ज्ञानकोश:प्राचीन समय से सुख की खोज में है मनुष्य, इसी सुख के विषय में क्या कहते हैं हमारे प्राचीन ग्रंथ

20 दिन पहले
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  • मोक्ष के अलावा मनुष्य की सबसे बड़ी कामना सुख है। सारा जीवन, सारा उपक्रम, समूचा प्रक्रम प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से इसी कामना की पूर्ति के लिए होता है। बुद्धिमानी कहती है कि सुख की चाह से पहले इसका मर्म समझा जाए...क्या है ये मर्म, ये बताते हैं हमारे प्राचीन ग्रंथ।

विदुर नीति

जो व्यक्ति अकारण घर के बाहर नहीं रहता, बुरे लोगों की संगति से बचता है, व्यभिचार नहीं करता; चोरी, चुगली, पाखंड और नशा नहीं करता, वह सदा सुखी रहता है।

हितोपदेश

अच्छी तरह से पचाया भोजन, ध्यान रखने वाली पत्नी, पढ़ा-लिखा व विद्वान पुत्र, अच्छी तरह सेवा पाने वाला राजा, बहुत सोचकर बोली गई बात और सोच-विचारकर किए कामों में काफ़ी दिनों तक दोष पैदा नहीं होते, अर्थात जीवन के लिए ये सभी सुखद ही सिद्ध होते हैं।

महाभारत

बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि (सुख-दुःख में सदैव समदृष्टि रखकर) सदा दुःख से छूटने का प्रयत्न करे। ध्यान रखे कि प्राणियों को इहलोक हो या परलोक, जो भी सुख मिलता है, वह अनित्य है।

सुभाषित

सभी का कल्याण हो ऐसी भावना रखने वाले व सभी को समान दृष्टि से देखने वाले मनुष्य को सभी दिशाओं से सुख की प्राप्ति होती है। वह सर्वत्र सुख की अनुभूति करता है।

महाभारत

जो श्रद्धालु, जितेन्द्रिय, धनसम्पन्न तथा शुभ कर्म-परायण होते हैं, वे उत्सव से अधिक उत्सव को, स्वर्ग से अधिक स्वर्ग को और सुख से अधिक सुख को प्राप्त करते हैं।

सुभाषित

सारा सुख स्वयं पर निर्भर होता है और सारा दु:ख पराये लोगों पर निर्भर होता है। इस सुख-दु:ख के लक्षण को संक्षेप से जान लेना चाहिए।

रामचरितमानस

ये जो आनंद के समुद्र और सुख के भंडार हैं, जिनके एक कण से तीनों लोक सुखी हो जाते हैं, उनका नाम राम है। वे सुख के धाम हैं और तीनों लोकों को शांति देने वाले हैं।

यक्ष-युधिष्ठिर संवाद - महाभारत

यक्ष– सुखी कौन है?

युधिष्ठिर– जिस व्यक्ति पर कोई ऋण नहीं है, जो दूसरे प्रदेश में नहीं है, जो व्यक्ति पांचवें-छठे दिन भी घर में रहकर साग-सब्ज़ी खा लेता है।

यक्ष– सुख का मुख्य स्थान क्या है?

युधिष्ठिर– सुख का मुख्य स्थान शील है।

यक्ष– सुखों में उत्तम सुख क्या है?

युधिष्ठिर– सबसे उत्तम सुख है संतोष।

यक्ष– किसको त्यागकर मनुष्य सुखी होता है?

युधिष्ठिर– लालच को त्यागकर मनुष्य सुखी होता है।

सुभाषित

जो चीज़ें अधिकार में नहीं हैं, वह सब दु:ख है। जो चीज़ अधिकार में है, वह सब सुख है।

श्रीमद्भगवद्गीता

जो साधक इस मनुष्य शरीर में, शरीर का नाश होने से पहले ही काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही योगी है और वही सुखी है।

हितोपदेश

इस संसार में सतत रूप से आय होना, निरोगी शरीर होना, प्रेमिल और मधुरभाषी जीवनसाथी मिलना, आज्ञा मानने वाली संतान होना और धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष इन 4 पुरुषार्थ को देने वाली विद्या प्राप्त करना- ये 6 सुख होते हैं। इन्हें बटोरने का कोई अवसर नहीं चूकना चाहिए।

सुभाषित

जो व्यक्ति समय-समय पर मन में उत्पन्न हुई आशाओं से अविचलित रहता है, जैसे अनेक नदियों के सागर में मिलने पर भी सागर का जल नहीं बढ़ता, वह शांत ही रहता है। ऐसे ही संयमी व्यक्ति सुुखी हो सकते हैं।

महाभारत

जो सत्य है वही धर्म है। जो धर्म है वही प्रकाश है। जो प्रकाश है वही सुख है। इसी प्रकार जो अनृत अर्थात असत्य है वही अधर्म है। अधर्म ही अंधकार है और अंधकार ही दुःख है।

विदुर नीति

निरोगी रहना, ऋणी न होना, परदेस में न रहना, अच्छे लोगों के साथ मेल होना, अपनी वृत्ति से जीविका चलाना और निडर होकर जीना ये छह इस लोक के सुख हैं।

यजुर्वेद

जो हमारी संतान हैं, वे अमृतस्वरूप परमेश्वर की वेद वाणियों का गुरु चरण में बैठकर श्रवण करें, जिससे कि वे हमारे लिए सुखकर हों।

महाभारत

यदि तुम सबकुछ त्यागकर अनावश्यक वस्तुओं का संग्रह नहीं करोगे तो सर्वत्र विचरते हुए सुख का ही अनुभव करोगे। इसलिए कि जो अकिंचन होता है, जिसके पास कुछ भी नहीं होता, केवल वही सुख से सोता और जागता है।

सुभाषित

किसी पर निर्भर न रहकर ख़ुद से पाई हुई सूखी रोटी भी अपने घर खाने में सुख है।

मृच्छकटिकम्

जिस प्रकार घने अंधकार में प्रज्वलित दीप के दर्शन पाना सार्थक और वांछित होता है उसी प्रकार दुःखों की अनुभूति के बाद ही सुख प्राप्ति के आनंद की अर्थवत्ता है। लेकिन जो मनुष्य सुखों के बाद दुःखों के गर्त में गिरता है वह शरीर धारण किए हुए मृत व्यक्ति के समान होता है।

चरक संहिता

स्वस्थ होना सुख है, रुग्ण होना दु:ख है।

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