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  • Maharishi Valmiki, The Author Of Adikavya Ramayana, Is The World's First Poet, The First Verse Was Composed From Mourning

ऋषि-परम्परा:आदिकाव्य रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि हैं विश्व के पहले कवि, शोक से रचा था पहला श्लोक

डॉ. विवेक चौरसियाएक महीने पहले
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  • महर्षि वाल्मीकि भारतीय ऋषि परम्परा के वे महापुरुष हैं जिन्हें विश्व का पहला कवि होने का गौरव प्राप्त है।
  • उनसे पहले वेदों के पवित्र मंत्र रचे गए किंतु काव्य के रूप में वाल्मीकि कृत रामायण ही आदिकाव्य माना गया है।
  • उनका यह महाकाव्य परवर्ती काल में न केवल समस्त रामकथाओं का आधार बना बल्कि इसी की प्रेरणा से जगत को आनंदित करने वाली काव्य गंगा प्रवाहित हुई...

भारतीय वांग्मय में रामायण के बाद दूसरे प्रमुख महाकाव्य महाभारत के रचयिता वेदव्यास की भांति वाल्मीकि भी अपनी रामायण के द्रष्टा और स्रष्टा ही नहीं अपितु एक महत्वपूर्ण पात्र भी हैं।
महामना श्रीराम की संतति इन्हीं के आश्रम में जन्मी और इन्हीं के द्वारा शिक्षित, दीक्षित व संस्कारित होकर यशस्वी बनी। श्रीरामचरितमानस में तुलसीदास ने वाल्मीकि को सीताराम
के गुण समूह रूपी पवित्र वन में विहार करने वाला तथा विशुद्ध विज्ञान सम्पन्न कवीश्वर कहकर हनुमानजी के साथ इनकी वंदना की है-
वंदे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ!

प्रचेता के पुत्र और सत्यवक्ता
स्वरचित रामायण उत्तरकाण्ड में वाल्मीकि ने स्वयं को प्रचेता पुत्र कहा है। देवी सीता के रसातल में प्रवेश से पूर्व उनकी शुद्धता का समर्थन व लव-कुश का परिचय कराते हुए वे कहते हैं -
‘प्रचेतसोSहं दशम: पुत्रो राघवनंदन।
न स्मराम्यनृतं वाक्यमिमौ तु तव पुत्रकौ।।’

अर्थात् — हे राम! मैं प्रचेता (वरुण) का दसवां पुत्र हूं। मेरे मुंह से कभी झूठी बात निकली हो, इसका मुझे स्मरण नहीं। मैं सत्य कहता हूं, ये दोनों आपके ही पुत्र हैं।
हिंदू धर्म कोश के अनुसार महर्षि कश्यप और अदिति के पुत्र वरुण से वाल्मीकि का जन्म हुआ। इनकी माता चर्षणी और भाई भृगु ऋषि थे। वरुण का एक नाम प्रचेत भी है अतः वाल्मीकि प्राचेतस् नाम से विख्यात हैं।
तैत्तरीय उपनिषद में वर्णित ब्रह्मविद्या वरुण और भृगु के संवाद रूप में है। इससे स्पष्ट है कि भृगु के अनुज वाल्मीकि परम ज्ञानी व तपस्वी थे। उग्र तपस्या या ब्रह्मचिंतन में देहाध्यास न रहने के कारण इनके शरीर को दीमक ने ढंक लिया था। जब ये दीमक के वल्मीक से बाहर निकले तब से इनका नाम वाल्मीकि प्रसिद्ध हो गया। इनका आश्रम तमसा नदी के तट पर था।

पुराणों में व्याध और दस्यु
डॉ. राजबली पाण्डेय पुराण वर्णित वाल्मीकि को प्राचेतस् वाल्मीकि से भिन्न मानते हैं। पुराणों में इन्हें व्याध और दस्यु बताया गया है जो कालांतर में राम नाम जपकर कवि बने।
स्कंद पुराण के वैशाख माहात्म्य में इन्हें व्याध बताया है। व्याध जन्म से पहले ये स्तम्भ नामक श्रीवत्सगौत्रीय ब्राह्मण थे। फिर व्याध जन्म में शंख ऋषि के सत्संग से, राम नाम जपकर ये दूसरे जन्म में अग्निशर्मा (या रत्नाकर) हुए। फिर सप्तऋषियों के सत्संग से मरा-मरा जपकर बांबी पड़ने से वाल्मीकि कहलाए।
लोककथाओं के अनुसार ये रत्नाकर दस्यु थे। एक दिन मार्ग में इन्होंने देवर्षि नारद को लूट के इरादे से पकड़ लिया मगर नारद के सदुपदेश से ये दस्यु कर्म से विरत हुए और अन्न-जल त्यागकर तप में इतने तन्मय हुए कि कब दीमकों ने उनकी देह पर घर बना लिया, इसका भी भान न रहा।

क्रौंच मिथुन वध और रामायण जन्म
रामायण के बालकाण्ड के प्रथम सर्ग में नारद व वाल्मीकि संवाद है जिसके अनुसार एक बार वाल्मीकि ने नारदजी से पूछा कि ‘संसार में ऐसा कौन पुरुष है जो मन पर अधिकार करने वाला, क्रोध को जीतने वाला, किसी की निंदा न करने वाला और कांतिमान है? जो प्रियदर्शन, सदाचार से युक्त व विद्वान है तथा संग्राम में जिसके कुपित होने पर देवता भी डरते हैं?’ इस पर नारद ने महर्षि को संक्षेप में श्रीराम चरित्र सुनाया।
इस संवाद के दो घड़ी बाद वाल्मीकि शिष्यों के साथ तमसा नदी के तट पर पहुंचे। वहां क्रौंच पक्षियों का एक जोड़ा प्रणयरत था जिस पर उसी दौरान एक निषाद ने बाण चलाया और नर पक्षी की मृत्यु हो गई। इससे मादा पक्षी रोने लगी और उन दोनों की दशा देख वाल्मीकि पहले दया से और फिर क्रोध से भर गए। उसी क्षण उनके कंठ से वे प्रसिद्ध पंक्तियां निकलीं जो कविता का आदिबीज कहलाईं। वे थी -

‘मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शाश्वती: समा:।
यत् क्रौञ्चमिथुनादेकमवधी: काममोहितम्।।’

अर्थात् — हे निषाद! तुझे नित्य-निरंतर कभी भी शांति न मिले, क्योंकि तूने काम से मोहित इस क्रौंच के जोड़े में से एक की बिना किसी अपराध के हत्या कर डाली है।

यह शोक की पीड़ा में निषाद को दिया शाप था लेकिन इसके मूल में करुणा थी। वाल्मीकि ने अनुभव किया कि उनके मुख से निकला वाक्य चार चरणों में आबद्ध है। उसके प्रत्येक चरण में बराबर अर्थात् आठ-आठ अक्षर थे और उसे वीणा की लय पर गाया भी जा सकता था। निश्चित ही वह श्लोक था।

कथा के अनुसार, उसी समय ब्रह्मा जी वहां आए और वाल्मीकि को पुष्टि की कि उनके मुख से निकला छंदोबद्ध वाक्य श्लोक ही है। उन्होंने महर्षि को तब श्लोकों में रामकथा लिखने की प्रेरणा दी और इस प्रकार रामायण का सूत्रपात हुआ। शाप के वे शब्द अनुष्टुप छंद में थे और इसी छंद में वाल्मीकि ने नारदजी से सुनी रामकथा के आधार पर सम्पूर्ण आदिकाव्य की रचना कर डाली जिसे सर्वप्रथम लव व कुश को पढ़ाया गया। वाल्मीकि ने इस महाकाव्य में 24 हज़ार श्लोक रचे जो 500 सर्ग तथा सात काण्ड में संकलित हैं।

रामचरितमानस और वाल्मीकि
गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी मानस रामायण के आधार पर ही रची किंतु उसके उत्तरकाण्ड में सीता के त्याग की कथा नहीं है। इसलिए मानस में वाल्मीकि की उपस्थिति संक्षिप्त है मगर राम के वनवास काल में उनकी वाल्मीकि से भेंट का अद्वितीय चित्र तुलसी ने अयोध्याकाण्ड में खींचा है।
वाल्मीकि रामायण में राम को चित्रकूट निवास का मार्गदर्शन महर्षि भारद्वाज ने दिया है जबकि अपनी मानस में तुलसी ने यह मार्गदर्शन वाल्मीकि से दिलवाया है।

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