• Hindi News
  • Magazine
  • Aha zindagi
  • Morchang's Music Is Pleasing To Humans As Well As The World Of Music, Read This Interesting Story Of Morchang On World Music Day

लोकवाद्य:मनुष्यों के साथ जीव जगत को भी भाता है मोरचंग का संगीत, विश्व संगीत दिवस पर पढ़ें मोरचंग की यह दिलचस्प कथा

लोकेन्द्र सिंह किलाणौत8 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
  • मोरचंग छोटा-सा, पर अद्‌भुत वाद्ययंत्र है। मनमाेहक ध्वनि और वादन की विशिष्ट शैली के चलते यह लोकवाद्य अनूठा हो जाता है। आज 21 जून, विश्व संगीत दिवस के सुअवसर पर पढ़िए राजस्थान की पहचान ‘मोरचंग’ की गाथा।

एक दिन कभी कोई ग्वाला सुबह थैले में कलेवा बांधकर गायें चराने निकला होगा और सुस्ताने के बाद खेजड़ी की छांव में बैठकर उसका बांसुरी बजाने को मन मचल गया होगा। बिना साज़ ही धोरों की तेज़ चलने वाली हवाओं से जुगलबंदी की कोशिश में उसने मारवाड़ की बांसुरी ‘मोरचंग’ को बना डाला। मोरचंग के सृजन को लेकर कल्पनाएं और भी हैं, लेकिन यह निश्चित है कि ये लोक में निर्मित, लोक का वाद्य है। न तो मोरचंग किसी राजा की रंगीन संगीत की शामों तक दस्तक दे पाया और न ही राजदरबार के किसी दरबारी ने अपने आश्रयदाता के सामने मोरचंग के साथ विरुदावली गायन किया।

ख़ैर, यशगान के लिए गाल बजाने होते हैं और मोरचंग की मिठास तब बाहर आ पाती है जब कोई उस्ताद सांसों का समभार बनाते हुए होंठों का वाजिब प्रयोग कर सके।

कृष्ण स्तुति में मोरचंग

श्री कृष्ण द्वारकाधीश बनने के बाद ग्वाले नहीं रहे। यमुना की गायों से कृष्ण के साथ-साथ बांसुरी का मधुर स्वर भी दूर हो गया। राजा बनने के बाद कृष्ण यमुना तट पर बांसुरी छोड़ कुरुक्षेत्र में धर्मयुद्ध का शंखनाद कर रहे थे। तब गायों की मनोदशा देख यमुना की लहरों से दूर रेत की लहरों में किसी ग्वाले ने करुणा में भीगकर गायों को बांसुरी जैसे ही किसी संगीत के मीठे घूंट पिलाने के लिए मोरचंग का आविष्कार कर दिया होगा और श्री कृष्ण की स्तुति में लिखा गया...

बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग,

अतुल रति गोप कुमारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥

बड़े पर्दे पर मोहक ध्वनि

राजदरबारों से ठुकरा दिए जाने के बाद मोरचंग ने बॉलीवुड में दस्तक दी और 1971 में आई फ़िल्म ‘रेशमा और शेरा’ में सुनील दत्त ने वहीदा रहमान के लिए मोरचंग बजाया। इसके बाद दर्शक असमंजस में पड़ गए कि इतना मीठा संगीत किस वाद्ययंत्र का है। मोरचंग को लेकर अचानक उठी जिज्ञासा ने भी एक बड़ा नुक़सान कर दिया और संगीत को समझने वाले लोगों ने इसे सुषिर वाद्य घोषित कर दिया। लिहाज़ा अब तक भी लोगों में यह भ्रांति बनी हुई है कि मोरचंग को फूंक मारकर बजाया जाता है जबकि इसे बजाने के लिए फूंक नहीं बल्कि सांसों का संतुलन होना ज़रूरी है। समय के साथ-साथ संगीत में नवाचार हुए तो हर दौर के संगीत के साथ मोरचंग ने क़दमताल किया।

मशहूर संगीतकार एआर रहमान ने फिल्म ‘दिल से’ के गीत ‘जिया जले’ में मोरचंग से संगीत बनाकर यह साबित कर दिया कि यह वाद्य अद्‌भुत है। प्रसिद्ध अमेरिकी कार्टून ‘टॉम एंड जैरी’ में भी विभिन्न ध्वनियों के लिए मोरचंग का उपयोग किया गया है।

मोरचंग से मोहित हुईं भेड़ें

राजस्थानी संस्कृति के जानकार गजेन्द्र कविया के अनुसार मोरचंग की ध्वनि मनुष्य से अधिक पशुओं को प्रिय है। श्री कविया बताते हैं कि बांसुरी पर गायें मोहित हुईं, पुंगी पर सर्प और सारंगी की ध्वनि सुनकर हिरण सुध-बुध खो बैठते हैं। इसी तरह कालांतर में पश्चिमी राजस्थान के लुहारों ने मरुस्थल के भौगोलिक परिवेश में भेड़ पालन का व्यवसाय शुरू किया। लुहारों के हथौड़ों की आवाज़ सुनकर मासूम भेड़ें भाग जाती थीं। तब लुहारों को समझ आया कि हथौड़े की कर्कश आवाज़ के बजाय कोई मधुर संगीत भेड़ों में एकाग्रता ला सकता है और उसके बाद मोरचंग का आविष्कार हुआ। लुहारों और ग्वालों के बाद मोरपंख के आकार का यह छोटा-सा वाद्य यंत्र जब उस्तादों के पास पहुंचा तो इसने लोक संगीत में अनेक रंग बिखेर दिए।

मोरचंग बजाने वाले बाड़मेर के उस्ताद हाकम ख़ान मांगणियार बताते हैं कि वे लंबे समय से मोरचंग बजा रहे हैं और लोहे के बजाय उन्हें पीतल से बना मोरचंग अधिक प्रिय है, क्योंकि पीतल से बने मोरचंग की ध्वनि अधिक मीठी होती है। वैसे तो मांगणियार कलाकार सब तरह के वाद्य यंत्र बजा लेते हैं, लेकिन मोरचंग किसी भी मांगणियार के पास सुगमता से मिल जाता है क्योंकि छोटे आकार के कारण यह जेब में आ जाता है।

मोरचंग को राजस्थान के लोक में ठीक से समझने के लिए राजस्थानी भाषा के प्रतिष्ठित साहित्यकार आईदान सिंह भाटी का यह दोहा ग़ौर करने लायक़ है...

मुख में लेयर मोरचंग, धवलै धोरै ढाल।

माडधरा रौ मानखौ, गुण गावै गोपाल।

यानी, मांड की धरती का व्यक्ति उजले धोरों के बीच मुंह से मोरचंग बजाकर गोपाल के गुण गाता है (जैसलमेर को मांड क्षेत्र कहा जाता है।)

मोरचंग ही है ज्यूज़ हार्प

आज मोरचंग दुनिया के कई सारे देशों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। नीदरलैंड के एक संगीतज्ञ फोन्स बैक्स ने ‘यहूदी वीणा’ (मोरचंग) के लिए एक हज़ार से ज़्यादा नामों का उल्लेख किया है और पूरे विश्व में ‘ज्यूज़ हार्प’ के नाम से विख्यात यंत्र ही दक्षिण एशिया का मोरचंग है। अनेक देश दूसरे नामों से मोरचंग पर अपना-अपना दावा करते हैं लेकिन यह निर्विवाद सत्य है कि इस वाद्ययंत्र के उद्‌भव और विकास की जड़ें पश्चिम राजस्थान में हैं।

राजस्थान की संगीतजीवी जातियां- लंगा, मांगणियार, भोपे, बंजारे, इसे पेशेवर तौर पर बजाती हैं। इन्हीं जातियों में हर दौर में एक से बढ़कर एक उस्ताद हुए, जिनमें तागाराम भील ने इसे सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान दिलाई।

खबरें और भी हैं...