ताना-बाना:मिठास से पूरे शरीर को मिल सकता है संत्रास, डायबिटीज़ से शरीर के अन्य अंगों पर भी पड़ता है विपरीत प्रभाव

डॉ. शचिन कुमार गुप्ता20 दिन पहले
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  • मिठास वाणी में हो तो जीवन को ख़ुशहाल बनाती है, लेकिन रक्त में हो तो जीवन में कड़वाहट घोल देती है। यह मधुमेह यानी डायबिटीज़ की डरावनी हक़ीक़त है, जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। जानिए कि ख़ून में शक्कर की मात्रा नियंत्रित न रखी जाए तो क्या-क्या हो सकता है।

डायबिटीज़ यानी मधुमेह को आम भाषा में शक्कर की बीमारी भी कहते हैं। जैसे ही किसी व्यक्ति को पता चलता है कि उसे डायबिटीज़ हो गई है तो पहला ख़याल यही आता है कि यार! अब मीठा खाना बंद हो जाएगा। यहां जान लें कि यह खानपान की पाबंदी तक सीमित नहीं है, न ही इसका प्रभाव सिर्फ़ रक्त में शर्करा बढ़ना ही होता है। बल्कि, यह धीरे-धीरे शरीर के अन्य अंगों को भी अपनी गिरफ़्त में ले लेती है। किडनी, दिल, आंखें, पैर समेत शरीर के विभिन्न अंगों पर इसके दुष्प्रभाव होते हैं।

डायबिटीज़ एक छलिया है। इसकी शुरुआती अवस्था में कुछ लोगों में लक्षण नज़र आते हैं, जबकि कुछ लोग कहते हैं कि ज़रा भी एहसास नहीं होता। ऐसे मरीज़ अक्सर कहते हैं कि मेरी रिपोर्ट में शुगर लेवल 200-300 आ रहा है परंतु मुझमें तो कोई लक्षण ही नहीं हैं। कुछ में मामूली लक्षण होते हैं, वे भी जल्दी ही दूर हो जाते हैं। यहीं से होती है लापरवाही की शुरुआत। मधुमेह का सामना करने के लिए सबसे आवश्यक है जागरूकता।

प्रतिवर्ष 14 नवंबर को मनाए जाने वाले विश्व मधुमेह दिवस का उद्देश्य भी यही है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग इसके बारे में सही तथ्य जानें। मधुमेह के पूर्ण निवारण का उपाय नहीं है, किंतु रक्त शर्करा को नियंत्रण में रखकर नुक़सानों को न्यूनतम किया जा सकता है और सुदीर्घ स्वस्थ जीवन जिया जा सकता है।

शुरू से रहे ध्यान
शुरुआती अवस्था में डायबिटीज़ साइलेंट किलर की तरह होती है। न कोई दर्द, न कोई विशेष दिक़्क़त। लेकिन आरंभ में निरापद-सी नज़र आने वाली यह लक्षण विहीन बीमारी बाद में कई बड़ी-बड़ी स्वास्थ्य समस्याएं खड़ी कर सकती है। कुछ सालों के बाद आंख, किडनी, हृदय संबंधी रोग के अलावा पैरालिसिस होने तक की आशंका बढ़ जाती है। लेकिन घबराइए नहीं, कई महत्वपूर्ण अध्ययनों से पता चला है कि डायबिटीज़ के मरीज़ यदि शुरुआत से ही अपनी रक्त शर्करा, रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रण में रखें तो काफ़ी हद तक स्वस्थ जीवन जी सकते हैं।

अनदेखी के आंकड़े

देश में लगभग 50% डायबिटीज़ के मरीज़ उपचार नहीं कराते हैं। आंकड़े बताते हैं कि देश में 10 में से 8 मरीज़ों की शुगर नियंत्रण में नहीं रहती है। पहले तो मरीज़ को इस बात को स्वीकार करने में समय लगाता है कि उसे डायबिटीज़ हो गई है। वह पूरी कोशिश करता है कि उसे दवाएं न खानी पड़े। वह सोचता है कि मैं रोज़ टहलने जाऊंगा, खानपान पर नियंत्रण करूंगा, परंतु यह कुछ दिनों बाद संभव नहीं हो पाता है।

लड़ाई अब लंबी है

कुछ दशक पहले डायबिटीज़ अमूमन 50 से 60 वर्ष की उम्र में होती थी, परंतु आज यह उम्र कम होकर 30 से 40 वर्ष हो गई है। हालांकि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ जीवन प्रत्याशा भी 60 से बढ़कर अब 70 वर्ष से ऊपर हो गई है। ज़ाहिर है, 30-40 की उम्र वालों के लिए अब यह संघर्ष लंबा हो गया है। अतः आवश्यक है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने और डायबिटीज़ की आशंका कम करने के लिए प्रेरित करें।

मोटापा भी डायबिटीज़ की एक प्रमुख वजह है। मोटापा हमारे देश में बहुत तेज़ी से पैर पसार रहा है। आजकल बच्चे भी मोटापे के शिकार अधिक हो रहे हैं। यही मोटापा वयस्क होने पर भी रहता है तथा उन्हें डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर, हृदयरोग कम उम्र में ही हो जाते हैं। जर्नल ऑफ़ द अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन की 2019 में जारी रिपोर्ट कहती है कि अत्यधिक वज़न से डायबिटीज़ का जोखिम बढ़ जाता है। डायबिटीज़ से संबंधित जटिलताओं का ख़तरा, रक्त में शर्करा (ग्लूकोज़) के सही नियंत्रण और स्वस्थ जीवनशैली को अपनाकर काफ़ी कम किया जा सकता है। नियमित जांच द्वारा डायबिटीज़ की वजह से होने वाली समस्याओं का शीघ्र पता लगाकर उन्हें रोका या टाला जा सकता है।

डायबिटीज़ और मानसिक स्वास्थ्य

जब व्यक्ति को पता चलता है कि उसे डायबिटीज़ है तो ये बात उसे परेशान और निराश कर सकती है। इसके साथ ही उसे अपनी सेहत ही नहीं, बल्कि सहजतापूर्वक जीने के तरीक़े पर भी ख़तरा महसूस हो सकता है।

डायबिटीज़ के उपचार में...

नियमित शारीरिक सक्रियता, ब्लड शुगर लेवल पर नज़र रखना, खानपान और दवाओं का ध्यान तथा ज़रूरत पड़ने पर इंसुलिन के डोज़ लेने की प्लानिंग करना शामिल है। कुल मिलाकर ये सब बातें व्यक्ति को बहुत थका देने वाली लगती हैं और भावनात्मक रूप से कमज़ोर बनाती हैं। ऐसे में यह भी हो सकता है कि अपने शरीर को सेहतमंद बनाए रखने के काम में वह इतना डूब जाए कि दिमाग़ी सेहत को दरकिनार कर दें। हालांकि, सेहतमंद ज़िंदगी के लिए अपने मानसिक स्वास्थ्य का ख़्याल रखना भी बराबर ज़रूरी है। अगर बेचैनी और अवसाद जैसी दिमाग़ी परेशानियों को नज़रअंदाज़ करते हैं, तो इससे डायबिटीज़ और बिगड़ सकता है।

स्ट्रेस यानी तनाव आपकी रोज़मर्रा की भागदौड़ भरी ज़िंदगी का हिस्सा हो सकता है। साथ ही आप अपने बढ़ते-घटते शुगर लेवल, दवाओं की क़ीमत और डायबिटीज़ से जुड़े जोख़िमों को लेकर भी परेशान हो सकते हैं। आप जो स्ट्रेस महसूस करते हैं, वह गु़स्से या डर जैसी किसी भावना का रूप ले सकता है। दिल की धड़कन बढ़ने या जल्दी पसीना आने जैसी शारीरिक प्रतिक्रियाएं भी हो सकती हैं।

तनाव और बेचैनी कम करने के लिए डायबिटीज़ के इलाज के ख़र्च को कम करने में मदद लेना, अपने क़रीबी व्यक्ति से बात करना और उन्हें अपनी सेहत का ख़्याल रखने देना, अपनी पसंद की गतिविधियों के लिए वक़्त निकालना और योग व ध्यान जैसी तकनीक के ज़रिए रिलैक्स करना शामिल है।

लेखक परिचय

डॉ. शचिन कुमार गुप्ता

मधुमेह रोग विशेषज्ञ, एमडी मेडिसिन। डायबिटीज़ इंडिया द्वारा डायबिटीज़ अवेयरनेस इनिशिएटिव अवॉर्ड से सम्मानित। चिकित्सा क्षेत्र में 21 वर्षों का अनुभव।

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