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  • Not Only Humans, Animals And Birds Also Keep Social Distance Among Themselves, They Become 'quarantine' When Needed.

रोचक:सिर्फ़ मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षी भी रखते हैं आपस में सामाजिक दूरी, ज़रूरत पड़ने पर हो जाते हैं 'क्वारंटाइन'

संजीव शुक्ल6 दिन पहले
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  • मान्यता है कि जानवर तो जानवर ही होते हैं। वे अपनी ज़रूरतों और स्वार्थ-पूर्ति के अलावा कुछ नहीं जानते।
  • लेकिन हाल के अनुसंधानों ने इस मान्यता को ग़लत साबित किया है।
  • जानवर अपनी प्रजाति को बीमारी से बचाने के लिए त्याग की जिस सीमा तक जाते हैं...
  • हम मनुष्य उस बारे में सोच भी नहीं सकते।

ग़ैर-मानव प्रजातियों अर्थात पशु-पक्षियों को ये सहज ज्ञान होता है कि बीमारी के समय अपनी प्रजाति या झुंड से दूर रहना चाहिए (सोशल डिस्टेंसिंग), वरना इससे उनकी सम्पूर्ण प्रजाति का नाश हो सकता है। मनुष्य ने समय-समय पर महामारियों के समय पर यह बोध पाया है और स्वयं को क्वारेंटाइन करने की ज़रूरत समझी है। हाल के दिनों में ये ज्ञान कोविड-19 महामारी के दौरान और विश्वव्यापी बना। लेकिन फिर भी मनुष्य यदा-कदा इसकी अवहेलना करने से नहीं चूकता। जबकि जानवर सामाजिक दूरी को लेकर ना केवल सचेत रहते हैं, बल्कि इसके लिए अलग-अलग तरीक़े भी अपनाते हैं। चमगादड़ों की 1,400 प्रजातियों में से एक वैम्पायर बैट बीमारी के समय निष्क्रिय सामाजिक दूरी (पैसिव सोशल डिस्टेंसिंग) अपनाते हैं। ये प्रजाति स्तनधारी जीवों का ख़ून चूसती है। चंूकि ख़ून में बहुत ज़्यादा पोषक तत्व नहीं होते और वह आसानी से मिलता भी नहीं है अत: झुंड में रहने वाले ये चमगादड़ आपस में भोजन बांटते हैं जिसके लिए एक-दूसरे के मुंह से मुंह लगाना पड़ता है। ये अन्य जानवरों की तरह एक-दूसरे के शरीर को भी चाटते हैं (सोशल ग्रूमिंग)।

सोशल ग्रूमिंग से परहेज़
इस वर्ष मार्च में ‘साइंस’ नामक जर्नल में छपे एक शोध में बताया गया कि जब कोई चमगादड़ बीमार पड़ता है तो वह झुंड से अलग होकर स्वयं को तब तक के लिए अकेला कर लेता है जब तक कि वह पूरी तरह ठीक न हो जाए। इसे ही पैसिव सोशल डिस्टेंसिंग कहते हैं।
अप्रैल में ‘प्लौस वन’ जर्नल में छपे लेख में बताया गया कि मैनड्रिल बंदरों में सोशल ग्रूमिंग जहां आपसी संबंधों को मज़बूत बनाने के लिए ज़रूरी है, वहीं समाज में ओहदे और रुतबे को भी प्रदर्शित करती है। अत: ये उनके सामाजिक जीवन का बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू है। लेकिन जब किसी बंदर के पाचन-तंत्र में परजीवियों का प्रकोप होता है और उसकी तबियत ख़राब हो जाती है तो वह ग्रूमिंग की अपनी आदत को स्वस्थ होने तक के लिए रोक देता है ताकि उसकी बीमारी दूसरों को न लगे। दूसरे बंदर भी उससे दूरी बना लेते हैं।

चतुर चींटियों की दुनिया
दुनिया में चींटियों की लगभग 20,000 प्रजातियां हैं। जिन प्रजातियों का अध्ययन किया गया है, उनके बारे में कहा गया है कि ये सक्रिय सामाजिक दूरी (एक्टिव सोशल डिस्टेंसिंग) का पालन करती हैं। जैसा कि सर्वज्ञात है, चींटियां झुंड में रहती हैं, ऐसे में यदि कोई चींटी संक्रामक बीमारी से पीड़ित हो जाए तो सारे झुंड का विनाश हो सकता है। ऐसे ख़तरे से बचने के लिए कई प्रजातियों ने क्रमिक विकास के ज़रिए समाज में सक्रिय सामाजिक दूरी को अपनाया है। यहां बीमार चींटी झुंड को ही त्याग कर अलग हो जाती है। इसका अर्थ स्वयं को मौत के मुंह में ढकेलना होता है क्योंकि चींटियां झुंड के सहयोग के बिना लाचार होती हैं। ये कहना ग़लत नहीं होगा कि चींटिंयां अपनी कॉलोनी के लिए अपना बलिदान देने से भी नहीं हिचकतीं।

झींगे : जोख़िम से परवाह नहीं
कुछ ग़ैर-मानव प्रजातियां ऐसी भी हैं, जो सामाजिक दूरी बनाने के लिए दूसरा तरीक़ा अपनाती हैं। कैरेबियन स्पाइनी लॉब्स्टर (झींगे की एक क़िस्म) के झुंड में यदि कोई बीमार हो जाए तो स्वस्थ सदस्य अपने छिपने की जगहों और झुंड को त्यागकर अलग हो जाते हैं ताकि स्वयं को बचा सकें। ये बात अलग है कि कई बार ये रणनीति भारी पड़ती है क्योंकि वे अन्य शिकारी जीवों के निशाने पर आ जाते हैं। लेकिन घातक वायरसों से बचने के लिए उन्हें ये जोख़िम कम ख़तरनाक लगता है।

मधुमक्खियों का अनुशासन
मधुमक्खियों की बात थोड़ी अलग है। उनके यहां ज़्यादा ही सचेत क़दम उठाए जाते हैं, क्योंकि समाज के सदस्यों और रानी मक्खी की सुरक्षा सर्वोपरि है जिसके लिए वे कुछ भी कर सकती हैं। जब भी किसी बीमार मक्खी का पता चलता है तो उसे बख़्शा नहीं जाता। अन्य मक्खियां उसे मार-मारकर छत्ते से बाहर धकेल देती हैं और वह वापस नहीं आ सकती।

चमगादड़ों को दोषी मानना ग़लत
कोविड-19 महामारी के बाद से हर शख़्स चमगादड़ों को बीमारियों के लिए दोषी मानने लगा है, जबकि वास्तविकता कुछ और ही है। ‘एनल्स ऑफ़ दि न्यूयॉर्क एकेडमी ऑफ़ साइंस’ में प्रकाशित एक ताज़ा लेख में सगोल स्कूल ऑफ़ न्यूरोसाइंस के प्रमुख प्रो. योस्सी योवेल का कहना है कि सामान्य हालात में चमगादड़ों से मनुष्यों में बीमारी फैलाने की आशंका लगभग नहीं के बराबर होती है। कारण, गुफाओं आदि में रहने वाले चमगादड़ सामाजिक दूरी के सिद्धांत के तहत स्वयं को झुंड से अलग कर अपने निवास स्थान तक ही सीमित रहते हैं और बाहर भी नहीं निकलते। ऐसे में वे मनुष्यों को संक्रमित कैसे कर सकते हैं? इन तथ्यों के मद्देनज़र उनके ज़रिए बीमारी मनुष्यों तक तभी पहुंच सकती है जब या तो मनुष्य उनके आवास में घुसें, या चमगादड़ों के सीधे सम्पर्क में आएं या उनका मांस खाएं जैसा कि कुछ देशों में होता है। ऐसे में बेचारे चमगादड़ों का क्या दोष?

सामाजिक दूरी बहुत ज़रूरी
अंत में यही कहा जा सकता है कि चाहे चींटियां हों, कैरेबियन स्पाइनी लॉब्स्टर या मनुष्य- बीमारी की हालत में सामाजिक दूरी के सिद्धांत का कोई विकल्प नहीं है। यदि स्वयं को, परिवार को, दोस्तों व रिश्तेदारों को बीमारी से बचाना है तो सामाजिक दूरी के सिद्धांत को मानना ही होगा।

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