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विरासत:शिवपूजन सहाय की रचना- प्रोपगंडा- प्रभु का प्रताप

एक महीने पहले
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  • शिवपूजन सहाय जिस कालखण्ड में लिख रहे थे, तब अभी प्रोपगंडा यानी प्रचार-तंत्र की समस्त लीलाओं का अवतरण शेष था।
  • राजनीति से लेकर कलाओं और लोकप्रिय संस्कृति तक यह प्रचार-तंत्र कैसे गुल खिला सकता है, इसके पहले-पहल रुझान अलबत्ता अवश्य मिलने लगे थे।
  • एक दूसरी ही सदी में लिखी गई यह कृति आज भी प्रासंगिक मालूम होती है। और भाषा का सौष्ठव और सांस्कृतिक-बोध तो वैसा, जो आज खोजे से न मिले।

शिवपूजन सहाय
हिंदी के मूर्धन्य लेखकों में सम्मिलित। वर्ष 1893 में बिहार के उनवास में जन्म। मुख्यतया गद्य-गल्प
लेखन किया। प्रमुख कृतियां देहाती दुनिया, मतवाला, माधुरी, गंगा, जागरण, हिमालय, हिंदी भाषा और साहित्य। शिवपूजन रचनावली भी प्रकाशित हुई है। पद्म भूषण से सम्मानित। वर्ष 1963 में पटना में निधन।

प्रोपगंडा-प्रभु का प्रताप

‘प्रोपगंडा’-प्रभु का प्रताप प्रचंड है- ‘जिन्हके जस-प्रताप के आगे, ससि मलीन रवि सीतल लागे।’ यदि आज ‘भूषण’ और ‘पद्माकर’ जीवित होते तो इनके यश और प्रताप का भड़कीला वर्णन कर सकते। मैं भला चूहे के चाम से दमामा कैसे मढ़ सकता हूं? फिर भी आंख-कानवाला जं‍तु हूं, जिनके आंख-कान हैं, उन्हें तो सुझा-बुझाकर प्रभुजी के प्रताप की बानगी दिखा ही दूंगा। इनके प्रताप-सूर्य की किरणें सभी क्षेत्रों में प्रवेश कर गई हैं। राजनीतिक क्षेत्र में इनके जुए के नीचे कंधा देने से कोई न बचा। साहित्यिक क्षेत्र में इन्हीं के प्रताप-प्रभाव से कुछ लोगों के चेहरे की लाली बनी हुई है। धार्मिक क्षेत्र में कितने ही लोग बाघम्बर ओढ़े दूसरों की हरी-भरी खेती चर रहे हैं। सामाजिक क्षेत्र में बहुतेरों की पांचों उंगलियां घी में हैं- यद्यपि बाक़ी पांच पर वे दिन गिन रहे हैं। व्यापारिक क्षेत्र में, इन्हीं प्रभुजी की छत्रच्छाया में, कुछ लोग जवानी की ख़ैरात बांट रहे हैं, नपुंसक को सांड बना रहे हैं, बांझ की कोख आबाद कर रहे हैं, संतानों की बाढ़ रोकने का बीमा लेकर घुड़दौड़ का मुफ़्त टिकट काट रहे हैं, ‘ययाति’ को यौवन-दान देते हैं और ‘सम्पाति’ के पंख उगाते हैं। इन प्रभुजी का भक्त हुए बिना न कोई चांदी काट सकता है, न मूंछ पर ताव दे सकता है, न हार में जीत का सपना देख सकता है, न किसी को उलटे छुरे से मूंड़ सकता है, न दुनिया की आंखों में धूल झोंक सकता है, न मिथ्या महोदधि का मंथन कर असत्यरत्न निकाल सकता है, न जादू की छड़ी फेरकर गीदड़ को शेर बना सकता है, न छछूंदर के सिर में चमेली का तेल लगा सकता है, न सूखी रेत में नाव चला सकता है, न ढोल की पोल छिपा सकता है, न कोयले पर मोहर की छाप लगा सकता है; इस दुनिया में कुछ भी नहीं कर सकता। जिसके मन में इनका प्रताप व्याप गया, उसका बेड़ा पार समझिए। वह चाहे तो पानी में आग लगा दे, हवा में महल बना दे, आकाश में कुसुम खिला दे, अमावस को पूर्णिमा करके दिखा दे, तिल का ताड़ और राई का पहाड़ कर दे, कौए को हंस की चाल चला दे, एक सेज के दम्पती को दो सेजों पर सुला दे, पतोहू से सास का मुंह नंुचवा दे, भाई की पीठ में भाई की कटार भोंकवा दे, परदे की आड़ में रहकर रंगमंच पर ख़ून-ख़राबा मचा दे, भीषण रेल-दुर्घटना में भी मौत को अंगूठा दिखा दे; चाहे जो कुछ कर दिखाना उसके बाएं हाथ का खेल है; वह दुनिया को अंगुलियों पर नचा सकता है। तुलसीदास ने लिखा है- ‘श्री रघुबीर प्रताप से सिंधु तरे पाषान।’ शायद उन्हें इन प्रभुजी के प्रताप का पता न था। इनके प्रताप से ही अग्निवर्षा पुष्पवृष्टि बन जाती है, मारतों के पीछे और भागतों के आगे रहने वालों के सिर सेहरा बंध जाता है, दूध का धुला भी कालिख से पुता नज़र आता है, लंकाकां‍ड में भी हिमालय की हिमवर्षा का दृश्य उपस्थित होता है, घनघोर महाभारत में भी केवल पाण्डवों का ही संहार होता है और कौरवों का बाल भी बांका नहीं होता! धन्य है प्रोपगंडा-प्रभु का प्रबल प्रताप! ऐसा प्रताप तो रावण का भी न था! उसकी बहन की नाक उसके जीते-जी काटी गई; मगर इन प्रभुजी की बहन ‘बेहयाई’ तो सारी दुनिया में छाती ताने फिरती है, कोई आंखें तो बराबर कर ले! उसके देखते-ही-देखते उसका लंका-गढ़ एक वानर ने जला डाला, प्रभुजी का दुर्गम गढ़ ‘सफ़ेद झूठ’ तो प्रलयाग्नि की लपटों को भी जुगनू की जोत बना देता है। प्रोपगंडा-प्रभु का पटतर पाना असम्भव है। श्री हनुमानजी राम प्रताप सुमिर‍कर कल्पनातीत कार्य कर डालते थे! प्रोपगंडा-प्रभु का प्रताप भी यदि आपकी सुमिरनी का ध्येय बन जाय तो आप भी बिना हर्रे-फिटकरी के अपना रंग चोखा बना सकते हैं। तब तो राजनीति क्षेत्र में सदा आपकी पौ-बारह है! आप मज़े से खद्दर की खाल में स्वार्थ का भुसा भर सकते हैं। फिर तो मंच पर दहाड़िए और लंच में ‘व्हिस्की’ की चुसकी लीजिए। लच्छेदार भाषा से वाग्जाल बुनकर बुद्धुओं को फंसाइए। वाक्-प्रपंच का ही तो यह युग है। प्रभु-प्रताप से आप में ऐसी वचनचातुरी आ जाएगी कि आप दुनिया को चकमा देकर काजल की कोठरी से भी बेदाग़ निकल जाइएगा। आपके प्रतापी प्रभु की बहन ख़ुद ही दुनिया की नाक काट लेगी। आपके प्रभु के गढ़ में शत्रु-सेना की तो बात ही क्या, बड़े-बड़ों की बुद्धि भी न पैठ सकेगी। और, प्रभु -प्रताप का सुमिरन करते हुए कहीं आप साहित्यिक क्षेत्र में जा पड़े, तो फिर कीर्ति की कलंगी लगी हुई गद्दीधर की पगड़ी आपके सिर। लीजिए सुविधाएं, भोगिए अधिकार। अयोग्यता आपके तहख़ाने में घूंघट काढ़े बैठी रहेगी और योग्यता केवल ‘पाउडर’ और ‘लिपस्टिक’ के बल पर हाट-बाट में मटकती फिरेगी। इसी तरह धार्मिक क्षेत्र में भी आप प्रभु-प्रताप से मन का घोड़ा सरपट दौड़ा सकते हैं, कहीं खंदक-खाई न मिलेगी। अगर बाना आप ठीक बनाए रहें तो गोमुखी में चौमुखी कतरनी भी रख सकते हैं; एक ही मठ में आप विविध प्रकार के यज्ञकुण्ड रख सकते हैं। नीचे लंगरख़ाने का नगाड़ा, ऊपर इं‍द्र का अखाड़ा! यदि सचमुच आप प्रभु-प्रताप का मं‍त्र जपते रहे तो सारी दुनिया को आप अपने नीचे से निकाल देंगे। ऐसा प्रखर प्रताप है प्रोपगंडा-प्रभु का!

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