पाठकों की नोटबुक:भरपूर होती है धूप फिर भी क्यों रहते हैं हम धूप से दूर, धूप में छिपे में कई फ़ायदे

रेणु जैन16 दिन पहले
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  • जाड़ों में धूप मन के मीत जैसी लगती है। मन धूप की तरह ही खिंचा-सा रहता है।
  • लेकिन बात केवल मन की ही नहीं, तन की भी है। सुनहली धूप सेहत के लिए भी कम फ़ायदेमंद नहीं।

ये वो दिन हैं, जब हम सुबह को छत पर बैठे धूप सेंक रहे होते हैं तो हथेलियों पर बिछी धूप के चहबच्चों से लगातार खेलने की इच्छा होती है। थोड़ी देर बाद धूप काटने भी लगती है, लेकिन कुल-मिलाकर धूप की घेराबंदी मन को भाती ही है। गुलज़ार साहब ने जब गीत लिखा था – ‘जाड़ों की नर्म धूप और आंगन में लेटकर’, तब हर घर के आंगन में धूप की मौजूदगी भरपूर होती थी। लेकिन अब तो धूप ढूंढनी पड़ती है। हर मौसम में धूप के कई रूप होते हैं – गर्मी में जहां हम इससे दूर भागते हैं तो वहीं बरसात में जब यह बारिश के बीच निकलती है तो इसके इंद्रधनुषी रंगों को मुटि्ठयों में बंद करने को जी करता है। हां, जाड़ों में धूप को ज़रूर ढूंढिए। इन दिनों की धूप सिकुड़े शरीर को गर्माहट देती है और हमें कई रोगों से बचाती भी है।

वेदों में धूप औषधि
वेदों में भी सूर्य पूजा का महत्व है। धूप की रोगनाशक शक्ति के बारे में अथर्ववेद में कहा गया है कि सूर्य औषधि बनाता है। तभी पुराने समय के लोग सुबह सूर्य नमस्कार करके विटामिन डी लेते थे। प्राचीन ऋषि-मुनियों ने सूर्य की शक्ति प्राप्त करके प्राकृतिक जीवन व्यतीत करने का संदेश दिया था।

धूप लाए फ़ीलगुड
पश्चिमी देशों में जहां बर्फ़बारी होती रहती है, वहां धूप कभी-कभार ही देखने को मिलती है। इसलिए वहां लोगों में निराशा, एकाकीपन, अरुचि तथा नकारात्मकता देखने को मिलती है। चिकित्सकों के अनुसार सर्दियों में विंटर लूज़ नाम से जानी जाने वाली यह समस्या उत्तर भारत में अधिक देखने को मिलती है। स्वीडन के एक विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर टोकन एलपन के मुताबिक़ धूप-स्नान से पैरों में ख़ून के थक्के नहीं जमते। कहते हैं इस बीमारी से ब्रिटेन में ही हर वर्ष 25 हज़ार लोगों की जान चली जाती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि धूप में पाई जाने वाली अल्ट्रावायलेट किरणें लोगों में फ़ीलगुड की भावना पैदा करती है।

जादू है धूप
फ़िल्म कोई मिल गया का जादू याद है आपको? खाने के नाम पर उसको क्या चाहिए था? धूप। धूप में आते ही उसकी सारी शक्तियां दोबारा जाग्रत हो जाती थीं।
ऐसा नहीं है कि धूप सिर्फ़ जादू के लिए ही ऐसा करती थी। हम इंसानों के लिए भी वह बड़े काम की है। आख़िर धूप इतनी ज़रूरी क्यों न हो, शरीर को मज़बूती देने में इसका सबसे बड़ा हाथ जो होता है। सूर्य की रोशनी में हड्डियां मज़बूत होती हैं। हड्डियों को सही तरीक़े से पोषण न मिले तो ये कमज़ोर हो जाती हैं। और उम्र बढ़ने के साथ हड्डियों से सम्बंधित बीमारियां जैसे गठिया आदि होने की संभावना बढ़ जाती है। सुबह की धूप शरीर के लिए ज़्यादा फ़ायदेमंद होती है। सूर्य की किरणें रोगप्रतिरक्षा तंत्र को मज़बूत बनाने के साथ ही सोराइसिस जैसे त्वचा रोग से हमारा बचाव भी करती हैं। इसके नियमित सेवन से व्यक्ति दिमाग़ी रूप से स्वस्थ रहता है। साथ ही यह सिज़ोफ्रेनिया के ख़तरे को भी कम करती है। धूप के सेवन से मेलाटोनिन नाम का हॉर्मोन विकसित होता है, जिससे रात में नींद अच्छी आती है। धूप में बच्चों को मालिश करके भी इसीलिए लिटाया जाता है ताकि उन्हें विटामिन डी मिले।

एक प्राकृतिक अलाव
ताज़ा शोध के अनुसार सूर्य के प्रकाश और बीएमआई (बॉडी-मास इंडेक्स) के बीच अच्छा सम्बन्ध होता है। इसीलिए रोज़ाना थोड़ी देर की धूप से वज़न कंट्रोल में रहता है। मेटाबोलिज़्म को सुधारने के अलावा मधुमेह तथा हृदय रोग भी इससे क़ाबू में रहते हैं। धूप के कारण ख़ून जमने, डाइबिटीज़ तथा ट्यूमर जैसी बीमारियां पास नहीं फटकतीं। एक सबसे ज़रूरी बात यह कि धूप में थोड़ी देर रहने से रोग प्रतिरोधक शक्ति में इजाफ़ा होता है। कोरोना महामारी में धूप की उपयोगिया को सभी ने समझा है।

प्रकृति भी खिली-खिली
धूप की किरणों से वनस्पति, फूल एवं पत्ते भी खिल-खिल जाते हैं। गायों के दूध पर भी धूप का प्रभाव पड़ता है। जिन गायों को घरों के भीतर बांधकर रखा जाता है, उनके दूध में विटामिन डी का अभाव पाया गया है। इसके विपरीत जो गायें दिनभर मैदानों में घूमती, चरती रहती हैं, उनके दूध में विटामिन डी की मात्रा प्रचुरता से पाई जाती है।

भरपूर धूप के बावजूद चौंकाते आंकड़े...
भारत की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहां सालभर धूप खिली रहती है। इसके बावजूद आंकड़ों की मानें तो आज भारत में 70 से 90 फ़ीसद लोग विटामिन डी की कमी से जूझ रहे हैं।

चिंता की बात यह भी है कि अकेले दिल्ली में 90 से 97 फ़ीसदी स्कूली बच्चों में (6 से 17 वर्ष आयुवर्ग के) विटामिन डी की कमी पाई गई। कुछ वर्ष पूर्व स्कूलों में प्रोजेक्ट धूप नाम से एक अभियान शुरू भी हुआ था पर कोरोना के चलते स्कूलों के बंद होने से यह अभियान सफल नही हुआ।

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