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  • Rajit Is Known As The 'Effortless' Actor Of The Film Industry, From The Theater To The Movies, His Performance Has Been Celebrated By TV's Byomkesh Bakshi.

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अहा ! अतिथि:फ़िल्म जगत के 'एफ़र्टलेस' एक्टर कहे जाते हैं रजित, रंगमंच से फ़िल्मों तक हर जगह अपने अभिनय का परचम फहराया है टीवी के ब्योमकेश बक्शी ने

8 दिन पहले
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  • रजित सहज अभिनेता हैं। ऐसे एक्टर, जिनके लिए कहा जाता है- एफ़र्टलेस। किरदार के कलेवर और त्वचा में वो यूं शामिल हो जाते हैं कि अभिनेता कैरेक्टर से अलग नज़र ही नहींं आता। रंगमंच से होकर आगे बढ़ते हुए रजित ने धारावाहिकों के रास्ते फ़िल्मों तक शानदार सफ़र तय किया है।

रजित के बारे में कमाल बात ये है कि -
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उल्लेखनीय स्थान और उपलब्धियां हासिल करने के बावजूद वे न शांत बैठे हैं, न संतुष्ट हुए हैं। उनके अंदर का आकुल अभिनेता लगातार नए वितान तलाश रहा है। चण्डीदत्त शुक्ल से विशेष बातचीत में निर्माता, निर्देशक, लेखक और अभिनेता रजित ने अपने सफ़रनामे के पन्ने पलटे...

रजित कपूर हैं इस बार के हमारे अहा अतिथि...

सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित रजित कपूर का जन्म अमृतसर में हुआ था, लेकिन डेढ़ साल की उम्र से ही वे मुम्बई (तब बम्बई) में रह रहे हैं। बालपन से चंचल, एक्सप्रेसिव और बहिर्मुखी बच्चों में शुमार किए जाते थे। स्कूली दिनों में मंच पर परफ़ॉर्म करने का मौक़ा मिलते ही झटपट स्टेज तक दौड़ जाना, तरह-तरह की गतिविधियों में हिस्सा लेना, सस्वर कविता पाठ, लघु नाट्य में अभिनय, डिबेट में सहभाग पसंद था। ‘मेरे लिए क्लासरूम पढ़ाई की जगह थी और मंच मस्ती का स्थान,’ कहते हैं रजित। वे बताते हैं- ‘पहले-पहल माता-पिता को अच्छा लगा, बाद में थोड़ी चिंता भी हुई कि नाचना, गाना- ये सब करना ठीक, लेकिन पढ़ाई में बेहतर नहींं हो पाने पर क्या होगा!’ और चिंता सिर्फ़ उनकी नहींं, दोस्त भी रजित को टोकते रहते। हाईस्कूल की परीक्षा सिर पर आ गई, तब एक मित्र ने यहां तक कह दिया- ‘10वीं कैसे पास करोगे?’ यूनिट टेस्ट में रजित थोड़े पिछड़ गए थे। दोस्त की फ़िक्र के मद्देनज़र बोले- ‘मुख्य परीक्षा में अभी तीन महीने बाक़ी हैं, चिंता की कोई बात नहींं है।’ आत्मविश्वास हवाई भी न था। पढ़ाई में वो तेज़ थे। बस दिखाते नहींं थे कि अध्ययन में गहरी रुचि है। अंततः फ़ाइनल एग्ज़ाम में अच्छे नम्बर मिले। गणित में पहले कम नम्बर आए थे, फिर उसकी कसर भी पूरी हो गई।

अंग्रेज़ी ज़ुबान के ‘लव लेटर्स’
स्कूल में अंग्रेज़ी-हिंदी रंगमंच के प्रति गहरा रुझान विकसित हुआ। हिंदी नाटक ख़ुद लिखे। स्कूल के बाद कॉलेज में भी तरह-तरह के नाटक किए। कुछ हिंदी में, ज़्यादातर अंग्रेज़ी के। मसलन- ‘नाइट ऑफ़ जनवरी 16’, ‘डायरी ऑफ़ एनी फ्रैंक’, ‘एंटीगनी’ का हिंदी अनुवाद। इला अरुण के साथ हिंदी में ‘जमीलाबाई कलाई’। उसके लिए राजस्थानी लहज़ा सीखा।
रजित का मशहूर नाटक है- अंग्रेज़ी ज़ुबान का ‘लव लेटर्स’। इसमें काम करते हुए उन्हें अब चौथाई सदी से अधिक वक़्त बीत गया है। नाटक की कहानी दिलचस्प है। मर्द और औरत के रिश्ते की कहानी। इस सम्बंध की ऊष्मा और खींचतान को चिट्ठियों के ज़रिए बयान किया गया है। बचपन से पचपन यानी कम उम्र से अधेड़ावस्था के साथ की बात। इसी नाटक का हिंदी संस्करण ‘तुम्हारी अमृता’ नाम से सैकड़ों बार मंचित किया जा चुका है। उसकी मुख्य भूमिकाओं को फ़ारुख़ शेख़ और शबाना आज़मी ने साकार किया है। इसी ‘लव लेटर्स’ के मंचन के दौरान श्याम बेनेगल ने रजित को मंच पर देखा। नाटक ख़त्म होने के बाद बेनेगल ग्रीन रूम में गए और बड़ी गर्मजोशी के साथ रजित से हाथ मिलाया।

बरास्ता मंच ‘सातवां घोड़ा’
रजित बताते हैं, ‘फ़िल्मों के प्रति ख़ूब आकर्षण था। डायरेक्टर-प्रोड्यूसर के दफ़्तर अक्सर फोन किया करता। कुछ लोगों से मिलने भी गया, लेकिन कहीं पर भी नोटिस नहींं किया गया। आख़िरकार, एक दिन ‘लव लेटर्स’ ने क़िस्मत बदल दी। सच ये है कि ‘लव लेटर्स’ की प्रस्तुति के दौरान, ज़्यादातर समय नायक-नायिका सिर्फ़ चिट्ठियां पढ़ते हैं और स्वरों के बलाघात के ज़रिए किरदार को विश्वसनीय बनाने की कोशिश करते हैं। पेशकश अरुचिकर न हो जाए, इसके लिए हम लोग हर प्रस्तुति में कुछ न कुछ नया करने की कोशिश करते हैं। हो सकता है कि ऐसी ही कोई पहल श्याम जी को लुभा गई हो। शो स्टार्ट करने के कुछ अरसे बाद ही वे नाटक देखने आ गए थे।’
रजित को याद है, अगली सुबह ही श्याम जी का फोन आ गया था। उन्होंने अपने दफ़्तर बुलाया और मिलते ही बोले- ‘हम साथ काम करेंगे। तुम्हारा तलफ्फ़ुज़ अंग्रेज़ी से प्रभावित लग रहा है। तुम हिंदी तो पढ़ लोगे न!’ ये कहकर उन्होंने एक स्क्रिप्ट थमा दी। रजित वहीं बैठकर पूरी स्क्रिप्ट पढ़ गए और आश्चर्य में पड़ गए कि ये एक लीड कैरेक्टर था।
रजित बताते हैं- ‘मैं ज़्यादातर अंग्रेजी में सोचता और लिखता था, लेकिन हिंदी से गुरेज़ नहींं था। ये जुड़ाव रेडियो के चलते पैदा हुआ। मैं अक्सर अंग्रेज़ी में समाचार बुलेटिन सुनता था, वहीं मेरा शैक्षणिक परिवेश भी अंग्रेज़ियत वाला रहा।’

फाड़ दिया एनएसडी का फ़ॉर्म
बात एनएसडी यानी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की हुई तो रजित को याद आया कि एक बार उन्होंने ड्रामा स्कूल का फ़ॉर्म भी मंगवाया था। वे चाहते थे कि विद्यालय का छात्र बनकर अच्छी तरह से ट्रेनिंग प्राप्त करें, लेकिन व्यवसायी परिवार ने उन्हें अभिनय के लिए प्रोत्साहित नहींं किया। आख़िरकार, निरुत्साहित रजित ने आवदेन प्रपत्र फाड़कर फेंक दिया।
वे मानते हैं कि औपचारिक तैयारी से लाभ होता है। एनएसडी में तालीम मिली होती तो शायद छह-सात साल पहले ही एक अभिनेता के रूप में अच्छी तरह तैयार हो गया होता। हालांकि चीज़ें ख़ुद करके सीखीं, लेकिन अनुशासित ढंग से, एक प्रक्रिया के तहत प्रशिक्षण प्राप्त करने का असर अलग होता है। शुरुआती में थोड़ा मलाल रहा, लेकिन जब देखा कि ट्रेंड एक्टर्स कुछ ख़ास कमाल नहींं कर रहे हैं, जैसा हम अप्रशिक्षित लोग कर पाते हैं- तो अफ़सोस जाता रहा।

रजित याद करते हैं
‘फ़िल्म ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ में ब्रेक मिलने के मौक़े की दास्तान रोचक, रोमांचक और आश्चर्यजनक है। श्याम बाबू ने कहा कि हिंदी अच्छी तरह बोल लोगे न, तो बाक़ी चीज़ों से ज़्यादा मुझे उनके प्रस्ताव पर ख़ुशी और हैरत हुई। मैं अवाक रह गया। बस इतना कह सका- ‘मुझे अवसर दीजिए, फिर कहिएगा।’ ख़ुशी के साथ आशंका की एक वजह भी थी। श्याम बेनेगल धर्मवीर भारती की कृति पर फ़िल्म बना रहे थे, जिसके अहम किरदार के लिए मुझे चुन लिया था। कई बार सोचता था कि बेनेगल साहब ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ को सिल्वर स्क्रीन पर क्यों लाना चाहते हैं? मैंने पहले महसूस किया था कि कुछ सिनेमा वाले साहित्यिक कृतियों पर फ़िल्म बनाते समय आवश्यक संवेदनशीलता का ख़्याल नहींं रखते और फिर पता चलता है कि ख़राब फ़िल्म की वजह से साहित्यिक कृति का नाम भी ख़राब हो गया। संदेह इसलिए भी था, क्योंकि मैंने उपन्यास पढ़ रखा था। उसमें जिस महीन बुनावट और क़रीनेपन के साथ कहानी को पेश किया गया है, वैसा फ़िल्म में भी हो पाएगा, इसको लेकर दो-मन की स्थिति थी। मैंने इस बारे में अपने सीनियर रहे केके रैना से बातचीत की। उन्होंने फ़िल्म में माणिक के भाई का किरदार निभाया है। रैना से पुरानी जुगलबंदी है। ब्योमकेश बख्शी में भी वे साथ थे। ‘सूरज...’ हार्ड कॉपी भी उनसे ही मिली थी।
उन्होंने कहा कि तुम श्याम जी की क्षमता और गम्भीरता से पूरी तरह परिचित नहींं हो, इसलिए ऐसा सोच रहे हो। सिर्फ़ इतना करो कि श्याम जी जैसा कह रहे हैं, हूबहू फ़ॉलो करते जाओ। भरोसा रखो, नाउम्मीद नहींं होगे।’

मैंने कहा- आपका शुक्रिया
रजित बेहिचक स्वीकार करते हैं- ‘जब फ़िल्म की स्क्रीनिंग में जाने का मौक़ा मिला, तब भाव-विभोर रह गया। मैंने बेनेगल साहब को शुक्रिया कहा और बताया कि शुरुआत में मैं सशंकित था। उस दिन मुझे कहने में बिल्कुल संकोच नहींं हुआ कि फ़िल्मवालों के बारे में आपने मेरी सोच बदल दी। जितना भी धन्यवाद कहूं, वो कम है। सच ये है कि ग़ैर पारम्परिक फ़िल्म में काम करना मेरे लिए कई तरह से जोख़िम भरा था। जहां एक तरफ़ श्याम जी जैसी हस्ती ब्रेक दे रही थी, वहीं ये ख़तरा बदस्तूर क़ायम था कि फ़िल्म चलेगी या फ़्लॉप हो जाएगी।’

बेशुमार ख़ूबियों वाली फ़िल्म
सर्वश्रेष्ठ हिंदी फ़ीचर फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाली ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ का केंद्रीय किरदार निभाना रजित के लिए गौरव की बात थी। वे बताते हैं कि धर्मवीर भारती की कथा को शमा ज़ैदी ने भरपूर संवेदनशीलता के साथ स्क्रीनप्ले के रूप में गढ़ा, वहीं क़िस्सागो माणिक की दास्तानगोई का अंदाज़ शायद ही कहीं और देखने को मिले। क्या ख़ूब बयान था- विभिन्न वर्गों और उम्र से ताल्लुक़ रखने वाली तीन औरतों का, जो ज़िंदगी के अलग-अलग पड़ावों पर माणिक से मिलीं और उसकी शख़्सियत पर असर डालने में कामयाब रहीं।
यूं, आम नज़र से देखें तो शंका होगी कि रजित को सिर्फ़ दर्शकों को कहानी सुनानी थी इसमें अभिनय की ज़्यादा गुंजाइश नहींं थी, लेकिन रजित इससे इनकार करते हुए अलग नज़रिया पेश करते हैं- ‘जिस तरह गेटअप या मेकअप में अतिरंजित बदलाव के बगै़र नायक कहानियां पेश करता है, वो दिलचस्प है। ऐसे किरदार चुनौतीपूर्ण होते हैं। कहीं माणिक चौदह का है तो फिर अठारह का और अंततः 28-30 साल का।’ छायाकार पीयूष शाह ने ऐसे-ऐसे लेंस लगाए, जिनसे अद्‌भुत विज़ुअल इफ़ेक्ट पैदा हुए। वनराज भाटिया का संगीत भी अद्‌भुत था। इस फ़िल्म का ‘वो शामें, सबकी सब शामें, क्या उनका कोई अर्थ नहीं..’ मेरा पसंदीदा गीत है। रिलीज़ के समय तो संगीत अच्छी तरह प्रचलित नहींं हो पाया था, लेकिन संगीत प्रेमी इसे नए दौर में चाव से सुनते हैं।

महात्मा जी की अप्रेंटिसशिप
1996 के इंडो-साउथ अफ्रीकन संयुक्त प्रोडक्शन ‘द मेकिंग ऑफ़ द महात्मा’ में मुख्य भूमिका निभाकर रजित ख़ासे मशहूर हुए। उनके शब्दों में- ‘गांधी जी ने साउथ अफ्रीका में 21 साल बिताए थे। उनके अफ्रीका निवास के दौरान हुए अनुभवों का फ़िल्म में मुख्यतः चित्रण किया गया था। फ़ातिमा मीर ने एक किताब लिखी है- ‘द अप्रेंटिसशिप ऑफ़ अ महात्मा।’ फ़िल्म इसी किताब पर आधारित है और फ़ातिमा ने ही फ़िल्म का स्क्रीनप्ले भी लिखा है। मैंने उनकी किताब से कई ज़रूरी नोट्स लिए। हालांकि दिलचस्प बात ये कि पहले-पहल मुझे गांधी जी के किरदार के लिए नहींं चुना गया था। इसके लिए मुझे राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। शुरू में मैं महात्मा गांधी की जगह चाचालिया का रोल कर रहा था, जिसे बाद में हिमल देवनारायण ने साकार किया।’
रजित बताते हैं- ‘एक दिन मैं स्टूडियो पहुंचा ही था, तभी मेकअप गुरु विक्रम गायकवाड़ ने कुर्सी पर बैठने का इशारा किया और मेरे चेहरे के साथ कुछ-कुछ प्रयोग करने लगे। मैंने विक्रम से पूछा कि ये सब चल क्या रहा है तो उन्होंने कहा कि थोड़ी देर चुप रहो। हम तुम्हारे ऊपर गांधी का लुक टेस्ट कर रहे हैं। कानों के पीछे वैक्स लगाया, ताकि वे खड़े रहें। इसके अलावा, ज़्यादा कुछ काम नहींं किया गया। अंत में श्याम बाबू आए। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब तुम ही गांधी बनोगे। हां, तुम्हें बापू की देहभाषा की नक़ल नहींं करनी, बल्कि उनके विचारों को आत्मसात कर परदे पर उतारना है।
एक बार फिर मैं ख़ुश परंतु सशंकित था कि इतने लोग महात्मा गांधी का किरदार निभा चुके हैं। न जाने मुझे किस तरह स्वीकार किया जाएगा, लेकिन अंत में सब बेहतर हुआ। श्याम बाबू का ये कहना कि मैनरिज़्म नहींं, व्यक्तित्व की आत्मा को समझना है- मददगार साबित हुआ।
2019 में रिलीज़ ‘उरी- द सर्जिकल स्ट्राइक’ में आदित्य धर ने भी यही बात कही कि आपको नरेंद्र मोदी का कैरेक्टर प्ले करते हुए हाथ हिलाने के अंदाज़ की नक़ल नहींं करनी है, सिर्फ़ सोच पर ग़ौर करना है। स्पष्ट विज़न की वजह से ही इन किरदारों और फ़िल्मों में दर्शकों ने मेरा अभिनय पसंद किया। कहानियां नए तरीक़े से जितनी बार दिखाई जाएंगी, दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींचेंगी ही। अब कई निर्देशक कथा, संदेश और प्रस्तुति पर ग़ौर करते हैं तो कुछ का मैनरिज़्म पर ज़्यादा भरोसा होता है।’

मलयाली फ़िल्म जगत बेमिसाल
रजित ने मलयालम फ़िल्म ‘अग्निसाक्षी’ में उन्नी का प्रमुख किरदार निभाया है। इसके लिए उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा मिली। अलग भाषा और माहौल के बावजूद वे किस तरह बेहतरीन अभिनय कर सके, इस सवाल का जवाब रजित थोड़े मज़ाहिया तरीक़े से देते हैं- ‘सेवा-सत्कार। मलयाली इंडस्ट्री के लोग कलाकारों से प्यार करते हैं, इसीलिए आर्टिस्ट ऐसा अभिनय कर पाते हैं कि फ़िल्म को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा मिल सके।’
‘अग्निसाक्षी’ के बारे में उन्होंने बताया कि गर्मी के दिन थे। हम सुबह सात से दोपहर एक बजे तक शूट करते थे। इसके बाद दो घंटे तक आराम की नींद लेते। हमारा मेकअपमैन सुगंधित पाउडर छिड़कता और जगाने के लिए भी इसी तरीक़े का उपयोग किया जाता। वे बताते हैं कि भाषा की दिक़्क़त इसलिए नहींं हुई, क्योंकि प्रॉम्प्टिंग करने वाला मंच पर हमेशा मौजूद रहता था। डबिंग आर्टिस्ट ने हूबहू नक़ल की। वो इतनी परफ़ेक्ट थी कि एकबारगी मैं भी चौंक गया। दर्शकों को पता ही नहींं चला कि आवाज़ रजित की है या किसी और की।

बात सत्यान्वेषी जासूस की
रजित मानते हैं कि ‘ब्योमेकेश बख्शी’ का ज़िक्र न हो तो बतौर अभिनेता उनके सफ़रनामे के कई पन्ने अधूरे छूट जाएंगे। वो कहते हैं- ‘लव लेटर्स’ वग़ैरह नाटकों में कथानक पता था, कई प्रस्तुतियां कर चुके थे- इसलिए कोई असहजता नहींं थी, लेकिन ब्योमकेश बख्शी की शूटिंग नॉन लीनियर तरीक़े से की गई थी- सिलसिलेवार नहींं- न कहानी के हिसाब से, न ही शॉट्स और सीक्वेंस के नज़रिए से। बासु दा अलहदा मिज़ाज के निर्देशक हैं। वे लोकेशन चुन लेते और वहां से जुड़े सारे दृश्य फ़िल्माने में जुट जाते। चाहे कोई सीन एपिसोड एक का हो या फिर कोई अन्य दृश्य सीज़न के अंतिम एपिसोड का।
चूंकि मैं लीनियर फ़ॉर्मेट में काम करके आया था और दूसरे नाटक में हमारे दिमाग़ में सब कुछ पहले से घुसा होता है, इसलिए कोई दिक़्क़त नहींं होती थी, लेकिन फ़िल्म के लिहाज़ से ऐसा करना मुश्किल था… फिर भी दोहराऊंगा कि बासु दा का विज़न इतना स्पष्ट था कि ज़्यादा समस्या नहींं हुई। उनकी तैयारी ही ऐसी थी। धारावाहिक युगांतर में सुजीत सेन ने मेरा अभिनय देखा था। उन्होंने ही बासु दा से मेरे नाम की सिफ़ारिश की थी। उन्होंने सारी स्क्रिप्ट्स और सब रिवाइज़्ड संस्करण मुझे थमाते हुए कहा कि अभी जो चाहो करेक्शन करो और समझ लो। बाद में संशोधन स्वीकार नहींं किया जाएगा। ब्योमकेश बख्शी में अभिनय करने का अनुभव अनूठा था, क्योंकि इसमें पहली बार बांग्ला भद्रलोक के सरल, उत्सुक और निश्छल जासूस का चित्रण हुआ था, जो ख़ुद को डिटेक्टिव नहींं, सत्यान्वेषी- सच की तलाश करने वाला- कहता है।

जासूस नहींं एक एक्टर हूं मैं
रजित को ब्योमकेश की लोकप्रियता के दिन अब भी याद आते हैं। एक बार कलकत्ता में एक व्यक्ति दूर तक उनका पीछा करता रहा। आख़िरकार रजित तंग हो गए। उन्होंने मुड़कर उस व्यक्ति से पूछ ही लिया कि क्यों पीछा कर रहे। आख़िरकार, क्या देख रहे हो भाई? उसने मुस्कराकर कहा कि बस ये देख रहा हूं कि आज आप किस नए केस की तफ़्तीश में जुटे हैं। रजित ने उस व्यक्ति को काफ़ी देर तक समझाने की कोशिश की- मैं जासूस नहींं, एक एक्टर हूं और यहां कोई केस सुलझाने नहींं आया।
ऐसे ही एक बार रजित को कुछ दवाओं की ज़रूरत पड़ी। दवाएं लेने के लिए वे एक केमिस्ट की दुकान पर पहुंचे। रात के 8 बजने वाले थे। रजित ने जब दुकानदार से पूछा कि इतनी जल्द दुकान का शटर क्यों गिरा रहे हो? उसने हंसकर कहा कि जासूस बाबू, आपका धारावाहिक मैं कैसे मिस कर सकता हूं। दुकान से जल्दी निकलूंगा, तभी तो ब्योमकेश का नया कारनामा देख सकूंगा।

प्रयोगों से भरपूर सिनेमा
अंग्रेज़ जासूस शरलॉक होम्स से प्रभावित 1993 में आई टीवी शृंखला ‘ब्योमकेश बख्शी’ से घर-घर में लोकप्रिय हो गए रजित कपूर नए प्रयोगों को लेकर ख़ासे उदार हैं। अरसे बाद इसी नाम से आई, सुशांत सिंह राजपूत की दिबाकर बनर्जी निर्देशित फ़िल्म के बारे में वे कह चुके हैं- शरदेंदु वंद्योपाध्याय ने ‘सत्यान्वेषी’ कृति रची थी, उसका सानी नहींं है। हां, नई पीढ़ी की सोच, नए नज़रिए का स्वागत होना चाहिए। याद दिला दूं कि सत्यजित राय साहब भी ब्योमकेश पर फ़िल्म ‘चिड़ियाख़ाना’ बना चुके हैं। क्या हम ये सोचकर चुप बैठ जाते कि एक फ़िल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है तो उसकी कहानी पर हम न बनाएं?’

इसलिए हुए टीवी से दूर
रजित ने धारावाहिकों का निर्माण और अभिनय इसीलिए कम कर दिया, क्योंकि वहां ‘रियाज़’ करने के लिए किसी के पास वक़्त नहींं है। कई बार रजित शिफ़्ट शुरू होने से पहले पहुंच जाते। प्रोडक्शन की जानकारी है, इसलिए लाइट, कैमरा से लेकर स्क्रिप्ट तक सुधारने में जुट जाते। यूनिट वाले ख़ुश रहते कि आज तो शिफ़्ट जल्दी पूरी हो जाएगी और घर वक़्त पर जाने को मिलेगा। रजित ने तीन-चार बार ऐसा किया, फिर खिन्नता हुई कि सबके हिस्से का काम मैं करता जाऊं और बाक़ी लोग फ़ोकस्ड ही नहींं हैं। वे बताते हैं कि टीवी ही क्यों, फ़िल्म इंडस्ट्री में भी ऐसे लोगों के साथ काम करने का मन नहींं करता, जिन्हें कला से प्रेम नहींं है। इन्हीं सब कारणों से टीवी या फ़िल्म प्रोडक्शन का इरादा ठप है।
वे एक फ़िल्म का नाम ज़ाहिर किए बिना बताते हैं कि एक बार ऐसा हुआ कि हम जब लोकेशन पर पहुंचे तो मौसम का आकलन सही नहींं होने की वजह से शूटिंग के लिए पांच दिन तक इंतज़ार करना पड़ा। इस सबसे खिन्न होकर एक बार उन्होंने श्याम बेनेगल से कहा था कि मैं इस तरह काम नहींं कर सकता। इस पर उन्होंने जवाब दिया कि तुम अपनी संस्कृति और काम करने के तरीक़े के हिसाब से जुटे रहो। ख़ुद को बेहतर बनाने की कोशिश कर सकते हो, दूसरों को सुधार नहींं सकते। रजित कहते हैं- ‘उनकी बात एकदम सही है, लेकिन मेरे लिए ऐसा कर पाना सहज नहींं था, इसलिए मैंने धीरे-धीरे संख्या की जगह गुणवत्ता पर ध्यान देना शुरू कर दिया।’

सिनेमा देता है रोचक अनुभव
रजित को सिनेमा के दौरान बहुत-से रोचक अनुभव मिले हैं- ‘हाल में मैंने ‘दो आने की धूप चार आने की बारिश’ की है। इसमें मनीषा कोइराला का अच्छा किरदार है। इस स्क्रिप्ट की तैयारी में भी मैंने मदद की। अभिनय इसलिए किया, क्योंकि ऐसा जटिल किरदार निभाने के लिए मेनस्ट्रीम सिनेमा के स्टार्स तैयार नहींं थे। दीप्ति नवल की फ़िल्म होने के कारण फ़र्ज़ था कि जितना हो सके, मदद करूं। ऐसे ही ‘ग़ुलाम’ करने के पीछे अंजुम राजबली का आग्रह प्रमुख था। उन्होंने कहा था कि रजित, ये फ़िल्म तुम्हारे साथ ही करना चाहता हूं। अच्छा लगा जब मेरे काम को सराहना मिली।’

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