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शिक्षा:शिक्षा के क्षेत्र में कायम हुई नई मिसालें, अनूठे प्रयोग और नए तरीक़ों से शिक्षकों ने थामी शिक्षा की बागडोर

शिरीष खरे3 महीने पहले
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  • शिक्षा के लिहाज से साल 2020 को देखें तो इस एक साल में जो हुआ, वैसा पहले कभी नहीं हुआ था।
  • इससे पहले कभी दुनिया भर के इतने बच्चों की पढ़ाई एक साथ नहीं रुकी।
  • जहां डेढ़ अरब से ज़्यादा स्कूली बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई है, वहीं छह करोड़ से ज़्यादा शिक्षक भी स्कूलों से दूर रहे।
  • लेकिन जहां चाह, वहां राह वाली मिसाल भी इसी साल सही साबित होती दिखाई दी है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि शिक्षा के नज़रिए से मौजूदा संकट बड़ा है। पिछले दिनों ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ ने कोविड-19 पर अपनी रिपोर्ट सार्वजनिक करके भी इसी बात की पुष्टि की।

संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने बताया कि कोरोना-काल में 165 देशों के स्कूल और अन्य शिक्षा संस्थान बंद रहे। लेकिन यह भी हक़ीक़त है कि इस संकट से उबरने के लिए साल 2020 में जो समाधान ढूंढ़े गए, उनका दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। कहा जा सकता है कि अभूतपूर्व संकट में भी यह शिक्षा के लिए बड़ी सम्भावनाओं का साल है। क्योंकि इस साल शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कई नवाचारों से न सिर्फ़ शिक्षा की दिशा बदलेगी, बल्कि कहीं-कहीं उसके ढांचे में सुधार की गुंजाइश बनेगी। इसके अलावा, शिक्षण की पद्धतियों में हो रहे तरह-तरह के प्रयोगों से शिक्षा के क्षेत्र में और अधिक विविधता और नवीनता देखने को मिल सकती है।

लॉकडाउन लर्नर्स
कोविड-19 वैश्विक महामारी से न सिर्फ़ दुनिया भर के वंचित तबक़े के बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई, बल्कि इस दौरान कई दूसरी क़िस्म की समस्याएं भी उभरकर सामने आईं। इनमें साइबर अपराध, लड़कियों पर हिंसा और उनके साथ होने वाले भेदभाव प्रमुख हैं।

दरअसल, इस साल लॉकडाउन में स्कूल बंद होने से बहुत हद तक बच्चों की जीवनशैली बदली है। इससे उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर हुआ है। हालांकि, लड़के और लड़कियों के शोषण और उनके द्वारा अपनाई जाने वाली कई बुरी आदतों का जोखिम तो पहले से ही रहा है, लेकिन लॉकडाउन के दौरान और उसके कारण यह जोखिम इस साल पहले से अधिक बढ़ गया।

ऐसे में इसी साल ‘यूनाइटेड नेशंस ऑफ़िस ऑन ड्रग एंड क्राइम’ ने भारत में ‘लॉकडाउन लर्नर्स’ नाम से एक शिक्षा आधारित सकारात्मक सीरीज़ शुरू की। यह विभिन्न गतिविधियों पर आधारित ऐसा कार्यक्रम है, जिसमें बच्चों को मानवाधिकार और स्वास्थ्य के मुद्दे पर संवेदनशील बनाया जाता है। इसके अलावा, कई तरह की सूचनाओं तथा ज्ञान के ज़रिए उनकी समझ विकसित की जाती है।

इस तरह, यह औपचारिक शिक्षा से अलग एक ऐसी पहल है, जिसमें कोरोना-काल के तमाम संकटों से निकलने के लिए शिक्षा को बतौर उपकरण चुना गया है। इसमें कड़ी-दर-कड़ी और बहुत आसान तरीक़े से शिक्षण सामग्री को घर-घर पहुंचाने की कोशिश की गई है।

इसके लिए कॉमिक्स और कार्टूनों का अच्छी तरह से इस्तेमाल किया गया है। साथ ही, मुफ्त में कई ऑनलाइन खेल और वीडियो शिक्षकों और उनके छात्रों तक पहुंचाए गए हैं।

हालांकि, इसकी शुरुआत दिल्ली, मुम्बई और बेंगलुरू जैसे महानगरों के कुछ स्कूलों से की गई है, फिर भी यह उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले दिनों में इस सीरीज़ की सामग्री बड़ी तादाद में अन्य शहरों के स्कूलों तक पहुंचेगी। इस तरह, इससे समाज की बुनियादी समस्याओं को लेकर शिक्षकों और उनके छात्रों के बीच एक अच्छा संवाद भी क़ायम होगा।

एक्टिविटी करो ना!
एक अहम बात यह है कि कोरोना-काल के बीच बढ़ती अनिश्चितता के माहौल में ही शिक्षा प्रशासनिक तबक़े ने कई रचनात्मक क़दम उठाए।

इसी कड़ी में विभिन्न राज्यों के प्रशासनिक अधिकारियों ने अपनी-अपनी तरह से कई प्रयास किए। इसी तरह का एक प्रयास जम्मू, कश्मीर और लद्दाख जैसे छोटे राज्यों में भी हुआ।

असल में जम्मू, कश्मीर और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेशों के शिक्षा विभाग और ‘लीगल सर्विसेस अथॉरिटी’ ने स्कूली बच्चों को कई गतिविधियों से जोड़ने के लिए एक कार्यक्रम चलाया। इसे नाम दिया- ‘एक्टिविटी करो ना’!

इसके तहत ऑनलाइन के ज़रिए कई ऐसे गतिविधियां कराई जाती हैं, जिनसे बच्चे सकारात्मक सोचें। इस दौरान तीन साल से पंद्रह साल तक के बच्चों को रचनात्मक कौशल के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इस बहाने न सिर्फ़ उनके भीतर का कलाकार सामने लाने की कोशिश की जाती है, बल्कि इस तरह से उनमें अभिव्यक्ति की भावना भी तैयार कराई जाती है।

‘एक्टिविटी करो ना’ कार्यक्रम में अलग-अलग आयु वर्ग के बच्चे पेंटिंग से लेकर कविता, कहानी, फ़ोटोग्राफ़ी और स्लोगन जैसी गतिविधियों का हिस्सा बनते हैं। इस दौरान वे पर्यावरण, कोरोना महामारी, भारतीय खान-पान, रहन-सहन और संस्कृति के मुद्दों पर चर्चा करते हैं और अपने मत को पहले से ज़्यादा स्पष्ट बनाने की कोशिश करते हैं।

इस कार्यक्रम की ख़ासियत यह भी है कि इससे बच्चों के परिजन भी जुड़ते हैं।

दूरदर्शन शिक्षा
कोरोना-काल में चौबीस घंटे चलने वाले शिक्षा चैनल की ज़रूरत महसूस की जा रही है। वजह यह है कि भारत में सभी छात्रों की पहुंच ऑनलाइन कक्षाओं तक नहीं हो पा रही है। हालांकि, कई संस्थान स्कूली बच्चों के लिए ऑनलाइन माध्यम को अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

लेकिन, हमारे देश की सामाजिक, आर्थिक और काफ़ी हद तक भौगोलिक स्थितियों में बहुत अधिक अंतर होने के कारण यह दूर की कौड़ी लग रहा है।

दूसरी तरफ़, ग़ौर करने वाली बात यह है कि साल 2020 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने अपने चैनल ‘स्वयं प्रभा’ के ज़रिए स्कूली बच्चों तक पहुंच बनाने की कोशिश की है। वहीं, बिहार और उत्तर-प्रदेश जैसे राज्यों में दूरदर्शन के माध्यम से स्कूली बच्चों को शिक्षा देने और उनका मार्गदर्शन करने की पहल हुई है।

उदाहरण के लिए, बिहार-डीडी पर स्कूली बच्चों को ध्यान में रखते हुए पढ़ाई की व्यवस्था तैयार की गई है। इसी तरह, उत्तर-प्रदेश में भी दूरदर्शन पर 10वीं और 12वीं के बच्चों के लिए सुबह-शाम को कक्षाएं चलाई जा रही हैं।

ई-ऑडियो मैगज़ीन
इसी साल राजस्थान के प्राथमिक शिक्षा विभाग ने कुछ गै़र-सरकारी संस्थाओं के साथ मिलकर ‘हवामहल’ नाम से एक ई-मैगज़ीन लांच की। इसका मक़सद स्कूली बच्चों के लिए ऑनलाइन पढ़ाई को आसान बनाना है।

लाइब्रेरी के रूप में बनी ई-मैगज़ीन में प्राइमरी स्तर के बच्चों के लिए उपयोगी ऑडियो फ़ाइल और पिक्चर बुक दी जा रही है। यह मैगज़ीन हर सप्ताह प्रकाशित हो रही है।

इसके ज़रिए स्कूली बच्चों में पढ़ने और सीखने की आदत विकसित की जा रही है। ई-मैगज़ीन में पढ़ाई की रोचकता पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है। बता दें कि ‘हवामहल’ नामक इस ई-मैगज़ीन के अब तक दो दर्जन से अधिक अंक प्रकाशित हो चुके हैं और यह लगभग पचास हज़ार बच्चों और शिक्षकों तक नियमित पहुंचाई जा रही है।

सामुदायिक पुस्तकालय
‘टाटा ट्रस्ट’ और अन्य गै़र-सरकारी संस्थाओं के सहयोग से राजस्थान के ग्रामीण अंचल में ‘पराग लाइब्रेरी व लिट्रेसी’ कार्यक्रम के तहत बच्चों को पुस्तकालय से जोड़े रखने के लिए सामुदायिक लाइब्रेरी का संचालन किया जा रहा है। इस तरह की समुदाय लाइब्रेरी कर्नाटक के ग्रामीण अंचल में भी संचालित हो रही है।

यदि राजस्थान की ही बात करें तो बाली स्थित सामुदायिक पुस्तकालय में कोरोना-काल में हर सप्ताह लगभग साढ़े चार सौ बच्चों के साथ काम किया जा रहा है। साथ ही, बच्चों के लिए पुस्तकें उपलब्ध कराई जा रही हैं।

इसके अलावा कार्यशालाओं के ज़रिए किताब पढ़ने का हुनर सिखाया जा रहा है। साथ ही, बच्चों के लिए रीडिंग थिएटर, चित्रकारी और बुक पास जैसी गतिविधियों का आयोजन किया जा रहा है।

‘टाटा ट्रस्ट’ से प्रतिनिधि नवनीत नीरव बताते हैं कि इस तरह की लाइब्रेरी की एक विशेषता यह होती है कि स्कूलों के बच्चे, शिक्षक और परिजन मिलकर समय-समय पर पुस्तक मेला आयोजित करते हैं।

हर शनिवार किसी एक पुस्तक को पढ़ते हुए उस पर चर्चा करते हैं। इस लाइब्रेरी में बच्चों द्वारा प्राकृतिक रंगों की रंगोली बनाई जाती है और समसामयिक मुद्दों पर सामूहिक चर्चा आयोजित की जाती है। शुरुआत में इस तरह की लाइब्रेरी में सिर्फ़ संस्था के कार्यकर्ता पहुंच रहे थे। लेकिन, अब सरकारी स्कूल के शिक्षक भी पहुंच रहे हैं।

चौपाल क्लास
देश के महानगरों में रहने वाले बच्चों के पास फिर भी सीखने के संसाधन मौजूद हैं। लेकिन सवाल है कि देश के उन हिस्सों में, जहां मोबाइल नेटवर्क की समस्या है, वहां के बच्चे क्या करें? ऐसे में साल 2020 में उत्तर-प्रदेश के सोनभद्र ज़िले के शिक्षकों ने एक मिसाल क़ायम की है।

इन्होंने गांवों में सामाजिक दूरी का ध्यान रखते हुए बच्चों के माता-पिता की मदद से ऐसी चौपाल तैयार की है, जहां कक्षा संचालित हो सके। इस तरह, जहां कोरोना की वजह से स्कूल बंद हैं और मोबाइल भी काम नहीं करता है, वहां शिक्षकों ने ऑनलाइन क्लास का विकल्प खोज निकाला है।

इन चौपालों का महत्त्व इसलिए है कि इनकी बदौलत कोरोना-काल में भी पिछड़े इलाक़ों के बच्चे पढ़ाई से अचानक कट नहीं गए हैं। इस तरह इसे एक सकारात्मक पहल कहा जा सकता है, जो अभावग्रस्त इलाक़ों के स्कूली बच्चों के लिए मॉडल साबित हो सकता है।

नई शालाएं
केरल जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों में शिक्षा का स्तर अच्छा होने के कारण बच्चों को वेबसाइटों के ज़रिए पढ़ाया जा रहा है। इसमें वर्कशीट, रिवीज़न शीट और ऑडियो-वीडियो की सुविधा होती है। इस साइट पर कई यूट्यूब लिंक भी दिए जाते हैं, जिससे बच्चे अपनी सुविधा से पढ़ाई कर सकें।
इसी तरह, आंध्र-प्रदेश में अम्मा ओडी, तेलंगाना में बंगारु बडुलू और कर्नाटक में नम्माबड़ी जैसे नामों से शैक्षिक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

इसी तरह, इस साल कोरोना के दौर में अपने राज्य के बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के लिए ओडिशा ने एक अभिनव प्रयास शुरू किया। इसमें कक्षा पहली से आठवीं तक के स्कूली बच्चों को रेडियो के माध्यम से पढ़ाई कराने की योजना है। यह रेडियो शाला हर सप्ताह सोमवार से शुक्रवार सुबह दस बजे से प्रसारित की जा रही है।

इसके अलावा, साल 2020 में शिक्षा के मुद्दे पर सबसे अधिक विमर्श हुआ। वजह थी कि कोरोना वायरस को नियंत्रण में रखने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के बाद सोशल मंचों पर ऑनलाइन व्याख्यानों का सिलसिला शुरू हुआ और बड़ी संख्या में वक्ताओं को बहुत बड़ा अवसर मिला। इससे शिक्षा के क्षेत्र में अलग-अलग मुद्दों पर कार्य करने वाले व्यक्ति आपस में एकजुट हुए और उन्होंने परस्पर एक-दूसरे के अनुभवों को बांटा।

इस लिहाज़ से साल 2020 में ‘भारत की नई शिक्षा-नीति’, ‘एक समान स्कूल प्रणाली’, ‘ऑनलाइन शिक्षा के नफ़े-नुक़सान’, ‘शिक्षा के अधिकार क़ानून’, ‘सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली’ और ‘शिक्षा में मातृभाषा की भूमिका’ जैसे विषयों पर लगातार गोष्ठियां आयोजित की गईं।

( लेखक सरकारी स्कूलों पर आधारित पुस्तक 'उम्मीद की पाठशाला' के लेखक हैं।)

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