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देशराग:शिकागो के रेलवे स्टेशन पर सोये थे स्वामी विवेकानंद, 30 की उम्र में धर्म संसद में दिया था ऐतिहासिक भाषण

दीपान्विता रॉय बनर्जी8 दिन पहले
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  • जनवरी का महीना स्वामी विवेकानंद के स्मृति-पर्व का प्रसंग भी है। 12 तारीख़ को भारत के गौरव स्वामी जी की जयंती राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाई जाती है।
  • वे भारत की चिर तरुणाई के प्रतीक ही थे।जब उन्होंने शिकागो की धर्म संसद में भारतीयता का उद्‌घोष किया, तब भी उनकी अवस्था तीस वर्ष की ही थी और अल्पायु में ही उनका देहांत हो गया।
  • इसके बावजूद उन्होंने अपने जीवनकाल में जो किया, वो हम सभी के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत है। स्वामी जी की स्मृति में देशराग स्तम्भ की यह प्रस्तुति हमारे पाठकों को अवश्य ही प्रासंगिक और मार्मिक मालूम होगी।

वह 1893 की इक्कीस मई थी। प्राच्य देश का एक श्यामल संन्यासी मुम्बई बंदरगाह से पेनिनसुला जहाज़ पर पाश्चात्य देशों के लिए रवाना होने वाला था। पॉकेट में उसके 170 पाउंड के नोट और नौ पाउंड खुदरा। बस!

इतना-सा सामर्थ्य और एक दबे-कुचले आत्मसम्मान के लिए संघर्ष करते, पराधीन, पूर्व के देश भारत से सुदूर अमेरिका जैसे समृद्ध आधुनिक देश की यात्रा?

और तो और, ये पैसे भी मद्रास और खेतड़ी के भक्तगणों के अथक प्रयासों से जमा किए गए थे।

सामर्थ्य! इस युवा संन्यासी के पास कितना था सामर्थ्य?

गेरुआ वसन, माथे पर गेरुआ साफा, लाल रंग के कपड़े का कमरबंद, ढीला पतलून और साथ में कुछ पाउंड! क्या इतने-से सामर्थ्य के साथ चला था यह संन्यासी योद्धा उस वैचारिक महासमर में? या कुछ और ही बात थी उसमें!

इस चेहरे में समाहित थी आकाश की व्याप्ति, हृदय में थी सिंधु की अतल गहराई, क़दमों में प्रकृति की अपरिसीम गति, उनके दो मृगनयनों में थी असीम उपलब्धि की दिव्यता, व्यक्तित्व में कठिन तप की ऊष्मा! मंजी हुई सुगठित देह से झरता था संयम का अनुनाद!

यह सामर्थ्य तो समस्त विश्व का अखंडित उच्छ्वास था, जिसे सुनना था अब सारे विश्व को।

तीस वर्ष के यह युवा थे नरेंद्रनाथ दत्त, जो मुम्बई से चल पड़े थे अमेरिका के शिकागो की ओर। मद्रास और खेतड़ी के भक्तगण उन्हें सजल नयन विदा करने आए थे। दृढ़ प्रतिज्ञ, सतत संघर्षशील, एकाकी : आज यह संन्यासी भारतभूमि को विश्व-मंच पर प्रतिष्ठित करने, भारत के विरुद्ध विडम्बनापूर्ण दुष्प्रचार का प्रतिकार करने, भारत के धर्म, रीति-नीति, नैतिक सिद्धांत और परम्पराओं के वास्तविक स्वरूप से विश्व को परिचित कराने अनंत अनजान पथ की ओर था।

काल के गर्भ में आंदोलित था अब सत्य धर्म का जयघोष।

एक नक्षत्र का उदय
नरेंद्रनाथ दत्त।
पिता विश्वनाथ दत्त और मां भुवनेश्वरी दत्त की गोद में एक दिव्य शक्ति का आविर्भाव हुआ था।
12 जनवरी, 1863 के दिन कलकत्ता के गौरमोहन मुखर्जी स्ट्रीट के पैतृक घर में मकर संक्रांति के दिन नरेन जन्मे। वे नौ भाई-बहनों में बड़ी संतान थे।

पिता वकील और पाश्चात्य अभिजात्य से पूर्ण व्यक्तित्व थे। 1871 में 8 साल की आयु में नरेंद्र को शिक्षा के लिए ईश्वर चंद्र विद्यासागर मेट्रोपोलिटन इंस्टिट्यूट में डाला गया। 1877 में परिवार के रायपुर विस्थापित होकर आने तक वे वहीं पढ़ते रहे।

1879 में उनके परिवार के कलकत्ता वापस जाने के बाद प्रेसीडेंसी कॉलेज की एंट्रेंस परीक्षा में फ़र्स्ट डिवीज़न लाने वाले पहले विद्यार्थी बने। वे जिम्नास्टिक, रेसलिंग आदि में भी सक्रिय रहे।

अद्‌भुत क्षमता थी उनमें पढ़ने और समझने की। एक तरफ़़ उन्होंने भागवत-गीता, वेद-उपनिषद काे आत्मसात किया, दूसरी ओर पाश्चात्य दर्शन, इतिहास और आध्यात्मिकता का भी गहन अध्ययन किया।

आध्यात्मिक जिज्ञासा और दिव्य शून्यता
यह वह दौर था जब युवा नरेन अपनी मां की ईश्वर भक्ति और स्वयं की आध्यात्मिक ज्ञानपिपासा के बीच एक शून्य-सा महसूस कर रहे थे।

एक तरफ़ माया से भरपूर ईश्वर जिसका आधार मुख्यत मानवीय भय था, तो दूसरी ओर ब्राह्मो समाज के केशवचंद्र सेन के सान्निध्य में पनपा अनीश्वरवाद! नरेन आध्यात्मिक ऊहापोह से गुज़र रहे थे।

ज्ञान पिपासा और भक्ति के अंतर्द्वंद्व से जूझते हुए उन्होंने सभी धर्मों के गुरुओं से पूछा- क्या आपने ईश्वर देखा है?

हृदय मथ गया था, दिमाग़ में तूफ़ान था। ईश्वर है या नहीं? क्या तर्क हैं ईश्वर के होने हैं? इस सृष्टि का रहस्य क्या है? क्या वाक़ई कोई शक्ति है? या यूं ही हम भ्रम में हैं? निरुत्तर!

परमहंसदेव से मिला जीवन-प्रयोजन

काफ़ी कोशिशों के बाद उन्हें रामकृष्ण परमहंस का संधान मिला। वे दौड़े गए दक्षिणी कालीबाड़ी कोलकाता के साधक रामकृष्ण परमहंस के पास।

रामकृष्ण ने कहा- हां, मैंने देखा है ईश्वर को ठीक उसी तरह जैसे देख रहा हूं तुम्हें।

नरेन को उनके शब्दों में ब्रह्म सत्य की अनुभूति हुई।

नरेन बार-बार उनके पास जैसे किसी अदृश्य शक्ति के सहारे खिंचे चले आते और हर बार उनका विश्वास पुख़्ता हो जाता कि इनके चरणों में ही सारे प्रश्नों की समाप्ति है। श्रीरामकृष्ण ठाकुर को नरेन ने अंततः अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। ज्ञान, भक्ति, त्याग, तप- सब कुछ!

परमहंसदेव मांजते रहे नरेन को और अंततः इस शिष्य को मिला वह गुरुभार, जो विश्व-श्रेष्ठ विवेकपुंज विवेकानंद के रूप में इस तेजस्वी बालक नरेन को प्रकाशित कर सका।

ज्ञान-अर्जन करते जब नरेन चेतना के उच्चतम स्तर तक पहुंचे, तो उन्हें गुरु रामकृष्ण के आदेश से परिव्राजक बन पूरे देश की लगातार पैदल यात्राएं करनी पड़ीं। आख़िर तिरुअनंतपुरम के निकट कन्याकुमारी आकर उन्होंने समुद्र के बीच बनी चट्टान पर लम्बी अवधि की समाधि लगाई।

इस संन्यासी को अपने गुरु से मिला था मानव सेवा का अमोघ मंत्र। निराकार को जीव-प्रेम में साकार करने का चरम उद्देश्य। इसे साकार करने में नरेन ने पूरे भारत से सच्चे तौर पर आध्यात्मिक लोगों को एकत्र कर उन्हें दिव्य उद्देश्य के एक सूत्र में बांध दिया था। अपनी तार्किक, ओजस्वी वाणी, उच्चस्तरीय वक्तृत्व-क्षमता से वे पत्थर को भी समझा लेने में पारंगत थे।

इन्हीं दिनों खेतड़ी के महाराजा अजित सिंह ने नरेंद्रनाथ दत्त को ‘स्वामी विवेकानंद’ के नाम से विभूषित किया।

शिकागो धर्म महासभा की ओर
समुद्र के नीले जल में जहाज़ अपने वेग से गतिमान था।

विवेकानंद केबिन में बैठे सोच रहे थे। उनके गुरु परमहंस रामकृष्ण ठाकुर ने विश्व-मंच तक भारत की वाणी पहुंचाने का महाभार तो दिया था, लेकिन वे स्वयं सशरीर अब इस दुनिया में नहीं थे। 1885 की 16 अगस्त ही वे महानिर्वाण को प्राप्त हुए थे। कौन सम्बल होगा इस महारण में?

विश्व के नाना देशों से लोग आकर पराधीन भारत में अनैतिक विषवमन कर रहे हैं। हिंदू धर्म में एक तरफ़ आत्मिक संघर्ष और चरम भेदभाव व्याप्त हो गया है, दूसरी ओर विदेशी दुष्प्रचार से भारत के नैतिक-आध्यात्मिक सिद्धांतों पर लगातार कुठाराघात हो रहा है।

गुरु-दायित्व है विवेक के कंधों पर। विश्व सभा में भारत की श्रेष्ठता प्रमाणित करनी होगी। यह देश एक शक्तिशाली नैतिक-आध्यात्मिक विचारों का देश है, यह फिर से साबित करने का दायित्व विवेक ने अपने कंधों पर उठाया है। इस समय तक विश्व में यह झूठा प्रचार ख़ूब फैलाया जा चुका था कि भारत अधनंगे, भूखे, सपेरों का देश है।

रामकृष्ण देव की अर्धांगिनी उनकी गुरु मां शारदा देवी का आशीष उन्हें मिल चुका था, लेकिन गुरु?

विवेकानंद याद करते हैं कैसे उनके गुरु ने अपनी सारी शक्ति, सारा तेज विवेकानंद में स्थानांतरित करते हुए कहा था- लो आज सब कुछ देकर मैं ख़ाली हो गया। अब भारत के लोगों का हित, भारत का सम्मान तुम्हारे कंधों पर है।

कन्याकुमारी की समुद्र-शिला पर ध्यानावस्थित विवेक की चेतना में उनके गुरु रामकृष्ण देव ने अपना संदेश प्रवाहित किया- विवेकानंद को शिकागो के धर्म महासभा में धर्म स्थापनार्थ जाना होगा।

कर्मपथ पर अग्रसर नरेन
कोलम्बो, सिंगापुर, हांगकांग, नागासाकी, याकोहामा, बंदरगाह से होते हुए जहाज़ जब कनाडा के वैंकुवर बंदरगाह पहुंचा, तब वह 25 जुलाई थी। स्वामी जी वहां से पैसिफ़िक रेल पथ के रास्ते शिकागो पहुंचे, तो 30 जुलाई लग चुकी थी।

शिकागो में गेरुआ वसन संन्यासी को अपने लिए ज़मीन ढूंढनी थी। एक पराधीन देश का अकिंचन संन्यासी सहज ही अमेरिका के लोगों के लिए कौतुक का विषय बन गया था- जिसके कपड़ों में पाश्चात्य अभिजात्य के बजाय भारतीय सरलता थी, और जिसकी आध्यात्मिक गरिमा को समझने की किसी में क़ुव्वत नहीं थी।

काफ़ी मुश्किलों के बाद एक होटल में ठहर सके। एक-एक दिन गुज़रता और काफ़ी संयम के बावजूद एक-एक पाउंड उनकी जेब से निकल जाता।

धर्म महासभा में अभी डेढ़ महीना था, और इसके उपरांत भी उन्हें यहां हिंदू धर्म और विश्व-भ्रातृत्व के प्रचार-प्रसार के लिए अनिश्चित काल तक रहना था।

स्वामी जी लगातार ज्ञान बढ़ाने में विश्वास रखते थे। इन दिनों वे यहां चल रहे विश्व पुस्तक मेले में घूमकर काफ़ी ज्ञान और अनुभव इकट्‌ठा कर रहे थे। तेजोमय व्यक्तित्व, मनोमय स्वप्निल आंखें, अनन्य वाक शक्ति ने धीरे-

धीरे लोगों में उनके प्रति दिलचस्पी पैदा कर दी। कुछ लोग उनसे व्यक्तिगत रूप से जुड़ चुके थे।

धर्म महासभा का दुर्गम प्रवेशद्वार

विवेकानंद थे ज़मीन से जुड़े ज्ञानी संन्यासी। संचय जिसके लिए महापाप, मानसिक-शारीरिक सुख जिसके लिए त्याज्य! पास न पूंजी, न समुचित भोजन, और इस भीषण शीत में न गरम कपड़े! सुनने में आया कि धर्म महासभा में प्रवेश के लिए यथोचित परिचय पत्र होने चाहिए, जो उनके हिसाब से मान्य हों। कैसे होगी व्यवस्था?

मन विषाद से भरा था।

किसी ओर से अब तक कोई रोशनी नहीं दिखी थी। ईश्वरेच्छा! श्री गुरु और श्री मां को स्मरण करते रहे। सोच लिया स्वजनविहीन इस परदेश में जीवन रहे या जाए, उद्देश्य पूरा करने में पीछे नहीं हटेंगे!

अब तक अमेरिका के कुछ संवाद-माध्यम उन्हें अपने पन्नों पर थोड़ी जगह देने लगे थे। परिचय का दायरा बढ़ रहा था। स्वामी विवेकानंद को याद आया वैंकुवर से शिकागो आने के क्रम में ट्रेन में कैथरिन सैनबर्न से उनका परिचय हुआ था।

54 साल की सैनबर्न वक्ता, लेखिका और सामाजिक कामों में उत्साही थीं। किसी तरह उनसे सम्पर्क हुआ। सैनबर्न ने उन्हें इस कठिन घड़ी में निराशा से मुक्ति दिलाकर अपने घर बोस्टन शहर के मैसाचुसेट्स के ब्रिजी मैडोज़ में बुला भेजा।

सैनबर्न के माध्यम से वहां के गणमान्य लोगों के साथ स्वामी जी का परिचय बढ़ता रहा।

एक दिन सैनबर्न ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के अध्यापक जॉन हेनरी राइट के साथ विवेकानंद का परिचय कराया। प्रोफ़ेसर राइट ने स्वामी विवेकानंद को ख़ूब परखा। इस असीमित बौद्धिक चेतनायुक्त युवा संन्यासी की क्षमता का अनुमान लगाकर प्रोफ़ेसर राइट ने काफ़ी कोशिशें कीं और अंततः स्वामी विवेकानंद के लिए प्रतिनिधि के तौर पर धर्म महासभा का परिचय पत्र बनवा दिया।

अपरिचित शहर में खोया हुआ संन्यासी
विवेकानंद शिकागो आए। फिर वही अनचीन्हे चेहरे, अनजानी राहें, घरों के खिड़की-दरवाज़े जैसे मुंह फिराए हुए! ऐसे में धर्म महासभा की जनरल कमेटी के चेयरमैन रेवरेंड जॉन हेनरी वैरोज का पता ही इस समर में एकमात्र सम्बल था। वह पता खो गया था! न ठौर, न ठिकाना। रात हो चली थी। ठंड कंपाने वाली, न गरम कपड़े, न विश्राम स्थान।

लाचार हो विवेकानंद रेलवे स्टेशन में रखे एक बड़े ख़ाली बक्से के अंदर जाकर सो गए।

थकी हुई सांसें अवरुद्ध होने लगीं। मन बेचैन होने लगा ही था कि वीर संन्यासी को गुरु नाम स्मरण हो आया- डरो नहीं, गुरु सहाय, सब ठीक होगा!

सुबह हुई। भूख से बेहाल होने लगे। अब तक उनके पैसे शेष हो गए थे। वहां किसी से कुछ कह न पाए थे। सोचा था महासभा के चेयरमैन से मिलते ही सब कुछ सही हो जाएगा। मगर यह दुर्दैव! संन्यास-धर्म की शिक्षा अनुसार कई घरों में उन्होंने भिक्षा भी मांगी। लेकिन वह भारत नहीं था। लोगों ने उपहास उड़ाया। धर्म महासभा का पता पूछा। यहां भी अंधकार ही हाथ आया। लोगों ने मुंह फेर लिया।

थका शरीर, भूख से पस्त चेहरा, मलिन वस्त्र- बस उपहास और तिरस्कार!

निराश होकर सड़क के किनारे बैठ गए वे। गुरु रामकृष्ण देव को स्मरण कर उनके आदेश की प्रतीक्षा करने लगे।

अचानक एक दरवाज़ा खुला
एक गृहिणी की नज़र पड़ी इस संन्यासी पर। दोनों के बीच बातें हुई। धर्म महासभा का विदेशी प्रतिनिधि! शिकागो शहर में स्वामी जी को इस घर में सादर शरण मिली।

यह घर था मिसेज़ जॉर्ज डब्ल्यू हेल और मिस्टर जॉर्ज हेल का। युवा विवेकानंद के लिए वे विदेश भूमि में माता-पिता के समान हो गए। उनकी चार बेटियां इनकी बहनें हो गईं। मिसेज हेल को वे मदर चर्च और मिस्टर हेल को फ़ादर पोप कहते थे। हेल बहनें उनकी सहयोगी रहीं और उनमें मेरी हेल और इसाबेल मैक्काइगुली उनके कामों में अधिक सक्रिय रहीं।

हेल परिवार ने उन्हें इस विदेशी भूमि में संरक्षित किया, उनकी चिटि्ठयों के आदान-प्रदान की देखरेख की, और धर्म प्रचार के भाषण में मिले रुपयों का हिसाब-किताब भी रखा।

शिकागो में जब भी स्वामी जी के विरुद्ध धार्मिक दुष्प्रचार हुआ, हेल परिवार ने इसका पुरज़ोर विरोध किया और स्वामी जी के वास्तविक स्वरूप को लोगों के सामने लाने में पूरी मदद की। मेरी हेल स्वामी जी के सम्पर्क सूत्रों को बनाए रखती थीं। स्वामी जी की शिष्या मैकलाउड और निवेदिता के साथ मेरी हेल अक्सर ही सम्पर्क में रहतीं और स्वामी जी का संदेश उन तक पहुंचा देतीं।

विश्व मंच पर भारत का संन्यासी
11 सितम्बर 1893 : धर्म महासभा का वैश्विक मंच। विश्व भर से आए ज्ञानी धनाढ्य प्रतिनिधि। नि:स्तब्ध औत्सुक्य के बीच गहन आध्यात्मिक ओज से पूर्ण स्वर गूंज उठा- ब्रदर्स एंड सिस्टर ऑफ़ अमेरिका। खचाखच भरे हॉल में लोगों ने उनके सम्बोधन भर से ही मंत्रमुग्ध हो करतलध्वनि की।

विश्व-भ्रातृत्व और सर्वधर्म-समभाव के साथ स्वामी जी ने विश्व को धर्म के बारे में एक नूतन दृष्टि दी। अब तक विश्व के सारे धर्म ख़ुद की श्रेष्ठता के नगाड़े पीटते रहे थे, लोगों के धार्मिक-सामाजिक पतन की आड़ में धर्मांतरण कराने की होड़ लगाते रहे थे।

ऐसे में विश्व के सभी धर्मों का उद्देश्य एक बताते हुए उनमें प्रेम को मूल मान कर विवेकानंद ने जब दी एक नई रोशनी तो विपुल जनसमूह ने आश्चर्यमिश्रित आनंद से परिपूर्ण हो उनका अभिषेक किया। नवम्बर 1894 में विवेकानंद ने न्यूयॉर्क में वेदांत सोसायटी की स्थापना की।

विवेकानंद के अनुसार भारत के वेद मात्र किसी धर्मग्रंथ का नाम नहीं, बल्कि युगों की आध्यात्मिक विवेचना की अप्रतिम शृंखला हैं, जिनका चरम है वेदांत या उपनिषद में। यह एक धार्मिक जीवन प्रणाली है, जिसमें जीव मात्र के बीच अभेद यानी समभाव, विश्व बंधुत्व और अंततः ईश्वरीय प्रेम द्वारा मुक्ति लाभ का सर्वश्रेष्ठ उपाय बताया गया है। विवेकानंद का वेदांत जीवन-जिज्ञासा से प्रारम्भ होकर जीव प्रेम और विश्व मानवता में परिणत होता है।

वे कहते हैं, धर्म मनुष्य की अंतर्मेधा को साधने की कला है। इसके द्वारा हम अनुशासन में बंधते हैं, जो हमारे बंधन के नाश का कारण बन सकता है। अतः धर्म बंधन नहीं मुक्ति का मार्ग है। आपस में लड़कर यह श्रेष्ठ साबित करने का विषय नहीं बल्कि यह ख़ुद की श्रेष्ठता को कसने वाला यंत्र है! वेदांत का सार किसी धर्म विशेष की जागीर नहीं थी, बल्कि भाईचारे और विश्व प्रेम से परिपूर्ण एक वैश्विक समाज के निर्माण का चिंतन था।

वे कहते हैं, मनुष्य पवित्र और नीति परायण क्यों हो? क्योंकि इससे इच्छाशक्ति दृढ़ होगी, व्यक्ति कर्तव्यशील होगा, और नि:स्वार्थ होकर कर्म करते रहना ही व्यक्ति की स्वाधीनता या मुक्ति का द्वार है।

तो क्या सारे संन्यासी हो जाएं? विवेक इसका उत्तर देते हुए कहते हैं- दरिद्रता और त्याग भिन्न हैं। निष्काम कर्म करने से दरिद्रता नहीं त्याग की भावना पनपती है। सब कुछ होते हुए भी जकड़कर बैठ जाने की लिप्सा नहीं रहती। यही वेदांत का सत्य है। जगत में रहकर मिथ्या को समझते हुए आगे बढ़ना।

धर्म महासभा के बाद विवेकानंद
धर्म महासभा में जब उन्होंने भारत का गौरव बढ़ाया, तो उन्हें अलग-अलग मंचों और प्रतिष्ठित सभाओं में भाषण के लिए बुलाया जाने लगा। इस समय उनके ओजस्वी व्यक्तित्व और दिव्य प्रतिभा से सम्मोहित हो जॉन और एमिली लायन दम्पती उन्हें अपने घर ले गए। स्वामी जी यहीं रहने लगे।

मिसेज़ एमिली ने इस युवा संन्यासी के संरक्षण का भार लिया, उन्हें शिकागो घुमाया, और उनकी देखभाल की। भाषण से जिन रुपयों की प्राप्ति होती थी, उनका पूरा हिसाब रखा। एमिली युवा विवेकानंद के आकर्षक व्यक्तित्व के प्रति लोगों ख़ासकर स्त्रियों के अनुराग और आकर्षण को भलीभांति समझती थीं। इस बात पर जब वे उद्विग्न हुईं, तब विवेकानंद ने उनकी मन की बात समझते हुए कहा था- मेरी अमेरिकन मां, मैं इस विषय में अभ्यस्त हूं, और संभालना जानता हूं। आप मेरे लिए भयभीत न हों।

अमेरिका में इस कर्मयोगी की साधना जहां रंग ला रही थी, वहीं कुछ कुंठाग्रस्त, संकीर्ण धार्मिक संस्थाओं ने स्वामीजी की सफलता पर रोष मनाकर अख़बारों और लोगों के बीच विद्वेषपूर्ण बातें फैलाईं। इस समय स्वामी जी अपने उद्देश्य में सफल होते हुए भी आघात-प्रत्याघात से जर्जरित थे।

बाद में विवेकानंद अमेरिका से इंग्लैंड आए। वहां भी उन्होंने वेदांत को स्थापित किया।

महाचेतना का आरोहण
अत्यधिक श्रम, यात्राएं, लगातार भाषण, जलवायु परिवर्तन से उन्हें कई तरह की बीमारियां हमेशा घेरे रहीं। गले में दर्द, वृक्क और हृदय में समस्या, डिसपेप्सिया, गॉल स्टोन आदि ढेरों बीमारियों की चपेट में रहते हुए भी स्वामी जी आध्यात्मिक चेतना और वेदांत के सत्य के लिए काम करते रहे। छुआछूत, ऊंचनीच के विरुद्ध जनाधार विकसित करने को आजीवन सचेष्ट रहे।

सन् 1900 में वे भारत वापस आकर बेलूर मठ में रम गए। उनकी चेतना का दिव्य स्तर लगातार बढ़ रहा था। महीनों समाधिस्थ रहते चेतना की उच्चतम उपलब्धि उन्हें होने लगी थी। उनकी दिव्य चेतना अब सांसारिक देह में समाने लायक़ नहीं रह गई थी।

अंततः 4 जुलाई 1902 को समाधि की अवस्था में उन्होंने देह त्याग दी। उनकी चेतना का स्तर आज भी हमारे मनोजगत पर पूरी तरह व्याप्त है, बस समझने भर की देर है! --------

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