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आखर अनंत:हाल ही में प्रकाशित हुई चंद किताबों की समीक्षाएं

4 महीने पहले
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  • अक्षरों के संसार की तरह अनंत ही है। “अहा! जि़ंदगी’ के इस स्तम्भ में हम आपके लिए लाए हैं हाल ही में प्रकाशित ऐसी किताबों का ब्योरा, जो पाठकीय रुचि के दृष्टिकोण से आपके लिए उपयोगी, मनोरंजक, मार्मिक और सुरुचिपूर्ण साबित हो सकती हैं।

शीर्ष समालोचक के कृतित्व का नवनीत

रामविलास शर्मा को हिंदी साहित्य की प्रगतिवादी आलोचना का पितामह कहा जाता है। लगभग साढ़े छह दशक के रचनाकाल में उन्होंने 112 किताबें लिखीं। यह ग्रंथ उनकी रचनाओं का प्रतिनिधि संचयन है। इसे उनके कृतित्व का नवनीत भी कह सकते हैं।

यह पुस्तक रामविलास शर्मा की महत्वपूर्ण रचनाओं का संग्रह है। इससे रामविलास जी की साहित्य-साधना का सम्यक परिचय प्राप्त होता है। वे हिंदी के शीर्ष आलोचक ही नहीं, कवि, उपन्यासकार, निबंधकार भी थे।

हिंदी के प्रकांड पंडित होने के साथ ही अंग्रेज़ी के प्राध्यापक, ऋग्वेद और मार्क्स के गहन अध्येता, इतिहासवेत्ता, भाषाविद् और राजनीति विशारद भी थे।

मार्क्सवाद की भारतीय संदर्भ में सटीक व्याख्या करने वाले गिने-चुने विचारकों में वे शुमार हैं। सौ से अधिक पुस्तकें लिखने वाले रामविलास जी की रचनाओं का एक ऐसा संचयन बनाना, जिसे पांच सौ पन्नों में समेटा जा सके, सरल काम नहीं, किंतु हरिमोहन शर्मा ने स्तुत्य प्रयास किया है।

आरम्भ में उनकी सुदीर्घ भूमिका इस परियोजना के आशयों को स्पष्ट करती है। पुस्तक दो खंडों में विभक्त है। पहले खंड में आत्मकथांश सहित विवेकानंद, फ्रांसीसी क्रांति, दलित प्रश्न, स्त्री प्रश्न आदि पर निबंध हैं, तो दूसरे खंड में साहित्य समालोचनाएं हैं, जिनमें तुलसी से लेकर त्रिलोचन तक पर चिंतन किया गया है।

इतने महत्वपूर्ण आलोचक की प्रतिनिधि रचनाओं का यह संकलन किसी सिंहावलोकन से कम नहीं। हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों के लिए तो यह वरदान है।

– सुशोभित

पुस्तक- रामविलास शर्मा रचना-संचयन /

सम्पादक - हरिमोहन शर्मा

मूल्य- 400/-

प्रकाशक- साहित्य अकादेमी

बिहार की सियासत पर नई और पैनी नज़र

चम्पारण के अनुरंजन झा मीडिया जगत का एक जाना-पहचाना नाम हैं। वे जनसत्ता, ज़ी न्यूज़, आजतक, इंडिया टीवी आदि में कार्य कर चुके हैं। उनकी पहली किताब अण्णा आंदोलन पर केंद्रित थी। इस किताब में उन्होंने बिहार की राजनीति पर क़लम चलाई है।

यह एक संयोग ही है कि अनुरंजन झा की यह पुस्तक ऐन उस समय प्रकाशित हुई है, जब बिहार विधानसभा चुनावों के परिणाम घोषित हुए हैं और राज्य में नए राजनीतिक समीकरण उभरते दिखलाई दिए हैं।

पटना का गांधी मैदान बिहार की राजनीति का अखाड़ा है। यह वही गांधी मैदान है, जहां से लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने लोकतंत्र पर मंडराते ख़तरे को भांपकर जनता को आवाज़ लगाई थी। इससे एक नई और वैकल्पिक राजनीति का भी सूत्रपात हुआ था, जिसने जनता सरकार और सामाजिक न्याय की सियासत को जन्म दिया।

यह एक संयोग ही है कि इससे मिलता-जुलता आंदोलन वर्ष 2011 में दिल्ली के रामलीला मैदान में भी हुआ था, जिसने एक एक्टिविस्ट तेवर की राजनीति को देश के सामने प्रस्तुत किया था।

अनुरंजन झा की पहली पुस्तक “रामलीला मैदान’ इसी पर केंद्रित थी, वहीं इस पुस्तक में वो गृहराज्य बिहार में लौटे हैं। वो इसे बिहार की कहानी बतलाते हैं।

वो पूछते हैं कि जेपी और कर्पूरी ठाकुर का बिहार लालू-नीतीश का बिहार कैसे बन गया? डॉ. राजेंद्र प्रसाद के जीरादेई से बाहुबली कैसे चुनाव जीते? गांधी के चम्पारण में गैंगवार ने कैसे जड़ें जमा लीं? राजनीति में रुचि रखने वाले इस किताब की उपेक्षा नहीं कर सकते।

पुस्तक- गांधी मैदान

लेखक - अनुरंजन झा

मूल्य- 175 /-

प्रकाशक- हिन्द युग्म

आज़ादी के बाद के सालों की कश्मीरी कविता

स्वातंत्र्योत्तर कश्मीरी कविता के इस अभिनव संचयन में वर्ष 1947 से 2010 तक की रचनाएं संजोई गई हैं। इन कविताओं का संकलन और सम्पादन अज़ीज़ हाजिनी ने किया है। वहीं इनका हिंदी अनुवाद गौरीशंकर रैणा के द्वारा किया गया है। ऐसी पुस्तकें विरली ही होती हैं।

कश्मीरी भाषा के साहित्य का सुनिश्चित इतिहास कम से कम साढ़े सात सौ वर्षों का है। ललद्यद और शेख़-उल-आलम की कविताएं तो विश्व-स्तर की थीं। हब्बा ख़ातून से लेकर महमूद गामी और अमीर शाह क्रीरी तक यह सिलसिला फिर आगे बढ़ता ही रहा।

समकालीन कविता का आरम्भ वस्तुत: 1931 के बाद की सामाजिक चेतना और वैचारिक परिवर्तन के साथ हुआ।

स्वतंत्रता आंदोलन ने जो क्रांति पूरे देश में पैदा की, उसके कारण कश्मीरी कवियों की सोच और सृचनात्मकता में नयापन और लिखने के तरीक़े में एक नया अंदाज़ पैदा हुआ। उस दौर के युगांतकारी कवि महजूर की आवाज़ कश्मीरी शायरी में एक ऐसी लय का पता देती है, जिसे नई और ताज़ा कहा जा सकता है।

अब्दुल अहद आज़ाद सहित अन्य कई महत्वपूर्ण कवियों ने नई भावधारा और सामाजिक-राजनीतिक चेतना के साथ कश्मीरी कविता की श्रीवृद्धि की है।

साहित्य अकादेमी की ओर से प्रकाशित इस संकलन में 1947 से 2010 तक की चुनिंदा कश्मीरी कविताओं का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत किया गया है।

मूल पुस्तक “हुमकार कशीर शायरा’ नाम से प्रकाशित हुई थी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह संकलन कश्मीरी कविता के साथ हिंदी पाठकों के प्रेम को प्रगाढ़ कर सकेगा। क्षेत्रीय भाषाओं से ऐसे प्रकाशन स्वागतयोग्य हैं।

पुस्तक- समकालीन कश्मीरी कविता

संकलन एवं सम्पादन - अज़ीज़ हाजिनी

मूल्य- 180 /-

प्रकाशक- साहित्य अकादेमी

एक बिसरे नायक की महान शौर्यगाथा

अमीश की यह आठवीं किताब है। पुस्तक महाराजा सुहेलदेव नामक एक ऐसे ऐतिहासिक महान योद्धा के बारे में है, जिन्हें इतिहास ने भी लगभग बिसरा ही दिया था। लेकिन यह किताब पुन: हमारा एक महान नायक और उनकी शौर्यगाथा से परिचय करवाने में पूर्णत: सक्षम है।

महाराजा सुहेलदेव, भारत का रक्षक। वे सही मायनों में इस भारत भूमि के रक्षक थे। शिव रचना त्रयी और रामचंद्र सीरीज़ की तीन क़िस्तों के माध्यम से पाठकों को अपने लेखन के सम्मोहन में बांध देने वाले अमीश इस बार एक ऐसे नायक की वीरगाथा लेकर आए हैं, जिन्होंने महमूद गज़नवी और उसकी तुर्क सेना के दांत खट्‌टे कर दिए थे।

इस अद्भुत कथा को बांचने के लिए अमीश 1025 ईस्वी के भारत में ले जाते हैं। महमूद गज़नवी के आक्रमण से भारत की यह भूमि छलनी हो रही थी। कोई भी ऐसा बड़ा राज्य न था, जो गजनवी को सीधे टक्कर दे पाए। उसी ने जगप्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया था। ऐसे समय में एक योद्धा अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए, अपने आराध्य प्रभु शिव के लिए उठ खड़ा होता है- महाराजा सुहेलदेव।

बहराइच के युद्ध में उन्होंने जिस तरह से गज़नी के सेनापति सालार मक़सूद के विरुद्ध एक गौरवशाली जीत हासिल की, यह पाठक को रोमांच से भर देता है।

अमीश पात्रों के चित्रण को एक नए ही धरातल पर ले आए हैं। सत्य घटनाओं पर आधारित, काल्पनिक ताने-बाने में बुनी यह पुस्तक हर भारतीय को पढ़ना चाहिए, ताकि वह अपने वीर नायकों पर गर्व कर सके।

रोहित चेडवाल

पुस्तक- महाराजा सुहेलदेव

लेखक- अमीश त्रिपाठी

अनुवाद / धीरज अग्रवाल

मूल्य- 399/-

प्रकाशक- एका वेस्टलैंड

दुनियादारी के बीच शांति और सार्थकता की तलाश

जीवन की शुरुआत से मृत्यु तक जो एकमात्र चीज़ हमारे साथ रहती है, वह है सांस। आप विभिन्न परिस्थितियों में बस सांस को सामान्य रख लें, तो बहुत सारा तनाव, दु:ख, नकारात्मकता यूं ही भाग जाएगी। पुस्तक इतनी ही सरलता से सबकुछ बताते चलती है।

किताब का शीर्षक पढ़कर मन में सबसे पहले सवाल उठता है कि कोई दुनियादार आदमी संन्यासी की तरह भला क्यों सोचे? जवाब हज़ारों साल पहले ही श्रीकृष्ण दे गए हैं- अर्जुन जैसे विवाहित, सांसारिक व्यक्ति को गीता का ज्ञान देकर! लेखक जय शेट्‌टी ने दोनों दुनियाओं को जिया है।

भोग-विलास पर केंद्रित पश्चिमी जीवनशैली, जिसके प्रति हम भारतीय उत्सुकता से भरे हैं; और पूर्वी संन्यास जगत, जिस पर हम गर्व तो करते हैं, किंतु कभी गहरे उतरने की कोशिश नहीं करते।

किताब तीन हिस्सों में बंटी है और ये तीनों एक ही राह के तीन पड़ाव हैं। पहला हिस्सा अपने भीतर झांकने और अनावश्यक बातों से ख़ुद को मुक्त करने के लिए प्रेरित करता है।

स्वाभाविक ही, यह सुख के मार्ग पर पहला क़दम है, जब हम अपने डर, दूसरों के प्रभाव, मीडिया, पैसा, नकारात्मकता आदि की पड़ताल करते हैं।

दूसरा हिस्सा नकारात्मकताओं को छोड़ने से ख़ाली हुई जगह को अच्छी चीज़ों से भरने पर केंद्रित है।

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा दयालुता, कृतज्ञता, सेवा और सम्बंध देने पर है। ज़िंदगी की चूहादौड़ से त्रस्त लोगों को बदलाव के लिए एक पल रुकने की ज़रूरत होती है, यह किताब ठहराव के उसी एक पल जैसी है।

– विवेक गुप्ता

​​​​​​​पुस्तक : संन्यासी की तरह सोचें

लेखक : जय शेट्‌टी

मूल्य- 350 /-

प्रकाशक- मंजुल पब्लिशिंग हाउस

फिर से इंसानियत की ओर मुड़ने का वक़्त

आरामतलबी, आलस्य, जंकफ़ूड, आक्रामकता, दिखावा, परिवार में टूटन और गिरती सेहत- समस्याएं कई हैं, किंतु सबकी जड़ में है भौतिकतावाद। इसी ने हमें इंसानियत से विचलित कर रखा है। गम्भीर मुद्दे की समग्र पड़ताल करती यह किताब हमारे समय का दर्पण है।

पर्वत, समुद्र, जंगल और मैदान के सबसे शक्तिशाली होने के अलग-अलग दावों के बीच धरती माता नन्ही चिड़िया को बताती है कि सबसे ताक़तवर अच्छा इंसान होता है, और चिड़िया उसकी खोज में निकल पड़ती है।

डॉ. नंदितेश निलय की किताब यही अच्छा इंसान बनने का आह्वान है। इसके पहले वे पड़ताल करते हैं कि संसाधन, अवसर और उपलब्धि से भरपूर 21वीं सदी में इस आह्वान की ज़रूरत ही क्यों पड़ी।

इस तरह देहरादून के रेलवे स्टेशन पर एक साथ "इंडिया' और "भारत' के दर्शनों के बाद शुरू हुई यात्रा भूमंडलीकरण, उपभोक्तावाद और पूंजीवाद के असर से मुख्यत: देश के मध्यवर्ग में आए बदलावों की पड़ताल करते हुए, अच्छा इंसान होने की ज़रूरत स्थापित करती है।

इस पूरे सफ़र में निलय चीज़ों को सफ़ेद और काले में बांटने के बजाय सारे पहलुओं पर तटस्थ निगाह डालते हैं। किताब में उस चमक-दमक भरी दुनिया की विडम्बनाएं हैं, जिसके पीछे मध्यवर्ग दीवानों की तरह भाग रहा है।

यह मुख्यत: धन, रुतबे और उपलब्धि के लिए कभी न थमने वाली दौड़ है, जो इंसान को इंसान नहीं रहने देती। कुल मिलाकर, किताब मानवता की ज़रूरत को पुनर्स्थापित करते हुए उस पर भरोसा जगाती है।

पुस्तक : आइए इंसान बनें

लेखक : डॉ. नंदितेश निलय

मूल्य : 249/-

प्रकाशक : कौटिल्य बुक्स

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