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  • Sanjay Mishra, Who Has Made A Mark As A Comedian, Is A Serious And Outspoken Person, Has Made A Special Place In The Hearts Of People Due To His Effortless Acting.

जीवन का हास्य:हास्य अभिनेता के रूप में पहचान बना चुके संजय मिश्रा एक संजीदा और मुखर इंसान हैं, सहज अभिनय के कारण लोगों के दिलों में बनाई है ख़ास जगह

चण्डीदत्त शुक्ल9 दिन पहले
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  • हंसी गर ख़ुशी का आईना है, तो उसका चेहरा संजय जैसा होगा। चर्चित फ़िल्म-टीवी अभिनेता और निर्देशक। दिलचस्प और मुखर इंसान। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से अभिनय में प्रशिक्षण।

कॉमेडी में दो चीज़ें शामिल हैं- हास्य और व्यंग्य। व्यंग्य से परिचय तब हुआ, जब सोलह साल का था। आस-पड़ोस की बातचीत इत्तेफ़ाक़ से कान में पड़ गई। एक भाभी जी, बिटिया से ननद की शिकायत कर रही थीं- देख रही हो बिट्टू। हमरी तबियत ख़राब है और महारानी जी, नई साड़ी पहनकर घूम रही हैं। इंसान मर जाए, लेकिन इनको बनने-ठनने से फ़ुरसत नहीं है। और बिट्टू भी हां में सिर हिलाकर कह रही थीं- हां अम्मां, अब का कहें।

वैसे, पारिवारिक परिप्रेक्ष्य में ये तानेबाज़ी चुटकी जैसी है। परिवार में थोड़ी-सी छेड़छाड़ ना हो तो नीरसता छा जाए, लेकिन जैसे ही समाज में ताने पहुंचते हैं और चलने लगते हैं, तब बड़े पटल पर यही चुटकी तीर बन जाती है। ज़रूरी तो ख़ैर तीर का होना भी है। हरिशंकर परसाई और शरद जोशी सरीखे व्यंग्यकार इसीलिए धारदार कटाक्ष लिखा करते थे। व्यंग्यकार ज़ोर से वार करते हैं, ताकि जड़-बुद्धि ठिकाने आ जाए, लेकिन कलाकार धीरे-से समझाता है। उसकी चुटकी को सहजता से लेना चाहिए, क्योंकि वो घाव नहीं करती। नींद में सोए समाज को जगाती है। व्यंग्यकार ज़ख़्म नहीं देता। थोड़ा ज़ोर से झकझोरता है। ये सच है कि हमारे समय और समाज के बीच से मासूमियत वाली हंसी गायब हो रही है। ऐसा एक दिन में नहीं हुआ। निश्छल लोग नहीं रहे, इसलिए मासूम हंसी भी छुपने को निकल गई। मासूमियत बचाए रखने के लिए हमने कितनी कोशिश की है, ये बात भी सोचने वाली है। मुल्क में जैसे हालात हैं, उनमें कोई भी, कहीं, किसी से भी छोटे-छोटे मुद्दे पर नाराज़ हो जाता है। निश्छल हंसी कैसे सांस ले? यक़ीन मानिए, ये बहुत चिंता की बात है। हंसी भाग जाएगी तो चुप्पी छा जाएगी।

भीड़ से बाहर रहकर समझे क़िस्म-क़िस्म के किरदार
मैं बहुत सामाजिक इंसान नहीं हूं। भीड़ में घुलकर नहीं रहता, क्योंकि एक एक्टर को यूं भी बहुत सोशल नहीं होना चाहिए। ये आवश्यक है कि वो प्यार सबसे करे, लेकिन हो-हल्ले में ना उलझे। भीड़ को दूर से देखना चाहिए। इस तरह आपको हास्य रंग दिखता है, रौद्र रस भी समझ में आता है। शृंगार की समझ भी मिलती है। मैंने समाज के अलग-अलग किरदारों को जी-भरकर महसूस कर रखा है। जब जैसा कैरेक्टर सामने आता है तो बस उस ऑब्ज़र्वेशन को फ़ॉलो कर लेना होता है।
दम लगाके हईशा का एक दृश्य है, जहां पत्नी गिरकर बेहोश हो जाती है, और पति के किरदार निभाते हुए मैं चुटकी लेता हूं- अरे भाग्यवान, यहां क्यों लेट गईं सड़क पर। सोना ही था तो कमरे में चली जातीं। मेरे लिए उस किरदार की परिस्थिति हास्य की थी। दूसरों को हालात गम्भीर लगेंगे, लेकिन कैरेक्टर के हिसाब से वो हंसी की बात थी। इसी तरह की हल्की-फुल्की हंसी बचाए रखनी होगी। सब कुछ को व्यंग्य मान लेंगे तो काम कैसे चलेगा?

ऐसे ही अलग-अलग सीढ़ी मिलती गई
जब पहली बार कॉमिक कैरेक्टर ऑफ़र किया गया तो मैंने उसे हाथोहाथ लिया। कॉमेडी की वजह से ही बतौर एक्टर अपनी रेंज का पता चला। सच ये है कि एक-एक सीढ़ी चढ़कर यहां पहुंचा हूं। यूं समझिए कि अगर रात-ओ-रात मंज़िल हासिल कर लेता (सफ़र अब भी जारी है) तो मुकम्मल यात्रा का पता ही नहीं चलता- ना वो अनुभव होता, न संघर्ष की अहमियत जानता।
क़ॉमेडी करने का मौक़ा हाथ आया, तब तक पहली पायदान भी नहीं मिली थी। और विकल्प थे भी नहीं। तो मैंने सहर्ष स्वीकार किया। सफल रहा, दर्शकों का प्रेम मिला तो और विकल्प खुले। ऐसे ही अलग-अलग सीढ़ी मिलती गई।

निर्देशकों के भरोसे गहरी कॉमेडी की
शुरुआत में जो काम हाथ आया, उसे दिल से निभाया तो निर्देशकों और दर्शकों का विश्वास बढ़ा। रजत कपूर, सुभाष कपूर, नीरज घेवान और नील माधव पांडा जैसे निर्देशकों ने मेरा हाथ पकड़कर किरदारों के हवाले कर दिया। सबका यही कहना था कि हमें लगता है - आप फलां किरदार कर सकते हो… तो पहले भरोसा कमाना पड़ता है।

यकायक पीछे मुड़ गए सारे दर्शक
मेरी नई फ़िल्म क़ामयाब के क्लाइमेक्स में दिखाया गया है कि कॉलेज के समारोह में सभी चीफ़ गेस्ट के रूप में आमंत्रित फ़िल्म स्टार का इंतज़ार कर रहे हैं। वो जब तक आए, उस दौरान कैरेक्टर आर्टिस्ट सुधीर, यानी मुझे एक्ट करने के लिए कहा जाता है। मैं पूरे मन से कैरेक्टर्स निभाने लगता हूं। दर्शक मंत्रमुग्ध होकर मुझे देख रहे होते हैं, तभी गोली लगने के बाद मैं स्टेज पर गिर जाता हूं। तालियां बज रही होती हैं, लेकिन उसी समय चीफ़ गेस्ट आ जाते हैं। दर्शक स्टेज से नज़र हटाकर उधर देखने लगते हैं, जिस ओर से गेस्ट आ रहा होता है। बहुत इमोशनल दृश्य था वो।
ऐसा ही कुछ मेरे साथ मुम्बई में हुआ, जब मामी में क़ामयाब की स्क्रीनिंग की जा रही थी। मुझे ख़ासतौर पर बुलाया गया था कि आपका यहां रहना ज़रूरी है। मैं आया और दर्शकों के बीच बैठ गया। आख़िरी दृश्य में जैसे ही सुधीर की मौत हुई, दर्शक ताली बजाने लगे और फिर वे परदे की तरफ़ पीठ करके ऑडियंस की तरफ देखने लगे। वो तालियां बजा रहे थे और मैं उस प्यार के आगे अवाक् था। बस, चुपचाप रो रहा था, लेकिन मेरी आंखों में हंसी और ख़ुशी थी।

...और तब मन ख़ुशी से लहलहा उठता है
एक एक्टर के लिए दर्शकों के प्यार से बड़ी दौलत और कुछ नहीं होती। ईश्वर की कृपा से मेरे ‘स्त्री’ जैसी फ़िल्में देखकर सोशल मीडिया वग़ैरह पर मैसेज करते हैं या मिलकर बोलते हैं- हमें हंसी के पल देने के लिए शुक्रिया… तब मन ख़ुशी से लहलहा उठता है।
उम्मीद है, मेरे दर्शकों के चेहरे पर ये जेनुइन मुस्कान हर परिस्थिति में बनी रहेगी।

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