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  • Planted And Saved More Than 50 Lakh Saplings Across The Country, Dr. Pranab Mukherjee Was Awarded The Epithet Tree Man Of India

अहा! अतिथि:देशभर में लगाए और बचाए 50 लाख से अधिक पौधे, डाॅ. प्रणव मुखर्जी ने ट्री मैन ऑफ़ इंडिया के विशेषण से नवाजा था

एम. असलम13 दिन पहले
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  • बचपन में विष्णु को गांव के बुज़ुर्ग प्यार से पौधा चोर पुकारते थे। आज वही विष्णु युवा होकर देश का ट्री मैन बन गया है। उन्हें इस विशेषण से नवाज़ा था पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने।
  • विष्णु पिछले 27 वर्षों से तन-मन से अपने लक्ष्य के लिए मेहनत कर रहे हैं ताकि अधिक से अधिक पौधारोपण का कार्य किया जा सके, अधिक से अधिक वृक्षों को बचाया जा सके। आज उनके और उनकी संस्था श्रीकल्पतरु द्वारा लगाए और बचाए गए वृक्षों की संख्या 50 लाख के पार हो चुकी है।
  • ट्री मैन विष्णु लांबा इस बार हमारे अहा! अतिथि हैं। पढ़िए उनकी कहानी राजस्थान के टोंक ज़िले में दैनिक भास्कर संवाददाता एम. असलम की ज़ुबानी।

जयपुर का टोंक रोड क्षेत्र। यहां एक 6 बाय 6 का कमरा है। बिछावन के नाम पर कमरे में एक दरी है। न कोई गद्दा और न कोई रजाई। हां, ज़रूरत की चीज़ों के नाम पर दो कम्बल ज़रूर हैं। एक पानी पीने का तुम्बा है, मिट्‌टी और लकड़ी के कुछ बर्तन हैं। कोई पंखा, कूलर, फ्रिज, टीवी आदि सांसारिक वस्तुएं, कुछ नहीं। यह श्रीकल्पतरु संस्थान का कार्यालय है। एक ग़ैर सरकारी संगठन। संस्था के क़रीब साढ़े सात लाख नामांकित सदस्य देश के 22 राज्यों में नि:स्वार्थ भाव से कार्य कर रहे हैं। यहां रहने वाले प्रकृति के साधक तपस्वी का नाम है विष्णु लाम्बा। वे ही इस संस्थान के संस्थापक हैं। इस कमरे से संस्थान की सारी गतिविधियां संचालित होती हैं। यही उनका निवास है। विष्णु कहते हैं कि कमरा बहुत बड़ा है। वास्तविकता भी यही है कि यह कमरा बहुत विशाल और भव्य है, क्योंकि यहां से संचालित होने वाला कार्य इतना वृहद है कि यहां से 50 लाख पेड़ों को जीवन मिला है, और अब ये पेड़ संसार में प्राण फूंक रहे हैं।

नाम में जुड़ा है गांव
राजस्थान के टोंक ज़िला मुख्यालय से क़रीब 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है लाम्बा गांव। यही है विष्णु का जन्मस्थान और कर्मस्थान। विष्णु की उम्र 33 वर्ष है और उन्हें अनुभव है 27 वर्ष का। इतनी कम उम्र में इतने अनुभव के बारे में विष्णु बताते हैं कि वे 9वीं कक्षा में ही घर छोड़कर निकल आए थे।
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उन्हें पर्यावरण के क्षेत्र में किए गए कार्य को देखते हुए वृक्षपुरुष के ख़िताब से नवाज़ा था।
महाराष्ट्र सरकार के मंत्री ने उन्हें ग्रीन आर्मी का एम्बेसेडर नियुक्त किया था।
हाल ही में अंतरराष्ट्रीय प्रसारण डीडब्ल्यू जर्मन ने पर्यावरण के क्षेत्र में उनकी सफलता पर एक स्टोरी तैयार की है, जो 30 भाषाओं में कई एपिसोड के माध्यम से प्रसारित हो रही है।

आदर्श गांव का सपना
विष्णु को बचपन से पौधे लगाने का शौक़ था। इसी जुनून के कारण उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के लिए कई सालों से घर-बार तक छोड़ रखा है। विष्णु आदर्श स्कूल की तरह ही पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में आदर्श गांव का सपना देखते हैं।
केमिकल युक्त सिंदूर के स्थान पर प्राकृतिक सिंदूर हो या फिर बरगद के पत्तों से बनी पत्तल, श्रीकल्पतरु संस्थान के माध्यम से ट्री मैन लाम्बा ने लोगों को इको फ्रेंडली रोज़गार उपलब्ध कराने के प्रयास के साथ ही देश के 100 गांवों को पर्यावरण की दृष्टि से आदर्श ग्राम बनाकर 5 करोड़ पौधे लगाकर उन्हें संरक्षित करने का संकल्प ले रखा है।

विश्वस्तर पर मिली पहचान
विष्णु के कार्यों और उनके योगदान को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र के पूर्व एनवायरमेंट एक्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर एरिक सोल्हेम ने दो बार ट्वीट करके उनके कार्यों के सम्बंध में बधाई दी और शुभकामना संदेश भेजा।
विष्णु अपने घर के बाड़े के साथ कई जगह पौधे तैयार करके उन्हें लगाने का कार्य करते हैं। बच्चे के जन्मदिवस पर उनकी संस्था पांच पौधे देने की परम्परा भी डाल रही है। उन्होंने अपने भाई की शादी में दहेज़ की जगह कल्पवृक्ष के दो पौधे मांगे थे, लेकिन उन्होंने एक ट्रैक्टर भर कर पौधे दिए।

गांव से शुरू हुआ सफ़र
विष्णु कहते हैं- हमारे गांव में छोटी-सी एक नर्सरी थी। उसी से बचपन में पौधे चुराकर लाया करता था। वही मेरे लिए विश्व की सबसे बड़ी नर्सरी है। तब मैंने सोचा कि गांव में एक बढ़िया नर्सरी होनी चाहिए। मैंने गांव वालों से कहा कि जब भी किसी के घर शिशु जन्म ले, काेई ख़ुशी का मौक़ा हो या पूर्वजों की पुण्यतिथि हो, तब गांव में एक पौधा ज़रूर लगाया जाए। लेकिन पता चला कि गांव में ज़रूरत एक बोरवेल की है तो गांव में बोरवेल हुआ। आज गांव में पौधारोपण के प्रति हर व्यक्ति सजग है।
विष्णु बताते हैं- वर्ष 2007 की बात है। जगदगुरु शंकराचार्य विश्व गौ ग्राम यात्रा लेकर आए थे। तब किसी ने मेरा उनसे परिचय करवाया। वे बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने मुझे शाम को 4 बजे बुलाया, मैं 3 बजे ही पहुंच गया। जब महाराज जी आए तो उन्होंने मेरे गले में एक धोती डाली और अपने पास से निकालकर 4-5 छोटे-छोटे बीज देकर आगे बढ़ गए। पड़ोस में एक ख़ाली जगह थी। मैंने वो बीज उस ख़ाली ज़मीन में डाल दिए, और डालकर मैं तो भूल गया। कुछ समय बाद पौधे स्वत: इतने बड़े हो गए कि उन पर फल आ गए। पता चला कि वे सिंदूर के बीज थे। तब मुझे प्राकृतिक सिंदूर की अहमियत का भान हुआ।

पर्यावरण का सजग प्रहरी
विष्णु ने न सिर्फ़ पौधारोपण का कार्य बड़े पैमाने पर किया है बल्कि वे और उनकी संस्था पर्यावरण से जुड़े अन्य मुद्दों पर भी कार्य करती है जैसे पेड़ काटने और जीव हत्या का विरोध, नदी एवं जल संरक्षण आदि। और यदि वे कहीं पर कोई गड़बड़ पाते हैं तो क़ानूनन कार्रवाई से भी पीछे नहीं हटते हैं।
विष्णु को उन लोगों से कोफ़्त होती है, जो पर्यावरण दिवस पर सोशल मीडिया पर पौधारोपण की तस्वीर डालकर इति कर लेते हैं। उनका मानना है कि यदि आप पर्यावरण संरक्षण के प्रति सजग हैं तो इस वर्ष के पौधारोपण तथा पिछले वर्ष किए पौधारोपण में कितनी बढ़ोतरी हुई दोनों की तस्वीरें ज़िम्मेदार लोग डालें।

इकोफ्रेंडली गांव
विष्णु बताते हैं कि हम गैर सरकारी संस्था ज़रूर हैं किंतु आजतक न तो हमने किसी सरकार से कोई चंदा लिया न ही कोई सरकार हमें चंदा देने आई। हमारा संकल्प है कि देश के 100 गांवों को इकोफ्रेंडली गांव बनाना है, वह भी ‘भारत’ के रास्ते से, ‘इंडिया’ के रास्ते से नहीं। इन दोनों में बहुत फ़र्क है। एक नीम का पेड़ इंडिया के लिए ‘ट्री' है लेकिन भारत के लिए यह परमात्मा का स्वरूप है। प्रकृति को परमात्मा के रूप में देखना हमारी संस्कृति की व्यापकता है।

मां की सीख से जगी अलख
विष्णु कहते हैं कि —

मेरी प्रथम गुरु मां ही है। उन्होंने ही बचपन में रामायण व महाभारत पढ़ाई, जिससे मुझे बहुत सीख मिली। बचपन से ही रुझान ऐसा बना कि प्रकृति व संस्कृति जीवन का मक़सद हो गई। जब भगवान श्रीराम वनवास गए, तो वहां पर कुटिया बनाने से पहले उन्होंने पांच पौधे लगाए थे। पंचवटी में पौधे लगाए। जब लंका विजय की तो अयोध्या में बड़े पैमाने पर पौधारोपण किया गया। इसका ज़िक्र कई प्राचीन ग्रंथों में मिलता भी है। इससे पौधे लगाने की महत्ता का ज्ञान हुआ।

बनास नदी के किनारे संन्यासी जीवन

विष्णु लाम्बा बतलाते हैं कि —

बचपन में पढ़ाई-लिखाई की तरफ़ मेरा अधिक रुझान नहीं था, लेकिन पेड़-पौधों और साधु-संन्यासियों के प्रति हमेशा से झुकाव रहा है। माता सुशीला देवी ने बचपन में रामायण और महाभारत की कथाओं का ज्ञान कराया। पिता श्रवणलाल शर्मा गांव में स्थित चारभुजा मंदिर के महंत हैं। पढ़ाई में कमज़ोर होने के कारण पिता ने गांव के तालाब किनारे स्थित बालाजी मंदिर के संत रामचंद्रदास महाराज के पास भेज दिया। इसके बाद संन्यास की ओर चल पड़ा। टोंक में बनास नदी के किनारे संत कृष्णदास फलाहारी बाबा का सान्निध्य मिला और उनसे दीक्षा लेने की ज़िद करने लगा। लेकिन बाबा ने कहा कि तुम्हें बिना भगवा धारण किए ही बहुत बड़ा काम करना है। इसके बाद साधु दीक्षा लेने का विचार त्याग दिया।

सवाल-जवाब

भगवान राम जहां भी गए, पौधे लगाए थे...
पेड़ों के लिए काम करते-करते यह स्वाभाविक ही है कि कोई व्यक्ति हवा-पानी के जितना सहज-सरल हो जाए।
अहा! ज़िंदगी के लिए रोहित चेडवाल ने जब विष्णु लाम्बा से बातचीत की तो वैसा ही महसूस भी हुआ। पाठकों के लिए उस बातचीत के मुख्य बिंदु प्रस्तुत हैं :

पर्यावरण संरक्षण का कारवां कहां से शुरू हुआ ?
— मैं सात साल का था तब मां के साथ हैंडपंप पर पानी भरने जा रहा था। वहां पर रेवड़ी पर एक आम का पौधा लगा हुआ था। मैंने मां से उसको लेने के लिए कहा। मां मेरी भावना समझ गईं। वे उसको अपनी लुगड़ी में बांधकर मेरे लिए घर ले आईं। उस दिन मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। मैंने अपने बाड़े में उसे लगाया। तब से ही हालत ये हो गई कि आम सहित कई पौधे ढूंढने लगा और उसे लाकर अपने बाड़े में लगा देता। हालांकि उस समय के लगाए पौधे बड़े नहीं हो पाए। लेकिन हालत ये हो गई कि पौधे इधर-उधर से चुराकर भी लाने लगा। तब से पौधों के प्रति इतना लगाव हुआ कि वो अब तक बना हुआ है।

पौधे लगाने का जुनून कब और कैसे शुरू हुआ ?
— टोंक ज़िले के मेहंदवास थाना क्षेत्र से तीन किलोमीटर दूरी पर बसे लाम्बा गांव में 3 जून 1987 को मेरा जन्म हुआ। सात साल की उम्र से ही अपने बाड़े (घर के पास स्थित जानवर रखने की जगह) में तरह-तरह के पौधे लगाना शुरू कर दिए। पौधे लगाने का इतना जुनून सवार रहता था कि किसी के भी घर और खेत से पौधा चुराने में ज़रा-सी भी देर नहीं करता।

पौधे लगाने का अभियान कैसे शुरू हुआ ?
— नागौर के बडू गांव किसी कार्य से जाना हुआ। वहां हरियाली अमावस्या पर कल्पवृक्ष का मेला लगता था। इस क्षेत्र की परम्पराओं का अध्ययन कर वहां के लोगों के सहयोग से इस क्षेत्र को हमारी संस्था कल्पतरु ने आदर्श गांव बनाने का सोचा। उसके बाद टोंक के लाम्बा व दौसा जि़ले के सेतला गांव काे आदर्श गांव बनाने के लिए वहां हजारों पौधे लगाए तथा लगवाए। हमारा संकल्प है कि हम देश के 100 गांवों को प्राकृतिक दृष्टि से आदर्श गांव बनाएं तथा 5 करोड़ पौधारोपण करें। इस अभियान के तहत रावण की जन्मस्थली मानी जाने वाली बिसरख को भी आदर्श गांव बनाने के लिए प्रयास जारी हैं।

आपको गांव वाले पौधाचोर कहते थे। आख़िरी बार पौधा कब चुराया था ?
— छठी कक्षा में था तब ताऊजी के साथ गांव से जयपुर आ गया। आते ही सबसे पहले जयपुर कलेक्टर के घर चोरी की। हम जहां रहते थे, उसके पीछे ही कलेक्टर साहब का मकान था। उस मकान में कौन रहता था यह तो मैं नहीं जानता था, लेकिन मैं इतना जानता था कि वहां सुंदर-सुंदर पौधे हैं। एक रात मैं बहाने से बाहर आया आैर तुरंत दौड़कर उस मकान की आेर गया। मकान की दीवार कूदकर अंदर घुस गया। दीवार के चारों तरफ़ तार लगा हुआ था, उससे मेरे पैर में भी चोट आई, ख़ून भी निकला। लेकिन मुझे तो पौधे चाहिए थे। यक़ीनन मैंने ऐसे पौधे ज़िंदगी में नहीं देखे थे, वहां ऐसे प्यारे-प्यारे और ख़ूबसूरत पौधे लगे थे। सुबह जब ताऊजी उठे तो नर्सरी तैयार मिली उन्हें। उन्होंने सोचा कि रात में तो यहां कुछ नहीं था, सुबह एकदम ये कैसे तैयार हो गई! तब ताऊजी ने मुझसे कहा, ‘शाम तक का समय है मुझे यह बता देना कि यह पौधे कहां से लाया है और शाम तक लौटा देना। नहीं तो आज तू नहीं या मैं नहीं।’ ताऊजी शाम को काम से लौटे। मैंने पौधे वापिस नहीं किए थे। ताऊजी कपड़े बदलकर सीधे मुझे छत पर ले गए। मैं हंसते-खेलते चला गया। नीम का एक माेटा लट्‌ठ उन्होंने काटकर रखा हुआ था और उससे फिर जो धुलाई हुई कि क्या बताऊं आपको। उन्होंने फिर पूछा कि कहां से चोरी की है। अब मरता क्या न करता। सब बता दिया। वे मुझे पकड़कर कलेक्टर साहब के घर पर ले गए। कलेक्टर साहब तो नहीं थे लेकिन वहां जो सज्जन मिले, उनसे ताऊजी ने कहा कि यह रहे आपके पौधे और यह रहा आपका चोर। उन सज्जन को बड़ा आश्चर्य हुआ। ताऊजी ने बताया कि यह गांव में भी चोरी करता था।
किंतु सज्जन ने कहा कि ये पौधे अब इस बच्चे के हैं। और यह हमारा भी बच्चा है। और कोई ग़लत चीज़ की चोरी नहीं की है इसने। आप इसे लेकर आए हैं, यह अच्छी बात है, लेकिन आप इसे समझाकर पौधे दीजिए। इसके बाद भी मैं वहां से लौटते समय 2-4 पौधे ज़बरदस्ती उठा लाया। अगले दिन ताऊजी मुझे अपने साथ लेकर गए। मैंने पहली बार जीवन में ऐसी बढ़िया नर्सरी देखी थी। उस समय बहुत कुछ नया था। फिर मैं वहां से कुछ पौधे लेकर आया। आज वो बहुत बड़े हो गए हैं। इसके बाद लगा कि यह आख़िरी चाेरी है। आज भी गांव के बुज़ुर्ग मुझे अक्सर प्यार से पौधाचाेर कहकर पुकारते हैं।

पूर्व दस्युओं से भी पौधे लगवाने का विचार कैसे आया ?
— दिवंगत अभिनेता इरफ़ान ख़ान को टोंक से बड़ा लगाव रहा क्योंकि यही उनकी जन्मभूमि थी। पानसिंह तोमर करने के बाद वे जब वे टोंक आए तो उन्होंने फ़िल्म के बारे में मुझसे पूछा। लेकिन सच्चाई यह थी कि मैंने तब तक वह फ़िल्म देखी नहीं थी। फ़िल्म देखकर मुझे लगा कि युवाओं के साथ बहुत अन्याय हो रहा है, मार्गदर्शन का अभाव है। दूसरी बात यह है कि जब तक चम्बल के जंगलों में डकैत थे, तब तक जंगल की जैव विविधता सुरक्षित थी, क्योंकि कारख़ानों के लिए जंगल की कटाई वहां हो नहीं सकती थी। लेकिन जब डकैतों ने जंगल छोड़ दिया, तो क्या अब उन डकैतों को जाकर समझाया जा सकता है कि जिस जंगल ने आपको वर्षों तक बचाया, जिन पशु-पक्षियों ने आने वालों की आहट का अंदाज़ा आपको दिया है, उस जंगल को बचाना आपकी ज़िम्मेदारी नहीं है? इसी विचार के साथ हम चम्बल के बीहड़ की ओर चल दिए।
जब इसकी शुरुआत हुई तो लोग डरे भी। चम्बल से चित्रकूट तक फैले चम्बल के बीहड़ों की क़रीब दो साल तक खाक छानी और पूर्व कुख्यात दस्युओं को अपनी मुहिम से जोड़ा। मलखान सिंह, गब्बर सिंह, रेणु यादव, सीमा परिहार, मोहर सिंह, जगदीश सिंह, पंचम सिंह, सरू सिंह, पहलवान सिंह, बलवंता सहित कई पूर्व कुख्यात दस्युओं से मुलाक़ात की और उनके साथ भी रहे। मेरे साथियों को उनके पास जाने में कुछ डर लगता था, लेकिन उनके व्यवहार को देखकर लगा ही नहीं कि कभी ये ख़ूंख़ार भी रहे होंगे।
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पौधारोपण में आम लोग किस तरह से योगदान दे सकते हैं ?
— घर में कोई भी थैली आती है, जैसे दूध की थैली, तो उसमें थोड़ी मिट्टी भरकर रख दीजिए। घर में आप जो भी फल खाते हैं उसके बीज उसमें डालकर रख दीजिए। घर में ही आपकी मिनी नर्सरी तैयार हो जाएगी। जन्मदिन या कोई त्योहार आए तो बच्चों से उन पौधों को लगवाएं। इससे बच्चों में प्रकृति प्रेम का बीजारोपण होगा, जो कि भारत के पर्यावरणसम्मत उज्ज्वल भविष्य की नींव रखेगा।

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