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  • Maharishi Vishwamitra Is The Paradigm For Accomplishment With Determination, First Was The King And Then After Gaining Knowledge And Made A Place Among The Saptarishis

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ऋषि परम्परा:संकल्प से सिद्धि के प्रतिमान हैं महर्षि विश्वामित्र, पहले थे राजा और फिर ज्ञान प्राप्त कर सप्तऋषियों में बनाया स्थान

डॉ. विवेक चौरसिया8 दिन पहले
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  • भारतवर्ष में ऋषियों और संतों की सुदीर्घ महान परम्परा है। उनके तप, ज्ञान और कर्म के बल पर ही सनातन भारतीय संस्कृति की धारा सतत प्रवाहमान है।
  • उनकी उपलब्धियां केवल अध्यात्म तक सीमित नहीं हैं वरन सांसारिक लोगों को जीवन का मार्ग भी दिखाती हैं।
  • हमारे नए स्तम्भ के माध्यम से ऋषि परम्परा का यह प्रकाश अहा! ज़िंदगी के पाठकों के जीवन को नियमित रूप से आलोकित करेगा।
  • इस स्तम्भ का श्रीगणेश विश्वामित्र से।

भारतीय ऋषि परम्परा में ऋषि, महर्षि, देवर्षि, ब्रह्मर्षि तो अनेक हैं, लेकिन विश्वामित्र केवल और केवल एक ही हैं। सूर्य तक की आभा को लज्जित कर देने वाले अपने परम तेजस्वी व्यक्तित्व और कृतित्व के साथ विश्वामित्र तीन युगों की त्रिवेणी के प्रत्येक तट पर उपस्थित हैं।

सप्तऋषियों में सर्वोपरि विश्वामित्र ने अपनी संकल्प शक्ति और साधना के बल पर एक राजा से ब्रह्मर्षि के महान पद को प्राप्त किया। यह उपलब्धि हर युग में हर पीढ़ी को इस बात की प्रेरणा देती है कि मनुष्य की क्षमताएं असीम हैं। यदि वह ठान ले तो विश्वामित्र की तरह न केवल नया स्वर्ग रच सकता है, बल्कि मनुष्य होकर देवताओं का पूज्य भी बन सकता है।

एक ओर विश्वामित्र सप्तर्षियों की परंपरा में परिगणित प्रमुख ऋषि हैं तो दूसरी ओर वैदिक काल में सर्वप्रमुख वेद ऋग्वेद के अनेक मंत्रों के द्रष्टा हैं। ऋग्वेद के तीसरे मंडल के 62वें सूक्त का दसवां मंत्र इन्हीं महान विश्वामित्र द्वारा सृजित है जो लोक में गायत्री मंत्र के नाम से प्रसिद्ध और सर्वफलदायक है। ऋग्वेद के सभी दस मंडलों में विश्वामित्र के सूक्त और मंत्र हैं, जबकि तीसरा मंडल तो समूचा ही विश्वामित्र और उनकी कुल व शिष्य परम्परा कृत है। इनमें सबसे मूल्यवान विश्वामित्र कृत गायत्री मंत्र है और दूसरा विश्वामित्र-नदी-संवाद सूक्त। विश्व साहित्य में नदियों से मनुष्य का यह पहला संवाद है जो ऋग्वेद के तीसरे मंडल के 33वें सूक्त में दर्ज है। इसके ऋषि विश्वमित्र और देवता नदी है। इसमें विपाशा (व्यास) और शुतुद्री (सतलुज) नदियों से ऋषि ने पंक्ति, उष्णिक और त्रिष्टुप छंद में मधुर और प्रेरक काव्यात्मक बात की है। यह विश्वामित्र की सहृदयता का प्रतीक तो है ही, धरती पर जीवन के पर्याय जल की मनुष्य जाति की ओर से की गई वंदना का भी द्योतक है, जिसकी जोड़ की दूसरी रचना दुर्लभ है।

विश्वामित्र की कामधेनु
अनेक विद्वान मानते हैं कि वैदिक विश्वामित्र और महाकाव्यों व पुराणों के विश्वामित्र भिन्न हैं। परवर्ती विश्वामित्र और उनसे जुड़ी असंख्य कथाएं वेदों के मंत्र द्रष्टा विश्वामित्र की संतानों और शिष्यों की हैं जो विश्वामित्र की परंपरा में होने के कारण ही ‘विश्वामित्र’ मान लिए गए। सम्भवतः ऐसा ही हो, मगर इतना तो तय है कि इन कथाओं में भी आज की पीढ़ी के लिए जीवन-सूत्र सुलभ हैं।
इन कथाओं में सबसे चर्चित कथा कामधेनु को लेकर विश्वामित्र का वसिष्ठ से महाद्वंद्व है जिसे रामायण से महाभारत तक और अनेक पुराणों में अनेक रूपों में गाया गया है। सर्वाधिक सुंदर वर्णन वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में है जहां विश्वामित्र के साथ जनकपुरी पहुंचने पर महातेजस्वी शतानंदजी ने श्रीराम-लक्ष्मण को विश्वामित्र का ‘पूर्व चरित्र’ सुनाया है। इस कथा के अनुसार, विश्वामित्र पहले एक धर्मात्मा राजा अर्थात क्षत्रिय थे जिन्होंने तपस्या के द्वारा ब्राह्मणत्व प्राप्त किया। उनके परदादा कुश प्रजापति के पुत्र थे। कुश के पुत्र कुशनाभ और कुशनाभ के पुत्र गाधि नाम से विख्यात हुए। विश्वामित्र इन्हीं गाधि की संतान थे। एक बार वे विचरते हुए सेना सहित महर्षि वसिष्ठ के आश्रम पहुंचे। वसिष्ठ के पास पलभर में मनोवांछित इच्छाओं की पूर्ति करने वाली दिव्य गाय कामधेनु थी, जिसने वसिष्ठ की आज्ञा से देखते ही देखते सेना सहित सभी के लिए सुस्वादु और पौष्टिक भोजन का प्रबंध कर दिया। यह देख राजा विश्वामित्र का मन कामधेनु पर आ गया और उन्होंने वसिष्ठ ने वह गाय मांगी। वसिष्ठ के मना करने पर वे ज़िद पर अड़ गए और बलपूर्वक गाय को साथ ले जाने लगे।
तब वसिष्ठ की आज्ञा से गाय ने अपने शरीर से शक, यवन, पह्लव, काम्बोज और बर्बर आदि जाति के असंख्य वीरों की सृष्टि की जिन्होंने विश्वामित्र के सौ पुत्रों सहित पूरी सेना का संहार कर डाला। कथा बताती है कि तब विश्वामित्र को आभास हुआ कि बाहुबल के सामने ब्रह्मबल बड़ा है, अतः कामधेनु को पाने की होड़ में उन्होंने राज्य का त्याग कर दिया और ब्रह्मबल की प्राप्ति के लिए महान तपस्या शुरू की।
विश्वामित्र ने हिमालय जाकर तप से शिव को प्रसन्न किया और दिव्यास्त्र प्राप्त कर अभिमान में चूर होकर पुनः वसिष्ठ पर धावा बोल दिया। उन्होंने सारे दिव्यास्त्र चलाए मगर वसिष्ठ ने अपने ब्रह्मदण्ड से उन सबका शमन कर दिया। तब पराजित होकर विश्वामित्र ने पुनः कठिन तप प्रारम्भ किया।

त्रिशंकु और नए स्वर्ग का निर्माण
विश्वामित्र उत्तर दिशा छोड़कर दक्षिण में चले आए और कठोर तप से ब्रह्माजी को प्रसन्न किया। तब ब्रह्मा ने उन्हें ‘राजा’ से ‘राजर्षि’ मान लेने का वरदान दिया। लेकिन विश्वामित्र को तो वसिष्ठ की तरह ‘ब्रह्मर्षि’ बनना था। राजर्षि के पद से असंतुष्ट हो उन्होंने फिर स्वयं को तप में झोंक दिया। इसी समय एक ऐसी घटना हुई जिसने विश्वामित्र-वसिष्ठ की लड़ाई में आग में घी का काम किया। उन दिनों श्रीराम के पूर्वज इक्ष्वाकु कुल के राजा त्रिशंकु राज करते थे। वसिष्ठ उनके कुलगुरु थे। त्रिशंकु की कामना थी वे सशरीर स्वर्ग जाएं और इस मनोरथ सिद्धि के लिए वसिष्ठ कोई विशेष यज्ञ करा दें। मगर वसिष्ठ ने इसे असम्भव बताकर त्रिशंकु को रवाना कर दिया। खिन्न त्रिशंकु वसिष्ठ के सौ पुत्रों के पास पहुंचे और उनसे ऐसा यज्ञ कराने की प्रार्थना की। जब सभी ने भी असहमति जताई तो त्रिशंकु ने इच्छा पूरी करने के लिए किसी दूसरे की शरण लेने की बात कह दी। इस पर क्रोधित हो वसिष्ठ पुत्रों ने त्रिशंकु को शाप दे दिया। तब त्रिशंकु ने विश्वामित्र की शरण ली और विश्वामित्र ने वसिष्ठ को नीचा दिखाने के लिए त्रिशंकु को मनोवांछित यज्ञ कराने का आश्वासन दे दिया।
वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड का 60वां अध्याय साक्षी है कि तपस्या के बल से विश्वामित्र ने त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग पहुंचा दिया। मगर गुरु से शापित त्रिशंकु को देवराज इंद्र ने स्वर्ग में प्रवेश न दिया। परिणामस्वरूप त्रिशंकु स्वर्ग से नीचे की ओर गिरने लगे। तब क्रोधित हो विश्वामित्र ने त्रिशंकु को बीच में ही लटके रहने को कहा और फिर तेजस्वी विश्वामित्र ने यज्ञ में सहायक ऋषि मंडली के बीच दूसरे प्रजापति के समान दक्षिण मार्ग के लिए नए सप्तऋषियों की सृष्टि की तथा क्रोध में भरकर नवीन नक्षत्रों का भी निर्माण कर डाला।
विश्वामित्र इतने उत्तेजित थे कि दूसरे इन्द्र और नए स्वर्ग की रचना को उद्यत हो उठे। तब देवताओं ने उपस्थित होकर उनसे प्रार्थना की और सदेह त्रिशंकु के स्वर्ग जाने को प्रकृति के नियम के विपरीत बताया। इस पर विश्वामित्र शांत तो हुए मगर शर्त रखी कि त्रिशंकु को सदा स्वर्ग का सुख मिले, क्योंकि मैंने इन्हें इसके लिए आश्वस्त किया था और मैंने जिन नए नक्षत्रों का निर्माण किया है वे भी सदा जस के तस बने रहंे। इस पर देवताओं ने ‘तथास्तु’ कहा। तभी से विश्वामित्र के रचे हुए नक्षत्र आकाश में वैश्वानर पथ से बाहर प्रकाशित होते हैं और उन्हीं ज्योतिर्मय नक्षत्रों के बीच त्रिशंकु भी सिर नीचा किए आज तक लटके हुए हैं।

विश्वामित्र, मेनका और रम्भा
त्रिशंकु प्रसंग के बावजूद विश्वामित्र का वसिष्ठ से बैर कम न हुआ था। उन्होंने निरंतर तप कर क्रमशः राजा से राजर्षि, फिर ऋषि और उसके आगे महर्षि का पद प्राप्त कर लिया। मगर वसिष्ठ की भांति ब्रह्मर्षि न हो सके। महाभारत के आदिपर्व की कथा के अनुसार, इसी समय देवताओं ने उनकी तपस्या को भंग करने के लिए अप्सरा मेनका को भेजा, जिससे समागम कर मेनका ने शकुंतला को जन्म दिया। शकुंतला महर्षि कण्व के आश्रम में पली-बढ़ी जहां राजा दुष्यंत से गंधर्व विवाह कर उसने भरत को जन्म दिया। लोक मान्यता में यही भरत आगे चलकर प्रतापी राजा हुआ जिसके नाम पर हमारा देश भारतवर्ष कहलाया। इस अर्थ में भरत विश्वामित्र का नाती था और उस भरतवंश का प्रवर्तक, जिसमें आगे चलकर भीष्म आदि हुए और कौरव-पांडवों के बीच महासमर मचा।
महाभारत की कथा में मेनका द्वारा तपस्या भंग से विश्वामित्र खिन्न होकर हिमालय पर चले गए थे। दूसरी ओर, रामायण की कथा में मेनका के साथ रमण का उल्लेख तो है किंतु शकुंतला के जन्म की बात नहीं है। इतना अवश्य है कि मेनका से मोहित होकर विश्वामित्र को पश्चाताप हुआ और अपने काम पर विजय पाने के लिए उन्होंने कठिन तप किया। रामायण की कथा कहती है कि दूसरी बार तप में विघ्न डालने के लिए इन्द्र ने अप्सरा रम्भा को भेजा, मगर इस बार विश्वामित्र सतर्क थे। उन्होंने शाप देकर रम्भा को पत्थर की प्रतिमा बना दिया और पुनः तपस्यारत होकर अंतत: मनचाहा ब्रह्मर्षि पद पाकर ही माने। अब तो उन्हें कामधेनु का लोभ और वसिष्ठ से प्रतिशोध की भावना भी जाती रही।

लोभ में गंवाया, दान से पाया
विश्वामित्र की कथा का मर्म श्रीराम कथा के उस प्रसंग में निहित है जहां वे अपने यज्ञ की रक्षा के लिए दशरथ के पास श्रीराम को मांगने आते हैं। प्रश्न उठता है कि जिन ऋषि ने अपनी तपस्या से त्रिशंकु को सदेह स्वर्ग भेज दिया था, वे त्रेतायुग में इतने तेजहीन कैसे हो गए कि ताड़का और सुबाहु से अपने यज्ञ की रक्षा के लिए राम की आवश्यकता पड़ी? इसके उत्तर में ही मनुष्य मात्र के लिए विश्वामित्र के जीवन से जुड़ा महान और अनुकरणीय संदेश है। हर व्यक्ति अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए ‘कामधेनु’ का अभिलाषी है। काम की पूर्ति में बाधा से क्रोध उत्पन्न होता है और क्रोध में हम ग़लती पर ग़लती करते जाते हैं। विश्वामित्र ने पहले अहंकार में बलप्रयोग किया और पराजित हुए तो प्रतिशोध में भर गए। लोभ में अपना क्षत्रिय धर्म त्यागा और ब्राह्मण बनने निकले। ब्रह्मर्षि बनने का उनका मनोरथ इसलिए बाधित हुआ, क्योंकि उसके मूल में कल्याण नहीं, प्रतिस्पर्धा की भावना थी। इसी कारण त्रिशंकु अधर में लटक गया और विश्वामित्र मेनका से मोहित होकर काम-कूप में जा गिरे। कामधेनु के मोह में राज्य और सौ पुत्र तो पहले ही गंवा चुके थे, बाद में कठिन परिश्रम से अर्जित तपस्या का क्षय भी करा बैठे।
विद्वानों की मान्यता है कि तपस्या के इसी क्षय के कारण विश्वामित्र ताड़का-सुबाहु आदि से अपने यज्ञ की रक्षा में समर्थ न हो सके। उनके पास दिव्यास्त्रों का भंडार तो था मगर वे सारे शस्त्रास्त्र ‘तेजहीन’ हो चुके थे। जब विश्वामित्र ने श्रीराम को अपने वे सारे दिव्यास्त्र समर्पित किए, उनका खोया हुआ तेज फिर लौट आया। इस तरह राम न राक्षसों का संहार किया, और ‘पाने की ज़िद’ के बजाय लोककल्याण के लिए ‘अपने पास का देकर’ विश्वामित्र भी लोक में पूजे गए। यह सिखाता है कि जब हम ‘पकड़ते’ हैं तो जो पास है वह भी खो जाता है और जब हम ‘देते’ हैं तो जो खो चुका है, वह भी वापस प्राप्त हो जाता है।

नाम का नियम
संधि विच्छेद के मुताबिक़, विश्वामित्र का अर्थ ‘विश्व के शत्रु’ होता है। चूंकि वह नाम है, और जो अपना नाम जैसा लिखता है वही सही होता है, इसलिए ऋषि के नाम के रूप में विश्वामित्र सही है। लेकिन ‘विश्व का मित्र’ के अर्थ में सही शब्द ‘विश्वमित्र’ होगा। पाणिनि ने इसके लिए अलग से एक सूत्र बनाया है, जिसमें ऐसे नामों को मान्यता दी गई है। कालिदास का नाम भी इसी श्रेणी में है, जो काली का भक्त के अर्थ में कालीदास होना चाहिए, किंतु संस्कृत साहित्यकार का नाम कालिदास ही लिखा जाएगा। हरिश्चंद्र को वास्तव में हरिचंद्र होना चाहिए, परंतु पौराणिक राजा हरिश्चंद्र ही रहेंगे।

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