ताना-बाना:कुछ पोषक तत्व छोटे ज़रूर होते हैं पर इनकी ज़रूरत बड़ी होती है, इन्हीं में शामिल हैं विटामिन और खनिज

अमिता सिंह, पोषण एवं आहार विशेषज्ञ।14 दिन पहले
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  • जैसे जीवन में संतुलन आवश्यक है, वैसे ही जीवन चलाने वाले आहार में भी। एक छोटेे हिस्से की भी अवहेलना हुई नहीं कि सबकुछ धराशायी हो जाता है( विभिन्न विटामिन भी हमारे खानपान का वह छोटा-सा हिस्सा हैं जिनकी कमी पूरा स्वास्थ्य बिगाड़ सकती है।

स्वस्थ रहने के लिए संतुलित आहार अनिवार्य है। कोरोना काल में इसकी अहमियत हम समझ चुके हैं। यहां आहार के पहले स्थित ‘संतुलित’ शब्द पर ग़ौर कीजिए। हमेशा से हमारा अधिक ज़ोर प्रोटीन, वसा और कार्बोहाइड्रेट जैसे स्थूल पोषक तत्वों पर रहा है परंतु सूक्ष्म तत्व भी उतने ही आवश्यक हैं। कारण यह कि स्थूल पोषक तत्व सही प्रकार से कार्य तभी कर पाते हैं जब सूक्ष्म तत्व साथ दें। सूक्ष्म का तात्पर्य है थोड़ी मात्रा में। भले ही कम मात्रा में इनकी आवश्यकता होती है परंतु ये शरीर के लिए अत्यधिक आवश्यक कार्य करते हैं।

ध्यान रहे कि ये तत्व स्थूल पोषक तत्वों की भांति ऊर्जा प्रदान नहीं करते लेकिन इन्हीं की उपस्थिति से आपका आहार संतुलित बनता है। सूक्ष्म पोषक तत्वों के दो समूह हैं: विटामिन व खनिज। यहां हम चर्चा विटामिन की कर रहे हैं। विटामिन शब्द में विटा का अर्थ है जीवन। ये शरीर की शुद्धि, चयापचय, रखरखाव आदि में अति आवश्यक हैं। इनकी आवश्यकता कम मात्रा में है इसका अर्थ यह नहीं है कि विटामिन की गोलियां खाकर पूर्ति करें क्योंकि भोजन द्वारा मिलने वाले विटामिन अधिक कारगर होते हैं। विटामिन भी दाे समूहों में बांटे गए हैं- वसा में घुलनशील और जल में घुलनशील।

वसा में घुलनशील
शरीर में जमा होते हैं

वसा में घुलनशील विटामिन वसा की उपस्थिति में उपयोग होते हैं और इन्हें अगर अधिक मात्रा में लिया जाए तो यह शरीर में संगृहीत हो जाते हैं। इसीलिए इनकी कमी होने पर लक्षण एकदम सामने नहीं आते, क्योंकि आहार से आपूर्ति न होने पर शरीर में एकत्र विटामिन का उपयोग होने लगता है। ध्यान रहे कि इन विटामिनों के स्रोत को अधिक तेल में तलने से ये नष्ट भी हो जाते हैं। वसा में घुलनशील विटामिन चार हैं-

विटामिन – ए
यह कई नामाें से जाना जाता है रेटिनोल, कैराेटीन आदि। शुद्ध विटामिन-ए कलेजी, अंडे आदि जैसे मांसाहारी भोज्य पदार्थों से मिलता है। इसके अलावा अच्छी हरी दूब खाने वाली गाय या भैंस के दूध से भी मिलता है। शाकाहारी भोज्य पदार्थों में गाजर, पपीता, गहरी हरी भाजी, आम, अंकुरित दालों में कैराेटीन के रूप में पाया जाता है जो शरीर में जाकर विटामिन-ए के रूप में कार्य करता है। यह विटामिन दृष्टि के लिए अति आवश्यक है, साथ ही रात में देखने की क्षमता के लिए बहुत ज़रूरी है। यदि इस कमी को समय से पूरा न किया जाए तो देखने की क्षमता क्षीण हो सकती है।

हम हडि्डयों की बढ़ोतरी के लिए कैल्शियम व विटामिन-डी को आवश्यक मानते हैं परंतु विटामिन-ए की कमी होने पर भी हडि्डयां पूरी तरह बढ़ नहीं पातीं। ऐसा क्यों है यह अभी पूरी तरह से पता नहीं चला है। इसी प्रकार विटामिन-ए ही त्वचा, आंत, आंख, फेफड़े आदि के एपिथेलियल ऊतक (टिशू) को नर्म व आर्द्र रखता है। यदि विटामिन-ए कम होता है तो यह टिशू सूख जाता है, इनमें दरार पड़ती है व घातक जीवाणु आसानी से अंदर प्रवेश कर संक्रमण पैदा कर सकते हैं। अर्थात आपकी ऊपरी व आंतरिक त्वचा को स्वस्थ व सुंदर बनाने में इसकी अहम भूमिका होती है।

विटामिन – डी

जब सूर्य की रोशनी हमारी त्वचा पर पड़ती है तो हमारी त्वचा में पाया जाने वाला पदार्थ विटामिन-डी बनाता है। यह मांसाहारी भोज्य पदार्थों जैसे अंडा, कलेजी व मछली के तेल से मात्रा में मिलता है। सूर्य की किरणें प्राकृतिक रूप से हमारे शरीर में विटामिन-डी का निर्माण करती हैं इसलिए दिन में कम से कम आधा घंटा त्वचा को धूप में रखना अनिवार्य है। इसकी कमी से हड्डियों में कमज़ोरी, डायबिटीज, दांतों की कमज़ाेरी का ख़तरा भी बढ़ जाता है।

विटामिन – ई

लगभग सभी प्रकार के भोज्य पदार्थों में पाया जाता है। विभिन्न तेल इसका अच्छा स्रोत हैं। साबुत अनाज, दालें, हरी सब्जि़यों में भी यह मिलता है। यह शरीर में हानिकारक पदार्थों की निकासी के लिए महत्वपूर्ण है व बीमारियों से बचने की क्षमता बढ़ाता है।

विटामिन – के

यह हरी सब्जि़यों से भरपूर मात्रा में मिलता है। हमारी छोटी आंत में भी कुछ सहायक बैक्टीरिया इसे बनातेे हैं। शरीर में कहीं भी रक्त स्राव होने पर जो ख़ून का थक्का जमता है उसे बनाने में यह अति आवश्यक है, यानी यह रक्तस्राव विरोधी विटामिन है। इसलिए जो लोग ख़ून पतला करने की दवाइयां लेते हैं उन्हें विटामिन-के युक्त खाद्य पदार्थ खाने से मना करते हैं।

इन चार विटामिन के अलावा दूसरा वर्ग पानी में घुलनशील विटामिनों का है, जिनमें विटामिन – बी व सी आते हैं।

पानी में घुलनशील
रोज़ाना पूर्ति आवश्यक

जल में घुलनशील विटामिनों में प्रमुख है, विटामिन-बी समूह। जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है, यह कई विटामिनों का समूह है, जैसे विटामिन- बी1 (थायमिन), विटामिन- बी2 (राइबोफ्लेविन), बी3 (नियासिन), फोलिक एसिड, कोबालामिन आदि। ये सभी लगभग एक साथ भोजन में पाए जाते हैं।

ये विटामिन स्थूल पोषक तत्व के सही उपयोग के लिए को-एंजाइम के रूप में कार्य करते हैं। दरअसल, एंजाइम शरीर के वे तत्व हैं जो भोजन के स्थूल पोषक तत्वों अर्थात प्रोटीन, वसा व कार्बोहाइड्रेट के चयापचय के लिए आवश्यक हैं परंतु वे तभी कार्य करते हैं जब इनके सहायक को-एंजाइम भी होते हैं। तो आप समझ गए होंगे कि विटामिन-बी समूह की अनुपस्थिति में ये एंजाइम कार्य नहीं कर सकेंगे और भोजन के वसा, प्रोटीन व कार्बोहाइड्रेट का सही चयापचय व अवशोषण नहीं हाे पाएगा। इससे कमज़ोरी, चक्कर आना, भूख कम लगना और काम करने की क्षमता में कमी आना आदि शिकायतें हो सकती हैं।

रोचक बात यह है कि ये पानी में घुलनशील हैं, अर्थात इनका शरीर में संग्रहण नहीं होता। इन्हें गोलियों या सीरप के रूप में अधिक मात्रा मेंं लेने का भी कोई अर्थ नहीं क्योंकि इनकी अतिरिक्त मात्रा मूत्र के ज़रिए शरीर से निकाल दी जाएगी।

एक और बात, पानी में घुलनशील होने के कारण इनके स्रोतों को अधिक धोने से व अधिक देर तक पानी में भिगोने से भी ये पानी के साथ निकल जाते हैं। शायद बह निकलने की संभावना के कारण ही ये इतनी अधिक मात्रा में भोज्य पदार्थों में पाए जाते हैं।

विटामिनों में विटामिन बी1, बी2 व बी3 मोटे अनाजों व दालों में भरपूर होते हैं। गेहूं को जब साबुत पीसा जाता है तो चोकर युक्त आटा विटामिनों से भरपूर होता है। इसी प्रकार सेला चावल है। चावल को दो-तीन दिन पानी में भिगोकर, भाप में पकाकर, सुखाकर उपयोग किया जाता है। ऐसे में ये आवश्यक तत्व दाने के अंदर चले जाते हैं और बाद में चावल साफ़ करने से इन विटामिनों की क्षति नहीं होती। परंतु अगर हम छना आटा या सफ़ेद पॉलिश किया चावल खाते हैं और बिना छिलके की दालाें का उपयोग करते हैं तो हम इन विटामिनों के प्राकृतिक स्रोत से वंचित रह जाते हैं।

साबुत अनाज व दालों काे अंकुरित करने व भोज्य पदार्थों के ख़मीरीकरण से विटामिन-बी व विटामिन-सी की मात्रा बहुत अधिक बढ़ जाती है। सही मायने में बारिश के मौसम में जब सब्जि़यां पर्याप्त व अच्छी नहीं मिलतीं तब इन दोनों का अधिक उपयोग करना चाहिए।विटामिन-बी समूह के दो प्रमुख विटामिन हैं, फोलिक एसिड और विटामिन-बी12।

फोलिक एसिड

हरी सब्जि़यों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। साबुत अनाज, दालें, मांसाहारी भोज्य पदार्थ इसके अच्छे स्रोत हैं। पानी में घुलनशील होने के कारण इसकी बड़ी मात्रा शरीर में संगृहीत नहीं हो पाती। फोलिक एसिड लाल रक्त कोशिकाओं के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है और इसकी कमी से भी एनीमिया होता है।

विटामिन – बी12

इसे कोबालामिन भी कहते हैं। यह दूध और दूध से बने खाद्य पदार्थों, अंडा व मांसाहारी भोज्य पदार्थों से प्राप्त होता है। आंतों के कुछ बैक्टीरिया भी यह विटामिन बनाते हैं। इसलिए शाकाहारी लोगों को कुछ मात्रा में दूध या उसके उत्पाद लेने चाहिए। यह विटामिन भी लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण एवं पाचन तंत्र, हड्डियों आदि के लिए यह बहुत ज़रूरी है।

विटामिन – सी

यह बहुत ही नाज़ुक विटामिन है। यह भरपूर मात्रा में फलों, आंवला, नींबू, अमरूद, आम, पपीता, टमाटर एवं जिस वस्तु को खाकर आप ‘सी-सी’ करते हैं, यानी हरी मिर्च में पाया जाता है। अंकुरित अनाज व दालों में भी मौजूद होता है। दूध व मांसाहारी पदार्थों में यह न के बराबर होता है। शरीर में अवशोषण होने के पश्चात यह ऊतकों में वितरित हो जाता है। विटामिन-सी अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यह घाव भरने, लौह लवण का अवशोषण करने एवं संक्रमण को नियंत्रित करने समेत कई आवश्यक पदार्थों को नष्ट होने से बचाने के लिए भी आवश्यक हैं।

तो अब आप समझ गए होंगे कि संतुलित आहार में मोटे अनाज व सब्ज़ी और फलों का कितना अधिक महत्व है।

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