यह दोहा प्रमाण है — ‘जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष। अस स्वामी एहि कहं मिलिहि परी हस्त असि रेख।।’

नारद और वांग्मय
नारद कथा-व्यास, उपदेशक व वैष्णव धर्म प्रचारक हैं।
नारद पञ्चरात्र नामक वैष्णव ग्रंथ में 10 महाविद्याओं की कथा कही गई है। इस कथा के अनुसार हरि का भजन ही मुक्ति का परम कारण माना गया है। इसी तरह नारद पुराण के ग्रंथ के पूर्वखंड में 125 अध्याय और उत्तरखण्ड में 182 अध्याय हैं। नारद स्मृति ग्रंथ इन्हें स्मृतिकार की प्रतिष्ठा देता है तो नारद भक्ति सूत्र सूत्रकार की। भागवत पुराण आधारित नारद भक्ति सूत्र प्रेमभक्ति का अपूर्व ग्रंथ है, जिसे अनेक विद्वानों ने पांचवां वेद तक कहा है।

महाभारत में उपदेश
महाभारत में नारद अनेकत्र उपलब्ध हैं।
देवताओं को महाभारत की कथा नारद ने ही सुनाई है। ये जनमेजय के सर्पसत्र के सदस्य थे तो द्रौपदी के स्वयंवर में भी उपस्थित थे। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में इन्होंने पवित्र जल छिड़का था तो देवताओं के दूत बनकर अर्जुन को दिव्यास्त्रों का प्रयोग न करने की समझाइश दी थी। यहां नारद देवगंधर्व हैं और महाकाव्य में प्रायः अथ से अंत तक इनकी असंख्य कथाएं हैं। यहां तक कि एक पृथक उपपर्व है जिसका नाम ‘नारदागमनपर्व’ है जिसमें इनके द्वारा युधिष्ठिर को धृतराष्ट्र के जंगल की आग में जलकर मर जाने की सूचना देने सम्बंधी कथा है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है युधिष्ठिर के इंद्रप्रस्थ का राजा बनने के बाद नारद का आगमन और प्रश्नों के माध्यम से राजधर्म का अनुपम उपदेश देना। सभापर्व की इस कथा में नारद ने युधिष्ठिर से लगभग सौ प्रश्न पूछे और परोक्ष रूप से जो शिक्षा दी, यदि हर राज्य का राजा उसका अनुसरण कर सके तो धरती स्वर्ग बन जाए!

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