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अंतर्मन:टला नहीं है अभी कोरोना का संकट, इसलिए धैर्य के नए पाठ को सीखना और आत्मसात करना आवश्यक है

डॉ. विवेक चौरसिया3 महीने पहले
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  • श्रीरामचरितमानस का अद्भुत सूत्र है- ‘धीरज धरम मित्र अरु नारी, आपद काल परिखिअहिं चारी।’ अर्थात धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री की परीक्षा विपत्ति के समय ही होती है।
  • मानस के अरण्यकांड में- महर्षि अत्रि की पत्नी देवी अनुसूया ने स्त्री धर्म पर उपदेश देते हुए यह सूक्ति सीताजी से कही थी, जो कठिन कोरोनाकाल में लगभग साल भर से हम सबकी जीवन-कसौटी बनी हुई है।
  • यह भी कि अभी कोरोना का संकट टला नहीं है, इसलिए आने वाले दीर्घकाल तक इसी सूक्ति के सहारे हमें जीवन पथ पर आगे बढ़ना होगा।

धरती पर मनुष्यता के इतिहास में कोरोना अब तक की सबसे अकाट्य विपत्ति है। भूकम्प, झंझावात, सुनामी या दावानल की तरह इस अदृश्य शत्रु ने न धरती हिलाई, न समंदर को उबाला और न ही संसार को सुलगाया, बल्कि इन सबसे इतर बग़ैर एक सुई भी सरकाए, जीवन की गति को जहां का तहां बांध दिया।

सुदूर चांद पर अपने पगतल टांक चुका और सागर तल की थाह नाप चुका सर्वगुणसम्पन्न और सर्वशक्तिसमर्थ आज का मनुष्य अभी तक कोरोना की काट खोज लेने में असमर्थ सिद्ध हुआ है। ऐसे में साल 2020 का सबसे बड़ा सबक़ मानस की यही चौपाई बन गई है। यह कि पीड़ित और संघर्षरत मनुष्य के लिए ‘धैर्य ही ईश्वर है!’

धीरज का धन
इस वर्ष ने हमें पराकाष्ठा तक जाकर धैर्य साधना सिखाया है।

अधीरता मानव मन का मूल स्वभाव है। इस सूक्ष्मतम और प्राणघातक वायरस का असर मनुष्यों पर ही हुआ और हमने इससे बचाव व युद्ध के बीच धैर्य-धारण के नए पाठ सीखे।

वर्ष के प्रारम्भिक मासों में विश्वव्यापी तालाबंदी के बीच जब हमारे आहार-विहार सब कुछ प्रभावित हुए, तब पहली बार हमने जाना कि जीवन में झगड़ा रोटी का नहीं है, ‘थाली’ का है।

रोटी तो विकट परिस्थिति में भी प्रायः सभी को सुलभ हुई, लेकिन इस विकट काल ने अहसास कराया कि पीतल से लेकर चांदी और सोने से लेकर रत्नजड़ित थाली अर्थात भौतिक वस्तुओं के संग्रह की दौड़ और होड़ में हम बिना बात ही जीवन को ज़हर बना लेते हैं।

जबकि जीवन तो अत्यल्प और मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के बीच भी बड़ी सुगमता के साथ जिया जा सकता है। जैसा कि कोरोनाकाल में हमने जिया भी, या यूं कहें कि अभी भी पाबंदियों के बीच जी रहे हैं।

धैर्य श्रेष्ठतम मनुष्य का गुण है, यह सूक्ति अब तक हमने किताबों में ही पढ़ी थी, लेकिन कोरोनाकाल ने इस ‘सिद्धांत’ को ‘व्यवहार’ में आजमाने की कला सिखाई है।

धैर्य, संयम, संतोष आदि अल्पांतर से एक ही भाव के द्योतक हैं और वह है- जब समय प्रतिकूल हो तो जो है उसी में प्रसन्न रहना और ईश्वर पर विश्वास कर समय के अनुकूल होने की प्रतीक्षा करना। इसलिए कि जब समस्या के समाधान का कोई मार्ग न हो, तब जो धैर्य-धारण जानता है, वही विजेता होता है।

हमारे पुराख्यानों में श्रीराम और पांडवों के वनवास धैर्य से ही कटे थे, ठीक उसी तरह कोरोनाजन्य समय का ‘वनवास’ भी धैर्य से ही काटा जा सकेगा।

परहित सरिस धरम नहीं भाई

कोरोनाकाल में धैर्य से भी बड़ा सबक धर्म है।

इस कठिन समय ने हमें धर्म की अब तक सुनी या सुनाई, पढ़ी, समझी, सीखी या सिखाई और अपनाई गई सारी परिभाषाएं मानो बदल दीं।

धर्म का अर्थ पहले भी हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि न था, लेकिन परम्परा में हमने इन्हीं अर्थों में जन्मदाता कुल के अनुरूप ‘धर्म’ का अनुसरण और आचरण किया। मगर इस वर्ष ने समझाया कि धर्म की सच्ची

परिभाषा ‘परहित सरिस धरम नहीं भाई’ है। जिससे दूसरे का हित हो, ऐसा कर्तव्य ही सच्चा और अच्छा धर्म है।

महामारी के दौरान जब देवालय और प्रार्थना स्थल बंद हुए, तब मानवता ने पहली बार अनुभव किया कि ईश्वर मंदिर-मस्जिद तक सीमित नहीं है, अपितु मनुष्य में ही जीवंत, चैतन्य और अभिव्यक्त है। इस दौर में हमारी

पीढ़ी ने महामारी से प्रभावित लोगों की प्राणरक्षा में कर्तव्य-पथ पर चिकित्सकों और चिकित्सा कर्मियों को प्राणों का उत्सर्ग करते साक्षात देखा।

धर्म पंथ पर अडिग

वृत्रासुर के वध के लिए अपनी अस्थियों का सहर्ष दान करने वाले महर्षि दधीचि की कथा जो हमने बचपन में पढ़ी थी, इन चिकित्सकों के रूप में उन ‘दधीचि’ के ही दर्शन हुए।

एक अनुमान के अनुसार कोरोना से संघर्ष के बीच अकेले भारत में तीन हज़ार से अधिक चिकित्साकर्मियों ने धर्म-पंथ पर चलते हुए अपने प्राण गंवा दिए और धर्म की अनसुनी-अनदेखी मिसाल प्रस्तुत की। ठीक इसी तरह सुरक्षा व्यवस्था में लगे पुलिस जवानों और अन्य सुरक्षाकर्मियों ने भी कर्तव्य निर्वहन करते हुए बलिदान दिए। वे महीनों तक अपने परिवारों से दूर रहे, बच्चों तक को गले न लगा सके, मगर सेवा से विचलित न हुए।

समाजसेवी संस्थाओं के ऐसे अगणित स्वयंसेवक, जो अपनी जान जोख़िम में डाल इस अवधि में ज़रूरतमंदों को खाद्य सामग्री व दवाइयों की आपूर्ति करते रहे, वे देवदूत ही सिद्ध हुए।

इस आपदकाल ने हमें सिखाया कि पंथ, ग्रंथ और प्रार्थना पद्धति की भिन्नता और भ्रम में पड़कर ‘परपीड़ा सम नहीं अधमाई’ में उलझना बेमानी है।

आगे भी, जो जहां है, जिस परिस्थिति में है, वह यथासम्भव और यथाशक्ति ज़रूरतमंद की यदि सहायता करता है तो वही सच्चा धर्मालु है। जो ऐसे सद् धर्म को साधेगा वहीं संकट के पार उतर सकेगा और समूची मानवता को भी पार उतारने में सहायक होगा।

संकटकाल के मित्र

संसार में मनुष्य के बड़े भ्रमों में एक भ्रम यह है कि ‘मेरे बहुत सारे मित्र हैं’, जबकि मानस की सूक्ति संकेत करती है कि सच्चे मित्र की पहचान केवल संकट की घड़ी में ही होती है।

आज सोशल मीडिया के युग में लोगों के बहुतेरे मित्र होते हैं, लेकिन कोरोना का हमें इस अर्थ में ‘आभारी’ होना चाहिए कि उसने मित्रों की पहचान करा दी। लोगों के अनुभव कटु व दुःखद भी रहे तो मृदु व सुखद भी।

पलायन करने को विवश हुए बहुसंख्यक श्रमिकों के लिए ‘मित्र’ की परख कष्टकारी रही, मगर छोटे शहरों और अधिकांश गांव-क़स्बों के अनुभव सुखदायी रहे। मनुष्य ने सीखा कि जीवन में असल धन सच्चे मित्र ही हैं।

संकट के समय रिश्तेदार और यहां तक कि परिजन भी अनेक बार सहायता के लिए उपलब्ध नहीं हो पाते हैं, मगर मित्र हों तो संकट का सामना करने में मदद होती है।

कोरोनाकाल में मित्र-धर्म के निर्वहन की अनेक कहानियां सामने आईं, जिन्होंने समाज में पारस्परिक सम्बंधों को बनाने, निभाने और देखने-समझने का नज़रिया ही बदल दिया। माना कि अब जीवन पटरी पर आने लगा है,

लेकिन कोरोना के उत्तरकाण्ड में मित्रों की पहचान अभी शेष है।

ऐसे में इस साल का सबक़ यह है कि मित्र की परख में सावधानी रखिए। जो खरे हैं उनका साथ न छोड़िए, मगर जो खोटे हैं, उनसे मैत्री का भ्रम भी मत पालिए।

संगिनी की परख
मानस के शीर्षक सूत्र में जिस नारी की परख का इशारा है, वह स्पष्टत: पत्नी है।

देवी अनुसूया ने जब सीताजी को स्त्री धर्म का उपदेश दिया था, तब श्रीराम के वनवासकाल का प्रारम्भ ही था। अनुसूया ने सीताजी को बताया था कि पति के संकट में जो पत्नी उसका साथ देती है, वही सच्ची जीवन संगिनी होती है।

कोरोनाकाल के इस साल में इस संदर्भ में भी लोगों को परख हो गई। चंद प्रकरण ऐसे भी सामने आए, जब महामारी में दिवंगत हुए पति की देह तक का स्पर्श करने को पत्नी तैयार नहीं हुई। इन घटनाओं ने पुरुष के मोह का शमन करने की शिक्षा दी तो जहां पत्नियां विकट काल में सहायक बनीं, वहां पत्नी की महत्ता का अहसास कराया।

ये सूचनाएं कष्टकारी हैं कि महानगरों में कोरोना के दुष्प्रभाव से दाम्पत्य विखंडन के मामले बढ़े हैं। अनेक कारणों से आर्थिक समस्याओं से जूझ रहे पतियों से पत्नियों के विवाद, अलगाव या सम्बंध-विच्छेद की खबरों के बीच एक बार फिर मानस का सूत्र कसौटी बनकर उपस्थित है।

यह समझाते हुए कि संकट आपसी सहयोग और साहचर्य से ही टलता है। मत भूलिए, इस समय जीवन और धन से अधिक मूल्यवान पारिवारिक सम्बंध है। यदि हम इस समय हरसम्भव प्रयत्न कर सम्बंध सुरक्षित रख सकें तो यह जीवन बचा लेने जितनी ही महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी।

(लेखक परिचय

डॉ. विवेक चौरसिया

लेखक पौराणिक साहित्य के अध्येता हैं। परिवार में जीवन मूल्य और नई पीढ़ी में भारतीय संस्कृति के प्रति आग्रही हैं। दैनिक भास्कर में 20 वर्ष सेवा के बाद अब स्वतंत्र लेखन।)

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